अन्तःदृष्टि व सूझ का सिद्धांत




  • सूझ व अन्तःदृष्टि के सिद्धांत का प्रतिपादन कोहलर ने किया था। यह सिद्धांत गैस्टाल्टवाद से सम्बन्धित हैं।
  • गैस्टाल्टवाद एक मनोवैज्ञानिक विचारधारा है जिसके अनुसार मनुष्य किसी समस्या एवं परिस्थिति का समग्र रूप से प्रत्यक्षीकरण करता है।
  • इस विचारधारा के प्रमुख मनोवैज्ञानिक कोहलर, कोफ्का एवं मैक्स वर्दीमर है।
  • ये मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि व्यक्ति प्रयत्न व भूल के द्वारा नहीं सीखता बल्कि वह पहले समस्यात्मक परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करता है और प्रत्यक्षीकरण करने के बाद अनुक्रिया करता है।
  • समग्र परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण कर अनुक्रिया करना ही अन्तःदृष्टि व सूझ कहलाता है।
  • इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति समग्र रूप से परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण नहीं कर पाता, परिस्थिति का समग्र प्रत्यक्षीकरण कर लेना ही समस्या समाधान होता है।
  • समस्यात्मक परिस्थिति के सही प्रत्यक्षीकरण को ही गैस्टाल्टवादी अन्तःदृष्टि की संज्ञा देते हैं।

अन्तर्दृष्टि व सूझ उत्पन्न होने का क्रम-
लक्ष्य- बाधा- तनाव- संगठन- पुनःसंगठन- यकायक अन्तःदृष्टि विकसित होना।

  • समस्या व्यक्ति के लिए तब उत्पन्न होती है जब वह लक्ष्य तक पहुंचने में बाधा पाता है और इस बाधा के कारण व्यक्ति में तनाव उत्पन्न होता है। यह तनाव ही व्यक्ति को क्रियाशीलता बनाता है।
  • क्रियाशीलता की मात्रा तनाव की मात्रा पर निर्भर करती है। तनाव के कारण व्यक्ति स्थिति का निरीक्षण करते हुए परिस्थिति में दिखाई पड़ने वाले संकेतों का संगठन व पुनः संगठन करता है और यह प्रक्रिया तक तक चलती है जब तक परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण ऐसा नहीं हो जाता कि लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग स्पष्ट हो जाये।

अन्तर्दृष्टि व सूझ की विशेषताएं

  • 1. अन्तर्दृष्टि की उत्पत्ति अचानक होती है।
  • 2. अहा अनुभव
  • 3. समस्यात्मक परिस्थिति
  • 4. निष्क्रियता की अवस्था
  • 5. सूझ का सम्बन्ध बुद्धि के साथ
  • 6. सूझ का सम्बन्ध आयु के साथ

अन्तःदृष्टि के आधार पर सीखना

  1. प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक स्तर पर सीखना - प्रत्यक्ष ज्ञानात्मक स्तर पर प्राणी अपनी ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से सम्पूर्ण परिस्थिति का प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर प्रतिक्रिया करता है और तब सीखता हैं।
  2. सम्प्रत्ययात्मक स्तर पर सीखना - सम्प्रत्ययात्मक स्तर पर सीखने में मस्तिष्क तब सहायता करता है जब व्यक्ति के सामने जटिल परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है और उसे शारीरिक क्षमता के साथ बुद्धि का सहारा लेना पड़ता है।

शिक्षा में उपयोग 

  • 1. विषय-वस्तु को पूर्ण रूप से प्रस्तुत करना।
  • 2. यह सिद्धांत समझ पर अधिक बल देता है, अभ्यास व रटन्त पर कम।
  • 3. विद्यार्थी के सामने सदैव सुस्पष्ट लक्ष्य प्रस्तुत करना चाहिए।
  • 4. गणित, विज्ञान व रचनात्मक कलाओं में उपयोगिता।
  • 5. लक्ष्य प्राप्ति व अधिगम परिस्थिति के मध्य तल्लीनता बढ़ाना।
  • 6. तर्क-विश्लेषण की क्षमता का उत्पन्न होना।

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