हल का प्रबलन का सिद्धांत

हल का प्रबलन का सिद्धांत


  • अधिगम के प्रबलन सिद्धान्त का प्रतिपादन अमेरिका के मनोवैज्ञानिक क्लार्क एल. हल के द्वारा 1915 में किया गया। उन्होंने ने अपनी पुस्तक 'Principles of Behaviour' में किया। 
  • इस सिद्धान्त का गणितीय सिद्धांत, परिकल्पित निगमन सिद्धांत/आवश्यकता अवकलन/ जैवकीय अनुकूलन/सबलीकरण/ उद्देश्य प्रवणता सिद्धांत आदि नामों से जाना जाता है।
  • उन्होंने अपना प्रयोग भूखी बिल्ली पर किया। भोजन प्राप्त करने की आवश्यकता ने बिल्ली को पिंजरा खोलना सीखा दिया।
  • हल का कहना है कि व्यक्ति या प्राणी उसी कार्य को सीखता है जिससे उसकी किसी आवश्यकता की पूर्ति होती हो।
  • यह सिद्धांत स्वयं सिद्ध मान्यताओं पर आधारित है। हल ने 17 स्वयं सिद्ध मान्यताओं का प्रतिपादन किया है। 17 स्वयं सिद्ध मान्यताओं के आधार पर 133 प्रमेयों का स्पष्टीकरण किया है।
  • ये सभी मान्यताएं जीवधारी की जैवकीय संरचना पर आधारित है। यह सिद्धांत पावलव व थॉर्नडाइक के नियमों पर आधारित है।
  • हल के सीखने के सिद्धान्त का अर्थ स्पष्ट करते हुए स्टोन्स नामक मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि सीखने का आधार आवश्यकता की पूर्ति की प्रक्रिया है। यदि कोई पशु अथवा मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति करता है। 
  • आवश्यकता की पूर्ति के लिए हल ने आवश्यकता की कमी का भी प्रयोग किया है।
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स्कीनर ने इसी सिद्धान्त को सभी सिद्धान्तों में सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत कहा है।

  • इस सिद्धान्त को चालक न्यूनता का सिद्धांत भी कहा जाता है।
  • इस सिद्धांत में दो प्रकार के प्रबलन के बारे में बताया गया है-
  • 1. प्राथमिक और 2. द्वितीयक प्रबलन
  • हल ने दो प्रकार के प्रबलन बताये हैं जो विभिन्न अवस्थाओं में दृष्टिगोचर होते हैं। भोजन, भूख के चालक को प्रबल बनाता है। यह अवस्था प्राथमिक प्रबलन की है।
  • भूख उस समय तक शांत नहीं होती जब तक की भोजन नहीं खा लिया जाता है। अतः भोजन करने से पहले भूख रूपी चालक एक बार फिर प्रबल बन जाता है जिसे द्वितीयक प्रबलन कहा जाता है।

शिक्षा में उपयोग

  • 1. सीखना तभी सार्थक होता है जब वह आवश्यकता की पूर्ति करें।
  • 2. छात्रों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाना चाहिए (व्यवसायिक शिक्षा का सूत्रपात)
  • 3. शिक्षा प्रदान करते समय प्राथमिक व द्वितीयक पुनर्बलन का ध्यान रखना चाहिए।
  • 4. यह सिद्धांत सीखने में प्रेरणा पर बल देता है।

हॉलमैन का चिह्न सिद्धांत

  • अमेरिका के एडवर्ड चेस टॉलमैन ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1932 में किया। इस सिद्धांत को चिह्न, अधिगम सिद्धांत, चिह्न गैस्टॉल्ट प्रत्याशा सिद्धांत, उद्देश्य सिद्धांत आदि नामें से जाना जाता है। यह सिद्धांत व्यवहारवाद और समग्रवाद का मिश्रण है।
  • टॉलमैन के अनुसार वस्तुतः प्राणी अपने समक्ष उत्पन्न परिस्थिति में क्या है? इससे सीखता हैं। दूसरे शब्दों में टॉलमैन ने कहा है कि सीखने वाला उद्देश्य तक पहुंचने के लिए चिह्नों का अनुसरण करता है। प्राणी गतियों को नहीं वरन् अर्थों को सीखता है। व्यक्ति अथवा प्राणी लक्ष्य तक जाने वाले मार्ग को ही सीखता है।

प्रयोग - चूहों पर

शिक्षा में उपयोग 

  • आन्तरिक अभिप्रेरणा पर बल देता है।
  • अधिगम कभी भी व्यर्थ नहीं होता है।
  • उद्देश्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

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