प्रथम अफीम युद्ध के कारण क्या थे?

 

प्रथम अफीम युद्ध


  • ब्रिटेन और चीन के मध्य 1840 ई. में युद्ध लड़ा गया जो प्रथम अफीम युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध का मूल कारण अफीम के व्यापार के अलावा और भी अनेक कारण थे जो निम्नलिखित हैं—


1. ब्रिटेन की साम्राज्यवादी लालसा


  • 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक एशिया के एक विशाल भू-भाग पर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी और अब वह चीन पर भी अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयत्न करने लगा क्योंकि चीन पर अधिकार हो जाने पर ब्रिटेन को कई लाभ हो सकते थे। इंगलैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के तीव्र प्रसार के फलस्वरूप बढ़ते हुए उत्पादनों के लिए विस्तृत मण्डियां तथा बाजार खोजना आवश्यक हो गया था। वहीं भारत पर अंग्रेजों को अभूतपूर्व सफलता मिली थी, उससे वह काफी प्रोत्साहित हुआ था।


2. को हांग के नियन्त्रण से मुक्ति की आकांक्षा

  • मंचू वंश के शासनकाल में चीनी व्यापारियों को विदेशी व्यापारियों से अलग रखा जाता था। सरकार द्वारा प्रमाणित दलाल, व्यापारियों की निगरानी और उनसे कर वसूली करते थे। यूरोपीय व्यापार को संचालित करने वाले दलालों के दल में 6 से 12 फर्मे थीं और उन्होंने एक निगम बना रखा था, जिसे "को—हांग" कहते थे। को—हांग की अनुमति प्राप्त किये बिना कोई विदेशी जहाज कैण्टन नहीं आ सकता था और न ही बिना उसकी अनुमति के चीनी लोगों से सम्पर्क स्थापित कर सकता था। विदेशी व्यापारियों पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगे हुए थे। उन्हें अपने कारखानों के अहाते के बाहर शहर में प्रवेश करने की मनाही थी। व्यापार के मौसम के बाद उन्हें मकाओ द्वीप लौट जाना पड़ता था। इन सारे प्रतिबन्धों के कारण अंग्रेज व्यापारी बहुत दुःखी थे। वे सारे प्रतिबन्धों से मुक्ति और चीन में उन्मुक्त व्यापार करना चाहते थे।

3. ब्रिटेन की समानता की इच्छा 


  • चीनी लोग यूरोपीय लोगों को असभ्य एवं बर्बर मानते थे इसलिए वे उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते थे। चीनी अधिकारी उनके साथ अधीनस्थ राज्यों के कर्मचारियों की तरह व्यवहार करते थे। कोतो का नियम (तीन बार घुटने टेककर नौ बार माथा टेकना) उनके लिए अनिवार्य था। यूरोपीय राज्यों के लिए यह कोतो का नियम बड़ा ही अपमानजनक था। 
  • व्यापारिक असुविधाओं को दूर करने, चीन के साथ समानता का स्तर प्राप्त करने तथा अपमानजनक प्रथाओं और नियमों से छुटकारा पाने के लिए यूरोपीय राज्य चीन की सरकार के साथ सीधा कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। इन प्रयासों में ब्रिटेन सबसे अग्रणी था। उसने दो बार अपने राजदूत भेजकर चीन की सरकार से सन्धि करने का प्रयास किया था। लेकिन जब उसे इस दिशा में कोई सफलता नहीं मिली, तब उसने युद्ध का सहारा लेने का निश्चय किया।


4. पश्चिमी कानूनों को मान्यता 


  • यूरोपीय व्यापारी चीन के कानूनों की प्रायः अवहेलना करते रहते थे। इनमें अंग्रेज व्यापारी सबसे आगे थे। वे अपने को चीनी कानून की परिधि से बाहर समझते थे। जब कभी कोई अंग्रेज चीन में अपराध कर देता तो उसका फैसला चीन की अदालत में न होकर ब्रिटिश अदालत में होता था। कोई भी सार्वभौम सरकार इसे सहन नहीं कर सकती थी। अतः चीन की सरकार ने घोषणा की कि सभी विदेशियों पर चीनी कानून लागू होंगे तथा किसी विदेशी अपराधी को बन्दी बनाने का अधिकार केवल चीनी पुलिस को होगा। किंतु अंग्रेज व्यापारी इस घोषणा का पालन करने को तैयार नहीं थे। 
  • 1784 ई. में एक ब्रिटिश जहाज के व्यापारी ने एक चीनी नागरिक की हत्या कर दी। चीन की सरकार ने उस हत्यारे अंग्रेज व्यापारी को बन्दी बना लिया। किन्तु अंग्रेजों ने इसका विरोध किया तथा ब्रिटिश सरकार ने 1793 ई. में लार्ड मेकर्टन के नेतृत्व में एक मिशन चीन भेजा जिसने प्रस्ताव रखा कि कैण्टन की अंग्रेज बस्ती को स्वशासन तथा अंग्रेज अपराधी की अदालती जांच ब्रिटिश कानून के अनुसार करने का अधिकार दिया जाय। लेकिन चीन की सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई। धीरे-धीरे सभी विदेशी इस पर सहमत होते गये कि सिद्धान्त रूप से चीनी कानून कितना भी अच्छा क्यों न हो, व्यवहार में वह पश्चिमी लोगों के अनुकूल नहीं है। अतः चोन को उनके मामलों में पश्चिमी कानूनों को मान्यता दे देनी चाहिए।


युद्ध की घटनाएं 


  • कमिश्नर लिन की कार्यवाही से अंग्रेज व्यापारियों को बड़ी हानि उठानी पड़ी थी क्योंकि लगभग 60 लाख डॉलर मूल्य को अफीम पानी में बहा दी गई थी। इससे वे काफी उत्तेजित थे। इसी बीच, 1839 ई. में कोलून में कुछ शराबी अंग्रेज नाविकों ने एक ग्रामीण चीनी की हत्या कर दी। कमिश्नर लिन ने उन्हें पकड़ने का आदेश दिया, किन्तु इलियट ने उन्हें देने से इन्कार कर दिया। इस पर लिन ने मकाओ को खाने-पीने के सामान की आपूर्ति काट दी और मकाओ के नजदीक सेना तैनात कर दी। इस पर अंग्रेज हांगकांग चले गये और वहां घेरे की तैयारी करने लगे। 3 नवम्बर, 1839 को दो ब्रिटिश जहाजों ने चीनी पोतों को मार भगाया। इस पर चीन ने ब्रिटेन से अपने व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ दिये। यही प्रथम अफोम युद्ध का आरम्भ था।
  • फरवरी, 1840 ई. में ब्रिटिश सरकार ने चीन से युद्ध करने का निश्चय कर लिया तथा अप्रैल में ब्रिटिश संसद ने भी इसको स्वीकृति प्रदान कर दी। विदेश मन्त्री पामर्स्टन ने भारत से 16 जंगी जहाज और चार हजार सैनिकों को दक्षिणी चीन भेजने का आदेश दे दिया। जुलाई में इन बेड़ों ने कैण्टन पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् चीनी तट के उत्तर में स्थित चीनी सेना पर आक्रमण कर यांग्त्सी नदी के मुहाने पर नाकेबन्दी कर ली। ब्रिटिश सेना की सफलता को देखते हुए चीन सरकार ने कमिश्नर लिन को पद से हटा दिया तथा समझौता वार्ता के लिए एक अधिकारी चीशान को नियुक्त किया। 
  • ईलियट और चीशान की बातचीत के बाद जनवरी, 1841 ई. में दोनों पक्षों में समझौता हो गया। सन्धि के अनुसार हांगकांग का क्षेत्र ब्रिटेन को दे दिया गया, राजनयिक समानता स्वीकार की गई क्षतिपूर्ति देने का वायदा किया गया तथा पुनः व्यापार खोलने की व्यवस्था की गई। किन्तु बाद में दोनों पक्षों को यह समझौता मान्य नहीं हुआ, क्योंकि चीन सरकार की दृष्टि में चीशान ने अंग्रेजों को आवश्यकता से अधिक रियायत दे दी थी। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार की राय में ईलियट अधिक रियायतें प्राप्त करने में असफल रहा। अतः एक ओर तो चीशान को पदच्युत कर दिया गया और दूसरी तरफ ईलियट को वापस बुला लिया गया। तत्पश्चात् दोनों पक्षों में पुनः युद्ध शुरू हो गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने ईलियट के स्थान पर हेनरी पोंटिगर को नियुक्त किया, जिसने वहां पहुंचते ही चीनियों के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही आरम्भ कर दी। फलस्वरूप चेसर्न का द्वीप तथा निगपो एवं अमोय नामक नगरों पर ब्रिटिश अधिकार हो गया। शंघाई का बंदरगाह और हांगकांग द्वीप भी अंग्रेजों ने अधिकृत कर लिये। चीन की राजधानी पीकिंग व प्राचीन राजधानी नानकिंग पर भी सीधा आक्रमण किया गया। इसके साथ ही चीन में मंचू शासन के विरुद्ध आन्तरिक विद्रोह भड़क उठा। ऐसी स्थिति में मंचू शासन के समक्ष अंग्रेजों से समझौता करने के अलावा अन्य कोई रास्ता न था।


नानकिंग की सन्धि 


29 अगस्त, 1842 ई. को दोनों पक्षों ने एक सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिये, जो नानकिंग की सन्धि कही जाती है। इसकी मुख्य शर्तें इस प्रकार थी:

  1. कैण्टन, अमोय, फूचाऊ, निगपो और शंघाई-ये पाँच बन्दरगाह अंग्रेज व्यापारियों के निवास एवं व्यापार के लिए खोल दिये गये।
  2. हांगकांग का द्वीप हमेशा के लिए ब्रिटेन को दे दिया गया।
  3. चीन ने आयात और निर्यात पर पांच प्रतिशत की दर से तट कर लेना स्वीकार कर लिया तथा यह व्यवस्था की गई कि पारस्परिक समझौते के बिना तट कर की दर में वृद्धि नहीं की जाएगी।
  4. को-हांग को भंग कर दिया गया तथा ब्रिटिश व्यापारियों को अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति से व्यापारिक लेन-देन का अधिकार दिया गया।
  5. चीन सरकार ने यह स्वीकार किया कि अंग्रेजों पर मुकदमे उन्हीं के कानून के अनुसार और उन्हीं की अदालत में चलेंगे।
  6. चीन सरकार ने दो करोड़ दस लाख डॉलर की क्षतिपूर्ति देना स्वीकार कर लिया।
  7. चीन ने यह भी स्वीकार किया कि भविष्य में चीन में अन्य देशों के लोगों को जो सुविधाएं प्रदान की जायेंगी, वे अंग्रेजों को स्वतः ही प्राप्त हो जायेंगी।

  • यद्यपि युद्ध का मुख्य कारण अफीम का व्यापार था, लेकिन सन्धि में इस व्यापार का कोई उल्लेख नहीं किया गया। अंग्रेजों के प्रतिनिधि ने अनौपचारिक रूप से यह सुझाव अवश्य दिया कि चीन अफीम के आयात को कानूनी रूप दे दे और फिर उस आयात की मात्रा पर रोक लगा दे। लेकिन चीन इस व्यापार को वैधानिक स्वरूप देने को तैयार नहीं था, अत: इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर सन्धि मौन रही। परिणामस्वरूप अफीम का तस्कर व्यापार पहले की भांति ही जारी रहा और दिनों-दिन इसमें वृद्धि होती गई। 1850 ई. के बाद इसकी खपत 50,000 से 60,000 पेटी हो गयी।


युद्ध का महत्व 

  • चीन को निर्णायक पराजय का सामना करना पड़ा। ब्रिटेन की विजय पश्चिमी सभ्यता की विजय थी। इसी विजय के आधार पर चीन का द्वार विदेशियों के लिए खुला। 
  • इस युद्ध से चीन को यह विश्वास हो गया कि उसे यूरोपीय मांगों के समक्ष झुकना पड़ेगा और यूरोपीय लोगों को यह पता चल गया कि चीन उनके आगे टिक नहीं सकेगा। 
  • चीन की पृथकता का युग समाप्त हो गया। इस युद्ध के द्वारा पश्चिम ने चीन पर दबाव डाला कि उसे चीन में व्यापार करने का अधिकार मिलना चाहिए तथा चीन में विदेशियों को समानता के आधार पर स्वीकार किया जाना चाहिये। इस युद्ध से यह स्पष्ट हो गया कि भविष्य में चीन में यूरोपीय सभ्यता के प्रवेश को रोका नहीं जा सकेगा।
  • नानकिंग की सन्धि पूर्वी एशिया में यूरोप के नवीन साम्राज्यवाद को फैलाने में महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। इस सन्धि के द्वारा चीन के सार्वभौम अधिकार पर प्रबल प्रहार हुआ। 
  • चीन अपने आयात और निर्यात पर तटकर निश्चित करने के अधिकार से वंचित हो गया। 
  • सन्धि के द्वारा यह मान लिया गया कि अंग्रेजों पर मुकदमे उन्हीं के कानून के अनुसार उन्हीं की अदालतों में चलेंगे। यह चीन में यूरोपीय राज्यों के क्षेत्रातीत अधिकार का प्रारम्भ था। साथ ही, इसने पूर्वी एशिया में असमान सन्धियों का युग भी प्रारम्भ किया।

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