बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली



  • अंग्रेजी कंपनी इन सूबों के लिए मुगल बादशाह की ओर से दीवान बन गई और इन सूबों से लगान वसूल करने तथा असैनिक न्याय की देखभाल करने का अधिकार उसे प्राप्त हो गया। 
  • निजामत अर्थात् शासन करना और फौजदारी का न्याय बंगाल के नवाब के अधिकार में ही रहा। 
  • शासन को दो भागों में बांटकर दो विभिन्न शक्तियों के हाथों में दे देने के कारण ही इस शासन को दोहरा शासन या द्वैध-शासन कहते हैं।
  • कम्पनी ने दो नायब दीवान नियुक्त किए - बंगाल के लिए मुहम्मद रजा खां और बिहार के लिए राजा शिताब राय। ये नायब दीवान कलकत्ता में रहकर कार्य नहीं करते थे, वरन वे मुर्शिदाबाद और पटना में रहकर कार्य करते थे।
  • इस प्रकार बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासन का उत्तरदायित्व वास्तव में अंग्रेज कम्पनी के कर्मचारी मुहम्मद रजा पर चला गया जो सूबे का नायब दीवान और नायक निजाम था। वही 1772 ई. तक इन सूबों के शासन के लिए उत्तरदायी हुआ।
  • इस प्रकार दीवानी प्राप्त करने के पश्चात भी कम्पनी ने उन सूबों की शासन व्यवस्था को स्पष्टत: अपने हाथ में नहीं लिया। शक्ति को प्राप्त करने के बाद उत्तरदायित्व न संभालना द्वैध-शासन का मूल दोष था।
  • बंगाल में द्वैध शासन आरम्भ से ही असफल हुआ। इसमें कम्पनी के कर्मचारियों के व्यक्तिगत व्यापार के दोष अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गए, क्योंकि अब उन पर नियंत्रण रखने वाला कोई न था।
  • कम्पनी के गुमाश्ते भारतीय जुलाहों को एक निश्चित समय में कपड़ा बनाने के लिए बाध्य करते थे तथा इच्छानुसार उनको मूल्य देते थें 
  • भयानक शोषण के चलते अनेक कारीगर बंगाल छोड़कर चले गए।
  • इस शासन के अंतर्गत कृषि पूर्णत: नष्ट हो गयी। कृषि भूमि प्रतिवर्ष उन ठेकेदारों को दे दी जाती थी, जो अधिक से अधिक लगान देने का वायदा करते ​थे। 

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