सुकरात: मुझे अपनी अज्ञानता का ज्ञान हैं



  • जन्मः एथेन्स
  • पिताः साफ्रानिस्कस जो एक शिल्पकार थे।
  • माताः फीनरीट जो एक गर्भरक्षक धात्री का कार्य करती थी। 
  • प्रसिद्ध कथन ‘उन्हें अपनी अज्ञानता का ज्ञान हैं’

सुकरात की पद्धति


  • सुकरात दार्शनिक नहीं, वरन् नैतिक शिक्षा की उनकी एक विशिष्ट थी जिसे साक्रेटिक पद्धति कहते हैं। इस पद्धति की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

अ. संदेहात्मक पद्धति-

  • अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं होता है अर्थात यह कि परीक्षित सत्य ही यथार्थ सत्य है तथा ग्रहणीय है।
  • सत्य की परीक्षा के लिए हमें संदेह से प्रारंभ करना होगा, किसी समस्या पर संदेह प्रकट करने के लिए सर्वप्रथम वे अपनी अज्ञानता या अनभिज्ञता दिखलाते थे।
  • वस्तुतः वे जानते हुए भी नहीं जानने का आड़म्बर करते थे। इसे साक्रेटिक बिड़म्बना कहते हैं। 

ब. विवादात्मक पद्धति-

  • वे प्रत्येक समस्या का समाधान वाद-विवाद से करते थे। यह प्रश्नोत्तर केवल व्यर्थ नहीं अत्यंत सार्थक तथा शिक्षाप्रद था।
  • सुकरात का विश्वास था कि सम्पूर्ण ज्ञान आत्मा से निहित रहता है।
  • हमारा काम केवल उसे आत्मा से निकालकर विकसित करना है। इस प्रणाली को धात्री प्रणाली कहा गया ह।
  • जिस प्रकार धात्री शिशु की उत्पत्ति में केवल माता की सहायता करती है। उसी प्रकार शिक्षा भी आत्मा में अंतर्निहित ज्ञान के विकास में सहायक करती है।

स. प्रत्ययात्मक पद्धति-
सुकरात के अनुसार-

  • ज्ञान प्रत्ययात्मक होता है।
  • विवेकशीलता तथा पशुता मनुष्य के सामान्य तथा सार गुण है। इन्हीं के आधार पर प्रत्यय का निर्माण होता है।
  • अतः मनुष्य का यथार्थ ज्ञान इसी आधार पर प्रत्यय से जन्य है। इसे परिभाषात्मक पद्धति भी कहते हैं। 

द. आगमनात्मक पद्धति-

  • हम किसी वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों को देखते हैं तथा सभी में कुछ सामान्य गुण का अवलोकन करते हैं। 
  • अंत में कुछ उदाहरणों में साम्य के आधार पर एक सामान्य वाक्य विशेष उदाहरणों के निरीक्षण से प्राप्त होता है।
  • यही आगमन है। परिभाषा आगमन से बनती है। 

य. निगमनात्मक पद्धति-

  • हम किसी वर्ग के कुछ ज्ञात उदाहरणों के आधार पर सामान्य वाक्य बनाते हैं परंतु यह सामान्य वाक्य उस वर्ग के सभी अज्ञात उदाहरणों के लिए भी सामान्यतः सत्य माना जाता है। यही निगमनात्मक पद्धति कहलाता है। 
  • ज्ञान विचार
  • ज्ञान ही सत्य है।
  • ज्ञान के दो रूप होते हैं- बाह्य और आन्तरिक ज्ञान।
  • बाह्य ज्ञान अस्पष्ट, असत्य और संदिग्ध है।
  • आन्तरिक ज्ञान अन्ध-श्रद्धा या विश्वास पर आधारित नहीं वरन् तर्क संगत विश्वास पर आधारित है। (यथार्थ) 
  • बाह्य ज्ञान इन्द्रियजन्य है तथा लोक व्यवहार पर आधारित है।
  • ज्ञान प्रत्ययात्मक है। ज्ञान के प्रत्यय या जातिरूप होने से ज्ञान सार्वभौम और सामान्य बन जाता है। 
  • ज्ञान का अनिवार्य लक्षण - सार्वभौमिकता व वस्तुनिष्ठता।
  • सुकरात के अनुसार सम्प्रत्ययात्मक ज्ञान आत्मा में निवास करती है। बुद्धि उसे बाहर निकालती है। 

द्वन्द्वात्मक विधिः


  • बुद्धि जिस विधि के द्वारा ज्ञज्ञन उत्पन्न करती है, सुकरात इस विधि का उपयोग वार्तालाप पद्धति द्वारा करते हैं।
  • सुकरात के अनुसार वही वस्तु सबसे अधिक वास्तविक (शुभ) है जो सबसे अधिक व्यापक है। इस अर्थ में ‘ज्ञान ही अपने आप में सर्व व्यापक है।’ 
  • इसलिए सुकरात के अनुसार ‘ज्ञान ही शुभ या सद्गुण है।’ (सद्गुण-ज्ञान)
  • जो सद्गुणों को जानता है वह स्वयं सद्गुणी हो जाता है।
  • सुकरात ज्ञान के अन्तर्गत ‘अनुभूति’ को भी स्वीकार कर लेते हैं।
  • मुख्य उद्देश्य है- सत्य की खोज।
  • कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं होता- सुकरात
  • धर्म के ज्ञान के बिना धर्म का आचरण संभव नहीं।
  • ज्ञान शिक्षणीय है, अतः धर्म शिक्षणीय है।

सुकरात की समीक्षा


  • सर्वप्रथम नैतिक सिद्धांतों के वस्तुनिष्ठ स्वरूप का प्रतिपादन किया।
  • सत्य आत्मगत नहीं, सर्वगत है।
  • नैतिकता आत्मनिष्ठ नहीं वरन् वस्तुनिष्ठ होती है।
  • पाप तो अज्ञानमूलक है।
  • हमें पुण्य का ज्ञान नहीं, इसी कारण हम पाप करते हैं।
  • धर्म तो ज्ञान का फल है तथा अधर्म अज्ञान का परिणाम है।


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