प्लेटो: सद्गुण ही ज्ञान है


सुकरात के शिष्य।
उसके दर्शन में अपने पूर्ववर्ती समस्त दर्शनों का समन्यवय है इसलिए प्लेटो को ‘पूर्णग्रीक’ की उपाधि दी जाती है।
पुस्तकें- रिपब्लिक, फिलेबस।
ज्ञान की परिभाषा
ज्ञान वह है जो वस्तुनिष्ठ, तर्कबुद्धि पर आधारित तथा नित्य होता है।
मत
अप्रामाणिक, व्यक्तिनिष्ठ, विश्वास पर आधारित तथा अनित्य ज्ञात वस्तुतः ज्ञान नहीं बल्कि एक मत है।
ज्ञान का साधन
बुद्धि ही एक मात्र ज्ञान प्राप्ति का साधन
इन्द्रिय ज्ञान असंदिग्ध नहीं होता इसलिए इन्द्रिय ज्ञान वास्तविक नहीं होता है।
जैसे- दूर से देखने पर वस्तु गोल व छोटी दिखाई देती है किन्तु पास आने पर वही वस्तु बड़ी चौकोर दिखाई देती है।
ज्ञान का विषय
प्लेटो के अनुसार ज्ञान का विषय वही हो सकता है जो शाश्वत हो किंतु जगत में ऐसा कोई तत्व नहीं जो शाश्वत हो इसलिए प्लेटो के अनुसार जगत सत् नहीं है।
प्लेटो के अनुसार ‘विचार’ ही तत्व है जो तीनों काल में अवस्थित है इसे प्लेटो ने ‘प्रत्यय’ विज्ञान या आईडिया कहा है।
प्रत्ययों की विशेषताएं
प्लेटो के अनुसार प्रत्यय ‘आदर्श’, स्वंभू, चेतन, त्रिकालाबाधित, नित्य, वस्तुनिष्ठ, निर्विकार, शुभ, सामान्य और सम्प्रत्ययात्मक है।
प्लेटो के अनुसार जगत की सत्यता/असत्यता प्रत्ययों पर निर्भर है।
प्रत्यय व कल्पना में भेद
प्लेटो के अनुसार वही प्रत्यय वास्तविक होता है जिसके अनुरूप वस्तु जगत में वस्तु विधमान है।
जैसे- झील का प्रत्यय तभी वास्तविक होगा जब जगत में झील का अस्तित्व हो अन्यथा वह कल्पना मात्र होगा।
चूंकि प्लेटो के प्रत्यय किसी ज्ञात के मन पर आश्रित नहीं होते इसलिए प्लेटो के प्रत्ययवाद को वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद कहा गया है।
प्लेटो का नीतिशास्त्र
न्याय सिद्धांत
प्लेटो ने दर्शन में न्याय को नैतिकता व समन्वय के अर्थ में ग्रहण किया है।
प्लेटो ने व्यक्तिगत आत्मा व सामाजिक आत्मा में तीन सद्गुणों को स्वीकार किया है।
अ. विवेक
ब. साहस
स. संयम (तृष्णा)
प्लेटो के अनुसार तीनों का आत्मा में ठीक सामंजस्य ही न्याय है।
जब यह समन्वय व्यक्तिगत आत्मा में होता है तो उसे व्यक्तिगत न्याय कहते है।
व्यक्तिगत न्याय से व्यक्ति का सर्वांगीण कल्याण होता है।
सामाजिक न्याय
प्लेटो ने समाज (राज्य) को गुणों के आधार पर तीन वर्गों में विभक्त है-
अ. विवेक - राजा
ब. साहस - सैनिक
स. संयम - श्रमिक।
प्लेटो के अनुसार तीनों वर्गों का अपने-अपने गुणों के अनुरूप कार्य करने तथा एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करने की स्थिति ‘सामाजिक न्याय’ कहलाता है।
प्लेटो ने अपने राजनीतिक चिन्तन में निगमनात्मक पद्धति (Deductive Method) का भी काफी प्रयोग किया है। इस पद्धति का सार यह है कि इसमें सामान्य से विशेष की ओर पहुंचा जाता है। इसका अर्थ यह है कि सामान्य सिद्धान्त के आधार पर विशेष के सम्बन्ध में निष्कर्ष निकाले जाते हैं।
प्लेटो ने दार्शनिक राजा का सिद्धान्त इसी पद्धति को आधार बनाकर दिया है। 
प्लेटो के अनुसार, ‘सद्गुण ही ज्ञान है’।

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