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Saturday, January 19, 2019

आजाद हिन्द फौज में शामिल महिलाएं


रानी झांसी रेजिमेंट की स्थापना:-

  • 9 जुलाई, 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने एक विशाल जनसभा में महिलाओं को संगठित किया और ‘रानी झांसी रेजिमेंट’ खड़ी हो गयी।
  • 23 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में महिला कैंप लगा। फिर मलाया व बर्मा के अनेक भागों में भी कैंप लगे। इन कैंपों में महिलाओं को चिकित्सा, नर्सिंग, ड्रिल, नक्शे देखना, सामान्य युद्ध तकनीक, शस्त्र चालन आदि सेना के सभी क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें राइफल से लेकर मशीनगन तक का इस्तेमाल सिखाया गया।
  • बाकायदा सैनिक वेश में सज-धज कर ये महिलाएं 6 से 40 मील तक मार्च करती थी।
  • दैनिक परेड़ में भारत की आजादी के लिए शपथ ली जाती थी।
प्रमुख महिलाएं
कमांडर लक्ष्मी स्वामीनाथन (सहगल) :- 24.10.1914 - 23.07.2012

  • सिंगापुर में जब नेताजी ने वालंटियर महिलाओं को सीधे सेना में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, तो डॉ. लक्ष्मी आगे आयीं और उन्होंने यह उत्तरदायित्व अपने सिर ले लिया।
  • वह आजाद हिंद सरकार में नारी कल्याण और मेडिकल सोशल वेलफेयर की मिनिस्टर भी थी।
  • उनका ओहदा लेफ्टिनेंट कर्नल का था।
  • जब आजाद हिंद फौज हार गयी, तो वह नेताजी के साथ न लौटकर मोर्चे पर अस्पताल में घायलों की सेवा के लिए रुक गयी थी।
  • अस्पताल को बमबारी में ध्वस्त करने से पूर्व अंग्रेजों ने उन्हें व उनके साथियों को पकड़ना चाहा, तब भी कमांडर लक्ष्मी ने अंग्रेजों के सम्मुख आत्मसमर्पण नहीं किया।
  • वह घेरा डालकर गिरफ्तार कर ली गयी। वह एक महीने तक नजरबंद रहीं, पर डॉक्टर होने के नाते उन्हें यातनाएं नहीं दी गयी। उनकी रेजिमेंट भंग कर दी गई थी और उनकी सेना की बहुत-सी युवतियां पहले ही नेताजी के आदेश से अपने घरों को भेज दी गयी थीं। 
  • डॉ. लक्ष्मी को रंगून जेल में रखा गया। जब उनकी गिरफ्तारी पर बहुत बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, तो सरकार को उन्हें इस शर्त पर रिहा करना पड़ा कि वह जन-सभाओं में भाषण नहीं देंगी। पर बाहर आकर उन्होंने इस निषेधाज्ञा को भंग किया।
  • दिल्ली में आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर मुकद्दमा चल रहा था, डॉ. लक्ष्मी ने फिर वहां विरोध प्रदर्शन किया। अधिकारियों ने उन्हें नोटिस दिया कि वह वहां से हट जायें, पर उन्होंने शहर नहीं छोड़ा।
  • दूसरे नोटिस पर भी उन्हें नगर से प्रस्थान करना ही पड़ा। प्रतिबंधों से रिहा होने के एक साल बाद वह भारत आयी और आजाद हिंद फौज के कर्नल सहगल से विवाह कर लक्ष्मी सहगल कहलायी।
  • लक्ष्‍मी सहगल को भारत सरकार ने 1998 में पद्मविभूषण सम्‍मान से सम्मानित किया था।

कैप्टन भारती सहाय:-
  • भारतीय क्रांतिकारी श्री आनंद मोहन सहाय और सती सहाय, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने देश निकाला दे दिया था, की पुत्री भारती का जन्म कोबे (जापान) में हुआ था। 
  • टोकियो के शोवा महिला कॉलेज की छात्रा भारती 1944 में नेताजी से प्रेरणा और अपने पिता से प्रोत्साहन पाकर आजाद हिंद फौज में भर्ती हुई और सैनिक शिक्षा के लिए थाईलैण्ड भेजी गयी।
  • बैंकाक कैंप में लेफ्टिलेंट कोर्स कर, रानी झांसी रेजिमेंट में सेनाधिकारी बनीं।
  • 1945 में रेजिमेंट भंग होने तक वह उसकी गतिविधियों में भाग लेती रही।
  • जपान के पतन के बाद जब आजाद हिंद फौज को हथियार डालने पड़े, तब भारती भी अपनी अन्य साथियों के साथ बंदी बना ली गयीं।
  • जब रिहा हुईं, तो उन्हें बैंकाक में एक अन्य प्रवासी भारतीय परिवार के साथ रहना पड़ा, क्योंकि पिता भी आजाद हिंद फौज में थे और तब तक वह रिहा नहीं हुए थे। 
  • नेहरूजी के हस्तक्षेप से 1946 में श्री सहाय सिंगापुर जेल से छूटे तो भारती पिता के साथ पहली बार भारत आयीं।
  • वह कांग्रेस महिला सेवा दल की प्रशिक्षिका रहीं और तभी अन्य भारतीय नेताओं के संपर्क में आयीं। 
  • 1946 में भागलपुर निवासी डॉ. एल.पी. चौधरी से विवाह कर समाज सेवा में संलग्न हुई।
अन्य महिला सैनिक:-
  • श्री बिशन सिंह की पत्नी श्रीमती वसंत कौर तब शंघाई में एक प्राइवेट नौकरी में थीं।
  • नौकरी छोड़कर रानी झांसी रेजिमेंट में भर्ती हुई और उसमें भाग लेने के अलावा, उन्होंने आजाद हिंद फौज के लिए फंड भी इकट्ठा करके दिया। 
  • श्री दान सिंह की पत्नी वसंत कौर ने सेना की सहायता के लिए नर्सिंग का प्रशिक्षण लिया और आजाद हिंद फौज के लिए अपनी संपत्ति दान कर दी। संपत्ति देने के बाद प्रति मास 20 डॉलर की सहायता भी देती रही।
  • श्री हीरा सिंह की पत्नी हरनाम कौर ने आजाद हिंद फौज फंड में दस हजार डॉलर की और श्री करतार सिंह की पत्नी हर कौर ने 15 हजार डॉलर की सहायता दी।
  • हर कौर स्वयं भी रेजीमेंट में शामिल थी।
  • श्री मेहर सिंह की पत्नी वसंत कौर, श्री जोगिंदर पाल सिंह की पत्नी चित कौर, श्री बुद्ध सिंह की पत्नी हरनाम कौर आदि ने कई पंजाबी महिलाओं के नाम रानी झांसी रेजिमेंट में मिलते हैं, जिन्होंने हर तरह की कुर्बानियां कीं। 
  • प्रत्येक घर से मासिक सहायता, संपत्ति, आभूषणों का दान उस समय प्रवासी भारतीयों में जैसे आम बात थी और महिलाएं यह फंड तथा सैनिकों के लिए आवश्यक सामग्री, खाद्य सामग्री आदि जुटाने में रात-दिन लगी रहती थीं।
  • नेजाती सुभाष चंद बोस की भतीजी बेला मित्र ने अपने पति सहित आजाद हिंद फौज के 22 सैनिकों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलवाने के लिए अथक दौड़-धूप की और गांधीजी की सहायता से इसमें सफल हुईं।
  • यह आजीवन कारावास आजादी के बाद रिहाई में बदल गया।
  • बीमार सैनिकों और बर्मी शरणार्थियों की मदद के लिए भी अनेक महिलाएं आगे आयी थीं। 
  • इनमें बेला मित्र, छाया गुहा, मोहिनी देवी आदि के नाम उल्लेखनीय है।


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