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Friday, August 16, 2019

किस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य सबसे कम होती है?

August 16, 2019 0

  1. किस इकाई द्वारा वायुमण्डल के ओजोन परत की मोटाई नापी जाती है?
    अ. बोरोमीटर
    ब. मैक्सवेल
    स. डॉबसन
    द. इनमें से कोई नहीं
    उत्तर - स
  2. निम्नलिखित में से जीवन की मूलभूत इकाई कौनसी है?
    अ. रक्त
    ब. कोशिका
    स. केन्द्रक
    द. अंग
    उत्तर - ब
  3. धान का ‘खैरा’ रोग किस तत्व की कमी से होता है?
    अ. नाइट्रोजन
    ब. जिंक
    स. मैग्नीशियम
    द. लोहा
    उत्तर - ब
  4. ऑक्टोपस के खून का रंग कैसा होता है?
    अ. नीला
    ब. लाल
    स. गुलाबी
    द. काला
    उत्तर - अ
  5. खाने के सोडा का रासायनिक नाम क्या है?
    अ. सोडियम सल्फेट
    ब. सोडियम क्लोराइट
    स. सोडियम बाइकार्बोनेट
    द. सोडियम कार्बोनेट
    उत्तर - स
  6. क्रायोलाइट किस धातु का अयस्क है?
    अ. एंटीमनी
    ब. एल्यूमिनियम
    स. बेरियम
    द. आर्सेनिक
    उत्तर - ब
  7. सर्वप्रथम मानव ने किस धातु का उपयोग किया?
    अ. लोहे का
    ब. तांबे का
    स. सोने का
    द. चांदी का
    उत्तर - ब
  8. एक शुष्क सेल में कौन सी ऊर्जा पायी जाती है?
    अ. विद्युत चुम्बकीय
    ब. यांत्रिक
    स. विद्युत
    द. रासायनिक
    उत्तर - द
  9. किस रंग के प्रकाश की तरंगदैर्ध्य सबसे कम होती है?
    अ. लाल
    ब. बैंगनी
    स. पीला
    द. नीला
    उत्तर - ब
  10. इलेक्ट्रॉन का एंटी-पार्टिकल क्या है?
    अ. प्रोटॉन
    ब. पॉजीट्रॉन
    स. एल्फा-पार्टिकल
    द. न्युट्रॉन
    उत्तर - ब
  11. कोशिका का ‘पावर हाउस’ कहलाता है?
    - माइटोकॉन्ड्रिया
  12. प्रकाश तरंग का है?
    - अनुप्रस्थ तरंग
  13. रेडियोधर्मिता को मापा जाता है?
    - गिगर-मूलर काउंटर
  14. नाभिकीय रिएक्टर में मंदक के रूप में प्रयोग करते हैं?
    - ग्रेफाइट
  15. एक समतल दर्पण की वक्रता त्रिज्या होती है?
    - अनन्त
  16. किस कारण बारिश की बूंदे गोलकार होती है?
    - सतही तनाव के कारण
  17. वायुदाब की रीडिंग में अचानक गिरावट के किस प्रकार के मौसम की जानकारी प्राप्त होती है?
    - तूफान की
  18. आण्विक संचलन के द्वारा ऊष्मा का संचरण क्या कहलाता है?
    - संवहन
धींगा गणगौर कहाँ की प्रसिद्ध है?
- उदयपुर

राज्य सरकार ने झालावाड़ जिले की पहचान के लिए
किस वन्य जीव को शुभंकर (मैस्कट) घोषित किया है?
(क) काला तीतर
(ख) उड़न गिलहरी
(ग) गगरोनी तोता
(घ) जंगली मुर्गी

सामवेद के मंत्रों को गाने वाले को क्या कहा जाता था?
(क) उद्गाता
(ख) उग्रश्रवा
(ग) धर्मशास्त्री
(घ) होता
उत्तर- क

इनमें से कौनसा प्राणी स्तनपायी है?
(क) मधुमक्खी
(ख) चींटीखोर
(ग) तितली
(घ) मकड़ी
उत्तर - ख

राजस्थान का कौनसा जिला उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ है?
(क) भीलवाड़ा
(ख) राजसमंद
(ग) सिरोही
(घ) धौलपुर
उत्तर - घ

इनमें से किस व्यक्ति ने देश के गृह मंत्री का कार्यभार कभी नहीं संभाला?
(क) पी.गोविंद मेनन
(ख) यशवंत राव चह्वाण
(ग) इंदिरा गांधी
(घ) उमा शंकर दीक्षित
उत्तर - क


Thursday, August 15, 2019

प्रतिवादी धर्मसुधार आन्दोलन

August 15, 2019 0

प्रतिरोधी सुधार आंदोलन

  • प्रोटेस्टेंटवाद के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर कैथोलिक चर्च ने भी अपनी व्यवस्था में सुधार लाने का प्रयास किया। इसे ही प्रतिरोधी सुधार आंदोलन कहा जाता है। इसे ‘कैथोलिक प्रतिक्रिया’ भी कहा जाता है। 
  • पोप पॉल तृतीय (1534-1549) के समय से पोप अधिक योग्य होने लगे तथा चर्च के पदों पर भी चरित्रवान व्यक्तियों की नियुक्तियां की जाने लगीं। इससे प्रतिरोधी सुधार आंदोलन को बल मिला। 
  • 16वीं शताब्दी के धर्मसुधार आन्दोलन तथा प्रोटेस्टेण्टों की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि अपने स्थायीत्व के लिए रोमन कैथोलिक चर्च में भी सुधार आवश्यक हैं। अतः अपनी सुरक्षा की दृष्टि से कैथोलिक मतावलम्बियों ने भी सुधार आन्दोलन को सूत्रपात किया, जिसे प्रतिवादी या प्रतिवादात्मक धर्मसुधार आन्दोलन कहा गया है।
  • इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य चर्च के संगठन एवं कार्यविधि संबंध सिद्धान्तों में परिवर्तन लाना, धर्म सिद्धान्तों की व्याख्या और धर्मप्रचार का कार्य करना था इसके विविध उपाय काम में लाये गये-

क. ट्रेण्ट कौन्सिल 1545-64

  • इटली के ट्रेण्ट नामक स्थान पर 1545 ई. में चर्च की एक परिषद् बुलाई गई, इसकी बैठकें समय-समय पर 18 वर्षो तक होती रही। परिषद् में अनेक कैथोलिक विद्वानों ने भाग लिया तथा चर्च में सुधार लाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
  • 1. भविष्य में चर्च का कोई पद किसी को नही बेचना।
  • 2. सभी बिशपों को अपने कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करना होगा।
  • 3. पादरियों को प्रशिक्षित किया जायेगा।
  • 4. जहां आवश्यक हो जन भाषा में उपदेश देना।
  • 5. पादरियों को कठोर एवं सादा जीवन बिताना होगा।
  • 6. कैथोलिका चर्चो में पूजा की एक सी विधि व एक सी प्रार्थना पुस्तक रखी गई।
  • 7. पोप कैथोलिक चर्च का प्रधान हैं और सभी सिद्धान्तों का अन्तिम व्याख्याता है।
  • 8. पाप-मोचन पत्रों की बिक्री बंद करने का निश्चय किया गया।
  • ट्रेण्ट की परिषद की मुख्य सफलता कैथोलिक चर्च के सिद्धान्तों की स्पष्ट परिभाषा थी इसमें कैथोलिक चर्च को सुदृढ़ एवं निश्चित स्थिति प्रदान की। लैटिन भाषा के साथ-साथ देशी भाषाओं के व्यवहार की भी अनुमति दी गई। यही कारण है कि ट्रेण्ट की परिषद का कैथोलिक चर्च के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थापना है।
  • कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आगे भी अपना-अपना प्रभाव बढ़ाते रहे। इसके परिणामस्वरूप यूरोप में तीसवर्षीय युद्ध 1618-48 के मध्य हुआ। इसका केंद्र जर्मनी था। 
  • 1648 ई. में वेस्टफालिया की संधि के द्वारा अंततः यह युद्ध समाप्त हुआ। 
  • समझौते के अनुसार, उत्तरी जर्मनी ने प्रोटेस्टेंट और दक्षिणी ने कैथोलिक धर्म को अपना लिया। 

ख. जैसुइट संघ ‘सोसायटी ऑफ जीसस’


  • स्पेन में कैथोलिक धर्म की जड़ें गहराई से जमी थीं, अतः प्रतिरोधी सुधार आंदोलन का केंद्र वही बना।
  • सेना से अवकाश प्राप्त एक स्पेनी सैनिक इगनाशियस लोयोला (1491-1556) ने इसे आरंभ किया। सैनिक सेवा से मुक्त होकर उसने अपना ध्यान अध्ययन में लगाया। उसने अनेक संतों की जीवनियां पढ़ीं। इससे धर्म के प्रति उसका दृष्टिकोण बदल गया। स्पेन से वह पेरिस चला गया और धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन किया।
  • उसने वर्ष 1534 में धर्म के प्रचार के लिए सोयायटी ऑफ जीसस नामक संस्था की स्थापना की। इसके अनुयायी जेसुइट कहलााए।
  • अपनी पुस्तक ‘स्पिरिट्यूअल एक्सरसाइजेज’ में लोयोला ने अपने संगठन के नियम प्रतिपादित किए।
  • इस संस्था का पूरा संघटन सैनिक आधार पर था। इसके हर सदस्य को कठोर अनुशासन में रहना होता था तथा दीनता, पवित्रता, आज्ञा पालन और पोप के प्रति समर्पण की शपथ लेनी पडती थी।
  • जेसुइट पोप के एक प्रकार से सैनिक बन गए और कैथोलिक धर्म और पोप की सत्ता का प्रसार करने लगे। इस प्रक्रिया में उनका प्रोटेस्टेंटों से संघर्ष भी हुआ। जेसुइटों ने अपने चरित्र, आचरण और ज्ञान के द्वारा भी भी कैथोलिक संप्रदाय का प्रसार किया।
  • पोप को यूरोप में फिर से सम्मान दिलाने एवं स्थापित करने में जैसुइट संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • जैसुइट लोगों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य विदेशों में धर्म प्रचार करना था।
  • ऐसे साहसी धर्मप्रचारकों में से ही जेक्युअस मार्क्वेते थे, जिन्होंने मिसीसिपी घाटी के उपरी भाग की खोज की थी और वहां के आदिवासियों को ईसाई बनाया था।
  • अपने प्रचार कार्य के सिलसिले में इस संघटन ने स्कूलों, चिकित्सा तथा सेवा केन्द्रों की स्थापना के माध्यम से मानवता का भी काम किया।

ग. इन्क्वीजिशन


  • प्रोटेस्टेण्ट धर्म की प्रगति को अवरूद्ध करने के लिए जो संस्था सबसे शक्तिशाली व प्रभावपूर्ण सिद्ध हुई, वह थी- इन्क्वीजिशन।
  • यह एक विशेष धार्मिक अदालत थी। सन् 1542 ई. में पोप पाल तृतीय ने रोम में इस संस्था को पुनर्जीवित किया, जो सर्वोच्च अधिकारों से युक्त थी। नास्तिक का पता लगाने, उनका कठोर दमन करने, कैथोलिक चर्च के आदेशों को बलपूर्वक लागू करने, धर्म विरोधियों व विद्रोहियों को कुचल देने, दूसरे देशों से भेजी हुई धर्म सम्बन्धी अपीले सुनने इत्यादि उद्देश्यों से सर्वोच्च धार्मिक न्यायालय की स्थापना की गई।
  • प्रोटेस्टेण्टों के विरूद्ध इस न्यायालय ने कठोर कदम उठाये।

प्रोटेस्टेंट आंदोलन का महत्त्व और प्रभाव

प्रोटेस्टेंट आंदोलन के व्यापक और दूरगामी प्रभाव निम्नलिखित प्रकार से पड़े-

  • प्रोटेस्टेंट आंदोलन से ईसाई धर्म स्पष्टतः दो शाखाओं - कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, में विभक्त हो गया।
  • प्रोटेस्टेंट धर्म के अंतर्गत भी अनेक संप्रदाय उभरकर सामने आए, जैसे- इंग्लैंड में ऐंग्लिकन।
  • सुधार आंदोलन ने कैथोलिक धर्म में भी सुधार को आवश्यक बना दिया और इस दिशा में प्रयास किए गए।


उलरिक ज्विंगली 1484-1531


  • कैथोलिक चर्च का विरोध करने वाला लूथर अकेला नही था। उसके समकालीन ज्विंगली ने भी, जो मूल रूप से एक जर्मन था, स्विट्जरलैण्ड के ज्युरिच नगर में, लूथर से प्रभावित होकर चर्च को चुनौती दे डाली।
  • ज्विंगली लूथर से अधिक उग्र विचारवाला था।
  • उसने चर्च में व्याप्त अंधविश्वासों एवं पादरियों के भ्रष्ट जीवन की कटु आलोचना की। वह धार्मिक आडंबरों का विरोधी था। वह चर्च में संतो, मूर्तियों, सुगंधित पदार्थो और मोमबत्तियों को जलाने का विरोधी था। उसने भव्य और गौरवपूर्ण चर्च भवन के स्थान पर सादा चर्च की स्थापना एवं सादे ढंग से प्रार्थना करने पर बल दिया। वह बाइबिल को धर्म का एकमात्र स्रोत मानता था।
  • वह पादरियों के कुंवारेपन का भी विरोधी था।
  • 1525 में उसने रोम से अलग होकर एक रिफॉर्म्ड चर्च की स्थापना कर ली।

  • लूथरवाद की आलोचना में ‘डिफेंस ऑफ सेवन सेक्रामेन्टस’ की रचना किसने की?
  • - हेनरी अष्टम् ने

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Monday, August 12, 2019

समाजशास्त्र परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

August 12, 2019 0

राजनीतिक दन एवं मजदूर संघ किस प्रकार के समूह के उदाहरण है?
— द्वितीयक समूह
'भूमिका एक समूह में एक विशिष्ट पद से संबंधित सामाजिक प्रत्याशाओं एवं व्यवहार प्रतिमानों का एक योग है जिसमें कर्त्तव्यों एवं सुविधाओं दोनों का समावेश होता है।' यह परिभाषा किस समाजशास्त्री ने दी है?
— आगबर्न व निमकाफ
यदि एक स्त्री पत्नी, बहू, माता तथा किसी विभाग की अधिकारी के रूप में अपनी भूमिकाओं में सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई महसूस करती है, तो इस स्थिति को क्या कहते है?
— भूमिका संघर्ष
समुदाय के लिए 'टॉनीज' ने किस शब्द का प्रयोग किया?
— जेमिन्ससाफ्ट
सामाजिक अन्त:क्रिया की दो दशाएं कौन—सी हैं?
— सामाजिक संपर्क और संचार
समाजीकरा किस सामाजिक प्रक्रिया के तहत आता है?
— सहयोग
जब दो भिन्न सांस्कृतिक समूह परस्पर घुल—मिल जाते हैं और एक—दूसरे के मूल्यों, रीति—रिवाजों, प्र​​थाओं, आदर्शों एवं सांस्कृतिक प्रतिमानों को अपना लेते हैं, तो उसे क्या कहते हैं?
— सात्मीकरण
समनर के अनुसार संस्था का उद्विकास किससे प्रारंभ होता है?
— जनरीतियों से
सामाजिक संरचना की अवधारणा का उल्लेख सर्वप्रथम किनके द्वारा किया गया?
— स्पेंसर तथा दुर्खीम
अगस्त काम्ट ने सामाजिक संगठन को क्या माना है?
— एक सामान्य सामाजिक समझौता
प्रकार्यवाद का उल्लेख सर्वप्रथम किस समाजशास्त्री की रचना में मिलता है?
— हरबर्ट स्पेंसर
किस समाजशास्त्री ने चार्ल्स डार्विन के प्राणिशास्त्रीय उद्विकास के सिद्धांत के आधार पर सामाजिक प्रकार्य के संबंध में सर्वप्रथम अपना विचार प्रकट किया?
— हरबर्ट स्पेंसर
किस समाजशास्त्री ने सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान माना है?
— इमाइल दुर्खीम

Sunday, August 11, 2019

धुर्मसुधार आन्दोलन के कारण

August 11, 2019 0


प्रोटेस्टेंट आंदोलन कोई अचानक से नहीं हुआ, बल्कि इसके कारण सदियों से उत्पन्न एकत्रित रूढ़ियां और कर्मकांड थे। इनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित थे- धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक।

धार्मिक कारण

कैथोलिक चर्च की प्रतिगामी नीतियां-

  • चर्च की नीतियां रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी थीं। वह पुरानी परंपराओं और मान्यताओं को बनाए रखना चाहता था। वह सुधार और प्रगति का विरोधी था। तर्क, ज्ञान-विज्ञान और बौद्धिक चिंतन का विकास वह नहीं चाहता था ताकि उसका प्रभाव बना रहे। पुनर्जागरण काल में जब नया चिंतन आरंभ हुआ तो चर्च की प्रतिक्रियावादी नीतियों पर प्रश्न उठने लगे।

पोप का विलासितापूर्ण जीवन-

  • रोमन चर्च का प्रधान पोप होता था। आरंभिक पोपों ने अपनी सच्चरित्रता और सादगीपूर्ण जीवन से ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ाया, परंतु बाद के अनेक पोप अयोग्य, पथभ्रष्ट और विलासी हो गए। उनके पास अपार संपत्ति जमा हो गई जिससे वे विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। इससे पोप के प्रति लोगों की श्रद्धा घटने लगी।

पादरियों का नैतिक एवं चारित्रिक पतन-


  • पोप के समान पादरी भी भ्रष्ट हो गए थे। उनका चारित्रिक पतन हो गया था। चर्च और मठों में अनाचार पनपने लगा था। पादरी न तो शिक्षित और सुयोग्य होते थे, न ही वे लोगों को धर्म की सही शिक्षा देते थे। वे अंधविश्वासों को बनाए रखते थे। चर्चों और मठों में एकत्रित संपत्ति ने उनका जीवन विलासमय बना दिया। सादगी और पवित्रता का स्थान विलासिता एवं आडंबर ने ले लिया था। अतः उनके प्रति लोगों में आस्था कम होती चली गई।

पादरियों का अयोग्य होना-


  • ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ ही चर्चों और मठों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुईं। उनका प्रबंध देखने के लिए बड़ी संख्या में पादरी नियुक्त किए गए। इस प्रक्रिया में योग्यता को तिलांजलि दे दी गई। उनक लोगों को नियुक्त किया जाने लगा जिन्हें धर्म का ज्ञान ही नहीं था। पोप की कृपा पाकर कोई भी व्यक्ति पादरी नियुक्त हो सकता था। पोप अपने विश्वासपात्रों और सगे-संबंधियों को चर्च के उच्च पदों पर तथा पादरियों के रूप में नियुक्त करने लगा। कई लोग पोप को रिश्वत देकर भी चर्च के पद प्राप्त करते थे। इस कारण से लोगों में चर्च के प्रति विरोध उत्पन्न होने लगा।

चर्च की दोषपूर्ण शिक्षा नीति-


  • ईसाई जगत में शिक्षा का दायित्व चर्च का था। चर्च का शिक्षा पर नियंत्रण था। अतः, शिक्षा धर्म से प्रभावित थी। इस प्रकार की शिक्षा में तर्क, ज्ञान-विज्ञान एवं नई चेतना के लिए कोई स्थान नहीं था। इससे भी असंतोष में वृद्धि हुई।

चर्च के अंदर असंतोष- 


  • रोमन चर्च ऊपर से एकात्मक था, परंतु इसमें व्याप्त बुराइयों से पादरियों का ही एक वर्ग असंतुष्ट था। यह पोप और पादरियों के विलासी, भ्रष्ट जीवन तथा प्रतिगामी नीतियों का विरोधी था। यह वर्ग चिंतन-मनन को अधिक महत्त्व देता था तथा ईसाई धर्म की मूल पवित्रता और सादगी को बनाए रखने का प्रयासरत था। इससे चर्च के अंदर ही असंतोष उभरने लगा।

आर्थिक कारण

जनता पर आर्थिक बोझ-


  • चर्च यूरोप का सबसे बड़ा सामंत था। सामंती व्यवस्था के अनुरूप चर्च भी जनता का आर्थिक शोषण करता था। चर्च की संपत्ति तो राज्य द्वारा कर-मुक्त करार दी गई थी, परंतु चर्च स्वयं जनता से विभिन्न प्रकार के कर वसूल करता था। बपतिस्मा, विवाह और अन्य संस्कार करवाए जाने के लिए चर्च धन वसूलता था। साथ ही, वह जनता से उनकी आमदनी का ‘दशांश’ भी कर के रूप में वसूलता था। कर का बोझ समाज के तृतीय वर्ग पर ही था। अतः उनमें असंतोष बढ़ने लगा।

व्यापार एवं नगरीय जीवन का विरोध-


  • चर्च व्यापार और नगरीय व्यवस्था का विरोधी था। अर्थव्यवस्था में बदलाव आने एवं भौगोलिक खोजों और व्यापारिक मार्गों से व्यापार का विकास हो रहा था तथा नगरों का पुनरुत्थान हो रहा था, परंतु चर्च प्रतिगामी नीतियां अपना रहा था। चर्च सूद लेना-देना अधार्मिक कृत्य मानता था। इसी प्रकार नगरों का वातावरण स्वच्छंद रहने के कारण चर्च नगरीय जीवन का भी विरोधी था। अतः व्यापारी और नगरीय वर्ग चर्च का विरोधी बन गया।

पापमोचन-पत्रों की बिक्री-


  • चर्च की जिन आर्थिक नीतियों ने लोगों को सबसे अधिक उद्वेलित किया वह था पापमोचन-पत्रों अथवा मुक्ति-पत्रों (indulgences) को बेचने की व्यवस्था। इसके अनुसार कोई भी पाप करनेवाला व्यक्ति इन मुक्ति-पत्रों को खरीदकर अपने पापों से छुटकारा पा सकता था। कभी ये मुक्ति-पत्र स्वेच्छा से खरीदे जाते थे तो बहुधा इन्हें खरीदने के लिए दबाव डाला जाता था। इस प्रकार से अर्जित धन जनहित के कार्यों अथवा चर्च की व्यवस्था पर खर्च नहीं कर पोप और पादरियों के भोग-विलास पर खर्च किया जाता था। इससे भी लोगों में असंतोष उत्पन्न हुआ।


राजनीतिक कारण

चर्च और राज्य में संघर्ष-


  • तत्कालीन व्यवस्था के अनुरूप राजा राजनीतिक जीवन का और पोप धार्मिक जीवन का प्रधान था। पोप से मान्यता प्राप्तकर ही कोई भी राजा शासक बनता था। धीरे-धीरे राजा पोप की नियुक्ति में दखल देने लगे। इससे राज्य और चर्च का संबंध कटु हो गया। दोनों अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास करने लगे। पोप ग्रेगोरी ने तो सम्राट हेनरी चतुर्थ को धर्म से बहिष्कृत ही कर दिया।  इससे पोप और रोमन चर्च का प्रभाव बढ़ने लगा। शक्तिशाली राजा पोप के वर्चस्व को चुनौती देने का प्रयास करने लगे।

चर्च का राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप-


  • चर्च और राज्य के बीच मनमुटाव का एक कारण यह भी था कि चर्च राज्यों के आंतरिक मामलों में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करता रहता था। विरोध करने पर राजा को धर्म बहिष्कृत ही कर दिया जाता था। इससे चर्च राज्यों में अलोकप्रिय होता गया। राजा और चर्च के बीच मतभेद का एक कारण धार्मिक न्यायालय भी थे। 
  • चर्च का अपना न्यायालय था। इसमें अनेकों बार निर्दोष लोगों को सजा दी जाती थी तथा वैसे राजद्रोहियों को मुक्त कर दिया जाता था जिन पर देशद्रोह के गंभीर आरोप लगे हुए हो। यह राजशक्ति की सीमाओं का उलंघन था। चर्च की संपत्ति भी विवाद का एक कारण बनी। चर्च के पास बेशुमार चल-अचल संपत्ति थी जिसे इस पर कर नहीं देना पड़ता था। दूसरी ओर राजा अपने सैनिक और प्रशाकीय खर्चों के लिए चर्च की संपत्ति पर कर लगाना चाहते थे। चर्च ऐसा होने नहीं देना चाहता था। इससे दोनों के बीच टकराव बढ़ने लगा।

राष्ट्रीय राज्यों का उत्कर्ष-


  • 16वीं शताब्दी में राष्ट्रीयता की भावना के विकास के साथ ही यूरोप में शक्तिशाली राष्ट्रीय राज्यों का उदय और विकास हुआ। ये राज्य पहले से अधिक शक्तिशाली थे। अपनी सेना के बल पर वे एक प्रकार से निरंकुश शासक बन गए। ये राज्य के मामलों में रोम के पोप के हस्तक्षेप के विरोधी थे। साथ ही प्रतिवर्ष रोम को भेजे जाने वाले धन को राष्ट्रीय धन का गलत निष्कासन मानकर इसे रोकने का प्रयास किया गया। राज्य स्वयं ही चर्च की संपत्ति अपने नियंत्रण में लेकर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। फलतः धर्मसुधार के पूर्व राज्य और चर्च के बीच संबंध कटुतापूर्ण बन गए।

बौद्धिक कारण


  • धर्मसुधार आंदोलन का एक प्रमुख कारण पुनर्जारण काल का बौद्धिक विकास था। पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप मानवतावादी विचारधारा का उदय और विकास हुआ। इसने चर्च के भी अनेक सदस्यों को आकृष्ट किया। इन लोगों ने ईसाई धर्म की सरलता और सादगी को बनाए रखने एवं धार्मिक आडंबरों को त्यागने का आह्वान किया। मानव को वे मुक्त और विवेकपूर्ण मानते थे। वे एक दूरवर्ती ईश्वर में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि यद्यपि ईश्वर ने मानव को बनाया था तथापि उसे अपना जीवन इच्छानुसार व्यतीत करने का पूरा अधिकार है। वे पारलौकिक जीवन को सुखमय बनाने की अपेक्षा भौतिकवादी सिद्धांतों में विश्वास रखते थे तथा वर्तमान जीवन को ही सुखी-संपन्न एवं शांतिपूर्ण बनाना चाहते थे। छापाखाना के आविष्कार और बड़ी संख्या में पुस्तकों के प्रकाशन से मानवतावादी विचारधारा का तेजी से प्रसार होने लगा। 
  • विश्वविद्यालय इस नई चेतना के केंद्र बन गए। 
  • बाइबिल के प्रकाशन से लोगों ने ईसाई धर्म की मूल बातों को समझ लिया। लोगों ने यह भी देखा कि कैसे चर्च ने बाइबिल के सिद्धांतों के विपरीत लोगों को मूर्ख और अज्ञानी बना रखा था। 
  • मानवतावादी विचारधारा से ओतप्रोत पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 
  • चर्च की व्यवस्था और उसकी भूमिका को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। 
  • टॉमस मूर और इरैस्मस ने अपनी रचनाओं द्वारा चर्च पर प्रहार किया। टॉमस मूर ने यूटोपिया में चर्च के बंधनों से मुक्त एक आदर्श समाज की कल्पना की।
  • इरैस्मस ने अपनी पुस्तक ‘इन दि प्रेज ऑफ फॉली’ में चर्च में व्याप्त कुरीतियों की कटु आलोचना की। 
  • इस सबके परिणामस्वरूप लोगों का चर्च के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगा। इसने प्रोटेस्टेंट आंदोलन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 

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Saturday, August 10, 2019

धर्मसुधार आंदोलन के प्रमुख सुधारक

August 10, 2019 0

  • 14वीं शताब्दी से ही सुधारवादियों का यूरोपीय धार्मिक मंच पर आगमन हो गया था। उन्होंने चर्च के संगठन के दोषों एवं पादरी जीवन में विद्यमान अनैतिकता का विरोध किया तथा परिवर्तन की मांग की।प्रारम्भिक सुधारकों ने आगे चलकर मार्टिन लूथर जैसे सुधारकों के लिए सशक्त पृष्ठभूमि तैयार की।

जान वाइक्लिफ 1320-84

  • वाइक्लिफ ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का एक प्राध्यापक था उसने कैथोलिक धर्म की बहुत सी परम्पराओं तथा चर्च के क्रियाकलापों की आलोचना की। उसने घोषित किया, ' पोप पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि नही है तथा भ्रष्ट एवं विवेकहीन पादरियों द्वारा दिये जाने वाले धार्मिक उपेदश व्यर्थ है।'
  • उसका कहना था कि प्रत्येक ईसाई को बाइबिल के सिद्धान्तों के अनुसार काम करना चाहिए और इसके लिए चर्च या पादरियों के मार्ग निर्देशन की आवश्यकता नहीं है।
  • कैथोलिक चर्च की भाषा अब तक लैटिन थी, जिसे आम लोग नही समझते थे। वह जन भाषाओं में धर्मग्रंथों के अनुवाद के पक्ष में था।
  • उसने मांग की कि चर्च की विपुल धन-सम्पत्ति पर राज्य को अधिकार कर लेना चाहिए। उसके विचार एक सीमा तक क्रांतिकारी थे, जिन्हें रूढिवादी धर्माधिकारी सहन नही कर पाये।
  • उस पर धर्मद्रोह का आरोप लगाया गया परन्तु सामान्य जनता में उसकी लोकप्रियता से डर कर वे उसके विरूद्ध कोई सख्त कार्यवाही नही कर पाये।
  • 1384 ई. में जब उसकी मृत्यु हुई, तब पादरियों ने उसके मृत शरीर को कब्रिस्तान से निकलवाकर गन्दी जगह फिंकवा दिया।
  • उसे ‘द मार्निंग स्टार ऑफ रिफार्मेशन’ (धर्मसुधार का प्रात:कालीन तारा) कहा गया। उसके अनुयायी ‘लोलाडर्स’ कहलाते थे।
  • 1381 ई. में के किसान विद्रोही लोलार्डों से प्रभावित थे। अत: सरकार ने लोलार्डों का क्रूरतापूर्वक दमन किया।

जॉन हस 1369-1415 ई.

  • हस बोहेमिया ‘चेक’ का निवासी था और प्राग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था। उसके विचारों पर वाइक्लिफ का गहरा प्रभाव था। उसकी मान्यता थी कि एक सामान्य ईसाई, बाइबिल के अध्ययन से ही मुक्ति का मार्ग खोज सकता है और इसके लिए चर्च आदि के सहयोग की आवश्यकता नही है। 
  • वह पोप के पतित जीवन तथा चर्च की कुरीतियों का कटु आलोचक था।
  • चर्च की निन्दा और नास्तिकता का प्रसार रोकने के आरोप में उसे जिन्दा जला दिया था।

सेवोनारोला  1452-88 

  • वह फ्लोरेंस नगर का विद्वान पादरी तथा राजनीतिज्ञ था। उसने पोप के राजसी ठाठ की आलोचना की तथा चर्च के क्रिया कलापों में सुधार पर जोर दिया।
  • तत्कालीन पोप एलेक्जेण्डर षष्टम् ने उसे अपने विचारों का प्रचार बंद करने का आदेश दिया, जिसका उसने पालन नही किया। 
  • इस पर चर्च ने उसे चर्च की महान् परिषद् के सम्मुख स्पष्टीकरण के लिए बुलाया और चर्च की निंदा करने के आरोप में भी जिंदा जला दिया गया, उसके शव की राख ले जाकर नदी में फेंक दी।

इरेस्मस 1466-1536

  • हॉलैण्डवासी इरेस्मस विचारों की गहनता एवं सुन्दर लेखन शैली के कारण शीघ्र ही यूरोप का विख्यात विद्वान बन गया। 1511 ई. में उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द प्रेज ऑफ फॉली’/ मूर्खता की प्रशंसा लिखी।
  • इस पुस्तक के द्वारा उसने लोगों का ध्यान सहज ही चर्च की बुराइयों की ओर खींचा। इसमें भिक्षुओं की अज्ञानता एवं उनके सहज विश्वास की आलोचना की गयी। प्रहसनों एवं उपहासों के माध्यम से पोप की कहीं अधिक खिल्ली उडाई। 
  •  इरेस्मस ने ईसाई धर्म के मूल सिद्धान्तों के प्रचार हेतु ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ का 1516 ई. में नया संस्करण निकाल कर धर्म की उत्पत्ति की व्याख्या की।

मार्टिन लूथर 1483-1546 

  • लूथर का जन्म 10 नवंबर, 1483 ई. को जर्मनी के एक निर्धन किसान परिवार में हुआ। 
  • लूथर प्रारम्भ में पोप का विरोधी नही था परन्तु 1517 ई. में टेटजेल को सेन्ट पीटर गिरजाघर के निर्माण हेतु, क्षमा-पत्र बेचकर धन इकट्ठा करने की पोप की आज्ञा ने, लूथर को चर्च विरोधी बना दिया। इसके विरोध में विटनबर्ग के कैसल गिरजाघर के प्रवेशद्वारा पर 31 अक्टूबर 1517 को अपना विरोध-पत्र ‘द नाइन्टी फाईव थीसिस’ लटका दिया।
  • इन 95 स्थापनाओं अथवा कथनों में चर्च द्वारा सभी उपायों से धन एकत्र करने की आलोचना की गयी थी। पहले लैटिन भाषा में बाद में जर्मन में अनुवाद। जॉन हस के विचारों को अपनाने को कहा।
  • उसने तीन लघु पुस्तिकाएं ‘पेम्फलेट’ प्रकाशित किये।इन पुस्तिकाओं में उन मूलभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया, जिन्हें आगे चलकर ‘प्रोटेस्टेन्टवाद’ के नाम से अभिहित किया। 
  1. ‘एन एडृेस टु नोबिलटि ऑफ द जर्मन नेशन’ जर्मन राष्ट्र के सामंतवर्ग के प्रति एक अपील में उसने चर्च की अपार सम्पत्ति का वर्णन करते हुए जर्मन शासकों को विदेशी प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया।
  2.  द बेबीलोनियन केप्टिविटी ऑफ द चर्च ‘चर्च की बेबीलोलियायी कैद’ में उसने पोप और उसकी व्यवस्था पर प्रहार किया।
  3.  द फ्रीडम ऑफ क्रिश्चियन मैन ‘एक ईसाई मनुष्य की मुक्ति’ में उसने मुक्ति के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया और ईश्वर की अनुकम्पा पर अटूट विश्वास की प्रतिष्ठा की। इन्हीं लघु पुस्तिकाओं में प्रतिपादित सिद्धान्त आगे चलकर प्रोटेस्टेण्ट बाद के आधारभूत तत्व बने।
  • 1520 में लूथर को धर्म से निष्कासित कर दिया। इस अवधि में उसका मित्र सैक्सनी का शासक उसका संरक्षक रहा। जर्मनी के अनेक शासक चर्च विरोधी थे, अतः लूथर को धर्म से बहिष्कृत किया गया, तो उसे कोई क्षति नही हुई।
  • रोम के पवित्र साम्राज्य का अध्यक्ष चार्ल्स पंचम, यद्यपि पोप का समर्थक था, परन्तु वह युद्धों में इतना उलझा हुआ था कि बढते हुए धार्मिक असन्तोष को कुचलने में असमर्थ रहा।
  • दूसरी ओर मार्टिन लूथर ने आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अथक प्रयास किया तथा भाषणों, लेखों एवं पत्रिकाओं द्वारा समाज के सभी वर्गो में जागृति उत्पन्न की।
  • इस जागरण में शहरी मध्यमवर्ग के विभिन्न समूह तथा दस्तकारों की भूमिका सबसे प्रमुख थी।
  • 1521 ई. में जर्मन राज्य की वर्म्स में आयोजित सभा ने उसे अपने विचार वापस लेने को कहा उसने कहा कि वह ऐसा कर सकता है, यदि उसकी बातें तर्क और प्रमाण के द्वारा काट दी जाये। इस सभा में उसकी रचनाओं को गैर कानूनी घोषित कर दिया तथा उसे कानूनी रक्षा से बंचित कर दिया।
  • उसने बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद किया।

लूथर के विचार एवं उनका प्रसार 

  1. उसने ईसा और बाइबिल की सत्ता स्वीकारने तथा पोप और चर्च की दिव्यता एवं निरंकुशता को नकारने की बात कही।
  2. चर्च द्वारा निर्धारित कर्मों के स्थान पर उसने ईश्वर में आस्था को मुक्ति का साधन बताया।
  3. ‘सप्त संस्कारों’ में से उसने केवल तीन नामकरण, प्रायश्चित और पवित्र प्रसाद/रोटी को ही माना।
  4. चर्च के चमत्कार में अविश्वास व्यक्त किया।
  5. किसी भी व्यक्ति को न्याय से उपर नही होना चाहिए।
  6. रोम के चर्च के प्रभुत्व का अन्त करके राष्ट्रीय चर्च की शक्ति को सबल बनाया जाना चाहिए।
  7. धर्मग्रंथ सबके लिए हैं, सब उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते है।
  8. चर्च के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पादरी लोगों को विवाह करके सभ्य नागरिकों की तरह रहने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  9. मुक्ति केवल ईश्वर की असीम दया, ईश्वर में श्रद्धा तथा भक्ति के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है, धर्माधिकरियों की कृपा से नहीं।
  • क्षमायाचना से विशेष लाभ नही होता है। जो व्यक्ति वास्तव में पश्चाताप करता है। वह यातना से भागता नही है, अपितु पश्चाताप की चिरस्मृति को बनाए रखने के लिए उसे सहर्ष सहन करता है। जब वह अन्तःकरण से पश्चाताप करता है, उसे अपने पाप तथा यातना दोनों से मुक्ति मिल जाती है।
  • उसने कैथोलिक चर्च की श्रेणीबद्ध व्यवस्था को अस्वीकार किया। जर्मन भाषा को चर्च के कार्य व्यवहार की भाषा बनाया। मठवाद का अन्त किया। धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में पुरोहितों के विशेष पदों को समाप्त किया। देववाद के सिद्धान्तों एवं धर्म ग्रंथों की सत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। तीर्थयात्रा एवं अवषेशों की यात्रा को गौण माना।
  • लूथर का धर्म सुधार आन्दोलन वस्तुतः लोकप्रिय व राष्ट्रीय आन्दोलन था। उसने सदाचारी ईसाइयों को अपने धर्म सुधार आन्दोलन की ओर आकर्षित किया। लूथरवादी शिक्षाओं में जर्मनी के देशभक्तों को भी अत्यधिक प्रभावित किया क्योंकि वे विदेशी पुरोहितों की शोषणात्मक नीति का अन्त करना चाहते थे। उसके समर्थकों ने कैथोािलक चर्च के विरूद्ध विद्रोह किया, चर्च की जागीरे व जायदाद छिन ली तथा कैथोलिक पूजा, उपासना का परित्याग कर दिया।
  • कैथोलिका मठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिये गये। पोप की राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिका सत्ता अमान्य की गयी। ‘जर्मनी केवल जर्मनों के लिए है’ कहकर लूथर ने अपने समर्थकों एवं सहयोगियों की संख्या में वृद्धि की।
  • लूथर द्वारा जनसाधारण की भाषा का प्रयोग उसकी सफलता का एक मुख्य कारण था।
  • मार्टिन लूथर के विचारों के तेजी से पनपने का एक अप्रत्याशित परिणाम यह निकला की जर्मनी में कृकों के विद्रोह की शुरूआत हो गई। कार्ट्सतेद्त, टॉमस मुत्जर जैसे लोगों के नेतृत्व में लूथरवाद ने अधिक उग्र सुधारवादी रूप धारण कर लिया था। इस पृष्ठभूमि में केन्द्रीय तथा दक्षिण-पश्चिम जर्मनी में 1525 ई. में कृषक युद्ध हुए। 
  • वे कृषिदास प्रथा, सामन्ती कर, धार्मिक कर, वन सम्पदा के उपयोग पर नियंत्रण आदि के प्रचलन के विरूद्ध आन्दोलनरत थे।
  • किसानों की यह मान्यता थी कि लूथर धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का भी समर्थक होगा। अतः वे अपने आन्दोलन के समर्थन में लूथर से काफी आशा कर रहे थे। परन्तु इसके विपरीत लूथर ने विद्रोह को दबाने में शासकों एवं जमींदारों का साथ दिया। इसका प्रमुख परिणाम यह निकला कि लूथरवाद उत्तरोत्तर निम्नवर्गीय शक्तियों की सहानुभूति खोता गया और क्रमषः जर्मन नरेशों पर अधिकाधिक आश्रित होता गया।
  • आर्थोडोक्स चर्च के अनुसार सात संस्कार हैं- जन्म संस्कार, मान्यता प्रदान ‘दीक्षा’, विवाह और अन्तिम संस्कार।

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Thursday, August 1, 2019

वर्ल्ड पैरा निशानेबाजी में निशा कंवर ने साधा स्वर्ण पर निशाना

August 01, 2019 0
वर्ल्ड पैरा निशानेबाजी में निशा कंवर ने साधा स्वर्ण पर निशाना

क्रोएशिया मं आयोजित वर्ल्ड पैरा निशानेबाजी में राजस्थान के सीकर जिले के महरौली गांव निवासी निशा कंवर ने स्वर्ण पदक जीत कर देश का मान बढ़ाया है। 23 वर्षीय निशा ने 29 जुलाई को 10 मीटर पिस्टल स्पर्द्धा में 230.7 अंकों के साथ स्वर्ण पदक पर निशाना साधा। 

मिक्स टीम स्पर्द्धा में जीता स्वर्ण

30 जुलाई को आयोजित क्रो​एशिया में निशा ने मिक्स टीम स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक जीता है। 
बता दें कि निशा कंवर बचपन से सेरबल पाल्सी (मांसपेशियों में खिंचाव) की बीमारी से ग्रसित है। निशा ने तीन साल पहले ही निशानेबाजी शुरू की थी। 

निशा को निशानेबाजी की प्रेरणा अपने जीजा नेशनल शूटर डॉ. रघुवीर सिंह राठौड़ से मिली। उन्होंने मार्च 2018 में उसे अजमेर की करणी शूटिंग रेंज एकेडमी अजमेर में दाखिला ​दिलाया। वहां अभ्यास करते हुए निशा कंवर ने जुलाई 2018 में आयोजित करणी शूटिंग रेंज अजमेर जिला स्तरीय प्रतियोगिता में पहला स्वर्ण पदक जीता।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के महानिदेशक पद का कार्य भार किसने संभाला?
राकेश अस्थाना
किस भारतीय मूल की डॉक्टर ने मिस इंग्लैंड का खिताब जीता है,
भाषा मुखर्जी 
'रैमन मैगसेस' से किसे सम्मानित किया गया है?
पत्रकार रविश कुमार
विश्व बैंक ने जारी की पैश्विक जीडीपी रैंकिंग में भारत का 7वां स्थान पर रहा वहीं शीर्ष स्थान पर कौन सा देश रहा?
अमेरि​का
चौथा दक्षिण एशियाई स्पीकर सम्मेलन किस देश में आयोजित किया जाएगा?
मालदीव
किस राज्य ने 'सेव ग्रीन, सेव क्लीन' अभियान शुरू किया है?
पश्चिम बंगाल
केन्द्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या कितनी कर दी है?
33
वर्ल्ड वाइड वेब डे कब मनाया जाता है?
1 अगस्त

Thursday, July 18, 2019

नवोदय विद्यालय भर्ती 2370 पदों पर ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि 9 अगस्त

July 18, 2019 0

NVS

  • नवोदय विद्यालय समिति (NVS Recruitment 2019) ने टीचिंग एवं नॉन-टीचिंग के विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किये। इस भर्ती में 2370 क्लर्क, शिक्षक (PGT, TGT), स्टाफ नर्स और अन्य रिक्तियों पदों पर भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए हैं। योग्य उम्मीदवार आवेदन 10 जुलाई 2019 से कर सकते हैं। ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि और शुल्क का भुगतान करने की अंतिम तिथि 9 अगस्त, 2019 है।


अध्यापक पद की तैयारी करने वालों के लिए

पोस्ट ग्रेजुएट टीचर्स (PGT)
कुल पदों की संख्या: 430 पद
आयु सीमा: 40 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए।
वेतनमान: 47600 – 151100 प्रति माह Level 8
इसके तहत इतिहास, भूगोल, हिन्दी, इंग्लिश, जीवविज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र और कम्प्यूटर साइंस आदि के परीक्षार्थियों के लिए एक सुनहरा मौका है।
योग्यता के लिए आप अपने विषय में मास्टर की डिग्री के साथ बी.एड. डिग्री अनिवार्य है। हिन्दी और इंग्लिश में पढ़ाने की योग्यता हो। अधिक जानकारी के लिए विभाग की विज्ञप्ति पढ़ें।

ट्रेंड ग्रेजुएट टीचर्स TGT
इसके अंतर्गत हिन्दी, इंग्लिश, गणित, सोशल साइंस, साइंस आदि विषयों के लिए कुल पदों की संख्या: 1154 पद
आयु सीमा: 35 वर्ष से अधिक नहीं, आरक्षित वर्ग को आयु सीमा में छूट है।
वेतनमान: 44900-142400/- प्रति माह
ग्रेड वेतन: Level 7
योग्यता: स्नातक के साथ बी.एड. डिग्री और सीटीईटी पास होना आवश्यक है।

नॉन—टीचिंग पद

लोवर डिविजन क्लर्क LDC
कुल पदों की संख्या: 135 पद
आयु सीमा: 18 से 27 वर्ष
वेतनमान: 19900 – 63200/- Level 2
योग्यता: 12वीं पास व टाइपिंग नॉलेज हिन्दी (25 शब्द प्रति मिनट) व इंग्लिश(30 शब्द प्रति मिनट)

पोस्ट का नाम: स्टाफ नर्स
रिक्ति की संख्या: 55 पद
वेतनमान: 44900-142400/- प्रति माह Level -7

पोस्ट का नाम: कैटरिंग सहायक
रिक्ति की संख्या: 26 पद
योग्यता: 10वीं पास और तीन वर्षीय कैटरिंग का डिप्लोमा
आयु सीमा: 35 वर्ष तक
वेतनमान: 25500–81100/- प्रति माह Level -4

नोट—
आयु सीमा: (09.08.2019 को) 18 से 27 साल, 18 से 32 वर्ष, 40 साल & 45 साल

आयु में छूट: अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए 05 साल और ओबीसी के लिए 03 साल

राष्ट्रीयता: भारतीय

कार्य स्थानः सम्पूर्ण भारत में कहीं पर भी

चयन प्रक्रिया: चयन लिखित परीक्षा और साक्षात्कार पर आधारित होगा।

आवेदन शुल्क:

नवोदय विद्यालय समिति में जो भी योग्य उम्मीदवार हैं वह इस प्रकार से विभिन्न पदों पर आवेदन के लिए भर्ती शुल्क जमा करवा सकता है।
सहायक आयुक्त के लिए 1500/,
पीजीटी, टीजीटी और अन्य पदों एवं नर्स के लिए 1200/- और कानूनी सहायक, कैटरिंग सहायक और क्लर्क के लिए 1000/- रुपए ऑनलाइन या चालान के माध्यम से परीक्षा शुल्क का भुगतान करें, एससी / एसटी / पीएच / महिला उम्मीदवारों के लिए कोई शुल्क नहीं।

NVS भर्ती कैसे आवेदन करें:

योग्य उम्मीदवारों को एनवीएस की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन करना आवश्यक है।
उम्मीदवार द्वारा हाल में खिंचाया पासपोर्ट साइज का फोटो का उपयोग करना चाहिए।
अपना एक वैध ईमेल आईडी होना चाहिए।
स्पीड पोस्ट प्रमाण पत्र/आईडी प्रमाण आदि की स्वयं सत्यापित फोटो प्रतियों के एक सेट के साथ निर्धारित प्रारूप में अपना आवेदन भेज सकते हैं।

आवेदन संबंधी महत्वपूर्ण तिथियां

ऑनलाइन आवेदन जमा करने की तिथि: 10 जुलाई 2019 से शुरू
ऑनलाइन आवेदन की अंतिम तिथि: 09 अगस्त 2019
शुल्क का भुगतान करने की अंतिम तिथि: 12 अगस्त 2019
लिखित परीक्षा / सीबीटी (टेंटेटिव) की तारीख 5 से 10 सितंबर, 2019

एनवीएस भर्ती 2019 महत्वपूर्ण लिंक:

विज्ञापन लिंक-https://drive.google.com/file/d/1-FxNbwZNb251QfUFzD7OZSQIaJhr-rVC/view
ऑनलाइन आवेदन करें- https://navodaya.gov.in/nvs/en/Recruitment/Notification-Vacancies/
वेबसाइट- https://navodaya.gov.in/nvs/en/Home1/

नोट: नवोदय विद्यालय भर्ती 2019 से संबंधित पूरी जानकारी के लिए विभाग की वेबसाइट पर जाएं और नोटिफिकेशन जरूर पढ़ें।
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