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Monday, December 25, 2017

बलबन का राजत्व सिद्धांत



  • बलबन दिल्ली सल्तनत का ऐसा पहला शासक था जिसने सुल्तान के पद और अधिकारों के बारे में विस्तृत रूप में विचार प्रकट किए। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए ‘रक्त एवं लौह की नीति’ अपनाई। बलबन के राजत्व सिद्धांत की दो मुख्य विशेषताएं थीं-
  • 1. सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ होता है और उसके आदेशों का उल्लंघन ईश्वर के आदेशों का उल्लंघन है।
  • 2. सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है। 
  • बलबन के अनुसार ‘सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि (नियामत-ए-खुदाई) है और उसका स्थान केवल पैगम्बर के पश्चात् है। सुल्तान को कार्य करने की प्रेरणा और शक्ति ईश्वर से प्राप्त होती है। इस कारण जनसाधारण या सरदारों को उसके कार्यों की आलोचना करने का अधिकार नहीं है।’
  • बलबन अपने को ‘फिरदौसी के शाहनामा’ में वर्णित ‘अफरासियाब वंशज’ तथा शासन को ईरानी आदर्श के रूप में सुव्यवस्थित किया।
  • उसने पुत्र बुगरा खां से कहा था कि, ‘सुल्तान का पद निरंकुशता का सजीव प्रतीक है।’
  • बलबन अपने अधिकारियों से यह आशा करता था कि वे ईमानदार, न्यायप्रिय और धर्मपरायण हों। इसी कारण बलबन न केवल सुल्तान अपितु सम्पूर्ण शासन के प्रति भय ही नहीं बल्कि सम्मान भी स्थापित करने में सफल हुआ।
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  • बलबन ने सुल्तान के पद की प्रतिष्ठा के लिए अनेक कदम उठाये - 
  • 1. अपने व्यवहार को अत्यन्त गम्भीर एवं एकाकी बना लिया। इसके लिए उसने शराब पीना बन्द कर दिया, विनोदप्रिय व्यक्तियों के साथ बैठना बन्द कर दिया। वह दरबार में न हंसता था और न मुस्कराता था।
  • 2. वह कभी-भी पूर्ण वेशभूषा के बिना किसी के सम्मुख नहीं आता था।
  • 3. उसने दरबारियों के लिए ‘सिजदा’ (भूमि पर लेटकर अभिवादन करना) और पैबोस (सुल्तान के चरणों को चूमना) की रीतियां आरम्भ की, ऊंचे और भयावह व्यक्तियों को अंगरक्षक बनाया जो उसके सिंहासन के दोनों तरफ चमकती हुई नंगी तलवारें लेकर खड़े रहते थे। 
  • 4. बलबन ने अपने दरबार को ईरानी ढंग से सजाया तथा दरबार की भव्यता एवं वैभव में वृद्धि की। शान-शौकत और सत्ता के इन प्रदर्शनों का प्रभाव सरदारों एवं जनसाधारण पर पड़ा और सुल्तान की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।

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