सवाई जयसिंह द्वितीय

सवाई जयसिंह द्वितीय


 ‘चाणक्य’ सवाई जयसिंह द्वितीय

  • जन्मः 3 सितम्बर 1688 ई., 1700-43
  • बिशनसिंह का ज्येष्ठ पुत्र
  • औरंगजेब ने उसकी वीरता व वाक्पटुता देखकर उसे सवाई की उपाधि प्रदान की।
  • 2 जून, 1707 ई. को जाजउ का युद्ध, जयसिंह ने आजम का पक्ष लिया।
  • बहादुरशाह ने जयसिंह को पदच्युत कर विजयसिंह को आमेर का शासक घोषित किया। आमेर का नाम मोमिनाबाद रखा गया और उसका फौजदार ‘सयैद हुसैन खां’ को बनाया गया।
  • आमेर को पुनः प्राप्त करने के लिए जयसिंह ने जोधपुर के शासक अजीतसिंह और मेवाड के महाराणा अमरसिंह द्वितीय को भी अपनी ओर मिला लिया।
  • महाराणा ने अपनी पुत्री चंद्रकुंवरी का विवाह
  • तीनों राज्यों की सेनाओं ने जुलाई, 1708 ई. में जोधपुर पर अधिकार कर लिया।
  • जयसिंह की सेवाएं उपलब्ध करने के लिए सम्राट ने 11 जून, 1710 ई. उसके पद को स्वीकार किया और उसे शाही खिलअत से सम्मानित किया।
  • जयसिंह ने चूडामन के भतीजे बदनसिंह को अपनी ओर मिला लिया।
  • मुहम्मदशाह ने जयसिंह को ‘राज-राजेश्वर श्री राजाधिराज सवाई’ की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया।
  • बदनसिंह, जिसने सवाई जयसिंह की जाटों को दबाने की सहायता की थी, जाटों का नेता स्वीकार किया और उसे ‘ब्रजराजा’ की पदवी दी गयी।

हुरडा सम्मेलन 17 जुलाई, 1734 ई.

  • मराठा शक्ति पर अंकुश लगाने तथा राजपूताना पर मराठों के संभावित आक्रमण को रोकने के लिए जयपुर के सवाई जयसिंह के सद्प्रयासों से 17 जुलाई 1734 ई. को हुरडा ‘भीलवाड़ा’ नामक स्थान पर राजपूताना के शासकों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया।
  • उसमें जयपुर के सवाई जयसिंह, बीकानेर के जोरावर सिंह, कोटा के दुर्जनसाल, जोधपुर के अभयसिंह, नागौर के बख्तसिंह, बूंदी के दलेलसिंह, करौली के गोपालदास, किशनगढ़ का राजसिंह आदि।
  • हुरडा सम्मेलन की अध्यक्षता मेवाड महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की।
  • सम्मेलन में एक अहदनामा तैयार किया गया, जिसके अनुसार सभी शासक एकता बनाये रखेंगे। एक का अपमान सभी का अपमान समझा जायेगा, कोई राज्य, दूसरे राज्य के विद्रोही को अपने राज्य में शरण नहीं देगा।
  • मराठों के विरूद्ध वर्षा ऋतु के बाद कार्यवाही आरम्भ की जायेगी जिसके लिए सभी शासक अपनी सेनाओं के साथ रामपुरा में एकत्रित होंगे और यदि कोई शासक किसी कारणवश उपस्थित होने में असमर्थ होगा तो वह अपने पुत्र अथवा भाई को भेजेगा।
  • हुरडा सम्मेलन में मराठों के कारण उत्पन्न स्थिति पर सभी शासकों द्वारा विचार-विमर्श करना और सामूहिक रूप से सर्वसम्मत निर्णय लेना, इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है।
  • खानवा युद्ध के बाद पहली बार राजस्थानी शासकों ने अपने शत्रु के विरूद्ध मोर्चा तैयार किया था। किन्तु यह राजस्थान का दुर्भाग्य ही था कि हुरडा सम्मेलन के निर्णय कार्यान्वित नहीं किये जा सके। क्योंकि इन राजपूत शासकों का इतना घोर नैतिक पतन हो चुका था और वे ऐश्वर्य विलास में इतने डूबे हुए थे कि अपने आपसी जातीय झगडों को भूलकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ एवं लाभ को छोडना तथा उनके लिए असम्भव था।
  • इसके अतिरिक्त राजस्थान में प्रभावशाली और क्रियाशील नेतृत्व के अभाव में भी निर्णय कार्यान्वित नही हो सके।
  • यद्यपि महाराणा जगतसिंह न तो कुशल कुटनीतिज्ञ था और न योग्य सेनानायक।

धौलपुर समझौता- 1741

  • पेशवा बालाजी बाजीराव और सवाई जयसिंह की भेंट धौलपुर में हुई।
  • 18 मई 1741 ई. तक पेशवा धौलपुर में ही रहा और जयसिंह से समझौते की बातचीत की, जिसकी मुख्य शर्ते इस प्रकार थी-
  • पेशवा को मालवा की सूबेदारी दे दी जायेगी, किन्तु पेशवा को यह वादा करना होगा कि मराठा मुगल क्षेत्रों में उपद्रव नहीं करेंगे।
  • पेशवा, 500 सैनिक बादशाह की सेवा में रखेगा और आवश्यकता पडने पर पेशवा 4000 सवार और बादशाह की सहायतार्थ भेजेगा, जिसका खर्च मुगल सरकार देगी।
  • पेशवा को चम्बल के पूर्व व दक्षिण के जमींदारों से नजराना व पेशकश लेने का अधिकार होगा।
  • पेशवा बादशाह को एक पत्र लिखेगा जिसमें बादशाह के प्रति वफादारी और मुगल सेवा स्वीकार करने का उल्लेख होगा।
  • सिन्धिया और होल्कर भी यह लिखकर देंगे कि यदि पेशवा, बादशाह के प्रति वफादारी से विमुख हो जाता है तो वे पेशवा का साथ छोड देंगे।
  • भविष्य में मराठे, बादशाह से धन की कोई नयी मांग नहीं करेंगे।


बूंदी के उत्तराधिकार में हस्तक्षेप एवं मराठा प्रवेश

  • बूंदी के आन्तरिक झगडें में जब जयसिंह ने बूंदी के राव बुद्धसिंह को पदच्युत कर दिया, तब बुद्धसिंह की रानी ने जयपुर के विरूद्ध मराठों को अपनी सहायता के लिए आमन्त्रित किया।
  • फलस्वरूप राजस्थान की राजनीति में मराठों का प्रथम प्रवेश हुआ। इसके बाद तो राजपूत षासक मराठों से सैनिक सहायता प्राप्त करने को लालायित हो उठें।
  • मृत्युः 21 सितम्बर 1743 को मृत्यु।


खगोल विद्या

  • संस्कृत और फारसी का विद्वान होने के साथ-साथ वह गणित और ज्योतिष का भी असाधारण पण्डित था।
  • खगोल गुरु सम्राट जगन्नाथ से सीखा था। इन्होंने टॉलेमी की ‘अलमूजेस्ट’ के अरबी अनुवाद के आधार पर ‘सिद्धांत-कौस्तूभ’ तथा ‘सम्राट सिद्धांत’ की रचना की और यूक्लिड के रेखा गणित का अरबी से संस्कृत में अनुवाद किया।
  • सवाई जयसिंह ने 1725 ई. में नक्षत्रों की शुद्ध सारणी बनवायी और उसका नाम तत्कालीन मुगल सम्राट मुहम्मदशाह के नाम से ‘जीज मुहम्मदशाही’ (मुहम्मदशाह की एस्ट्रोनोमिकल टेबल) रखा। यह 1733 ई. में प्रकाशित हुई।


1733 ई. में 'जीज मुहम्मदशाही' पुस्तक जो नक्षत्रों संबंधी ज्ञान से संबंधित है, के लेखक हैं?

अ. जोधपुर के दरबार जसवंत सिंह

ब. आमेर के राजा भारमल

स. जयपुर के सवाई जयसिंह

द. उदयपुर के महाराणा अमर सिंह

उत्तर- स


  • जयसिंह ने ‘जयसिंहकारिका’ नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।
  • भारतीय सिद्धांत- ज्योतिष विशेषज्ञ गुजरात का केवलराम था, जो 1725 ई. में जयसिंह के दरबार में आया।
  • केवलराम ज्योतिषी ने लागोरिथम का फ्रेंच से संस्कृत में अनुवाद किया, जिसकों ‘विभाग सारणी’ कहा जाता है।
  • मिथ्या जीवछाया साखी, दुकपक्ष सारणी, दुकपक्ष ग्रंथ तारा सारणी, जय विनोद सारणी, जयविनो, रामविनोद, ब्रह्मप्रकाश, निरस आदि मुख्य है।
  • पुर्तगाली राजा एमानुएल के दरबार में दूत भेजा।
  • जयसिंह के ग्रंथों में जिन विदेशी खगोल-विद्या विशेषज्ञों का उल्लेख मिलता है। उनमें - युक्लिड, हिप्पारकस, टॉलेमी, डी.लाहेरे, अब्दुर रहमान इब्न उमर अब्दुल हुसैन अल सूफी नासिर अल दुई, अततूसी, ऊलूग बेग, मौलाना चांद आदि।
  • 1719 में फ्लेमस्टीड की मृत्यु हुई जो ग्रीनविच के प्रथम एस्ट्रोनोमर रॉयल नियुक्त किया गया था। उसकी ‘हिस्टोरिका कोइलेस्टिस ब्रिटेनिका’ जो प्रकाशित भी नहीं हुई थी, की प्रति जयसिंह ने अपने यहां मंगवा ली।
  • उसने जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, बनारस और मथुरा में बडी-बडी वेधशालाओं को बनवाया और बडे-बडे यंत्रों को बनवाकर नक्षत्रादि की गति को सही तौर से जानने के साधन उपलब्ध किये।
  • जयपुर की वेधशाला देश की सबसे बडी वेधशाला है जिसका निर्माण जयसिंह ने 1728 में करवाया था। इसे जन्तर-मन्तर कहते है।
  • जन्तर का तात्पर्य हैं उपकरण तथा मंत्र से तात्पर्य हो गणना अर्थात् उपकरणों के माध्यम से गणना करना।
  • इस जन्तर-मन्तर में संसार की सबसे बडी सूर्य घडी सम्राट यंत्र है।
  • जुलाई, 2010 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित कर लिया है। 

साहित्य

  • सवाई जयसिंह के समय में साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई साहित्यकारों के लिए ‘ब्रह्मपुरी’ की स्थापना की।
  • जयसिंह के पिता विशनसिंह ने तेलंगाना के शिवानन्द गोस्वामी को सम्मानित किया था।
  • शिवानन्द गोस्वामी के छोटे भाई जनार्दन भट्ट गोस्वामी द्वारा ‘श्रृंगारशतक’, वैराग्यशतक, मंत्र चंद्रिका, ललिताची प्रदीपका’ की रचना की।
  • शिवानन्द के दूसरे भाई चक्रपाणी तंत्र शास्त्र के प्रसिद्ध पंडित थे। पंचायत प्रकाश की रचना की।
  • रत्नाकर भट्ट पौण्डरिक - जयसिंह कल्पद्रुम, उनके पुत्र सुधाकर पौण्डरिक ने साहित्य सार संग्रह तथा भतीजा ब्रजनाथ भट्ट ने ब्रह्म सूत्राणु भाष्यपृति (मारीचिका), पद्यतरंगिणी की रचना की।
  • जयसिंह के समय में सबसे प्रसिद्ध विद्वानों में ‘कवि कलानिधि’ श्री कृष्ण भट्ट थे।
  • इनके द्वारा राम क्रीडाओं पर ‘राघवगीतम’ (रामरासा) पर जयसिंह ने इन्हें ‘रामरसाचार्य’ की उपाधि दी। अन्य ग्रंथ- पद्य मुक्तावली, वृत मुक्तावली, ईश्वरविलास महाकाव्य की रचना की।

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