छायावाद

छायावादी काव्यधारा



  • समयावधि: छायावादी काव्य की समय सीमा लगभग 1918 ई. से 1936 ई. (उच्छ्वास से युगांत) तक चला।
  • छायावाद विशेष रूप से हिन्दी साहित्य के 'रोमांटिक' उत्थान की काव्यधारा है। इस काव्यधारा में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा चार प्रमुख कवि शामिल हैं। 
  • छायावादी काव्य प्रवृत्तियों से युक्त सबसे पहली रचना जयशंकर प्रसाद की 'झरना' का प्रकाशन 1918 ई. में हुआ था, इसलिए डॉ. नगेन्द्र ने इसकी काव्यधारा की समय सीमा 1918 ई. से 1936 ई. तक निर्धारित किया है। 
  • सर्वप्रथम 1920 ई. में मुकुटधर पांडेय ने जबलपुर से प्रकाशित 'श्री शारदा' नामक पत्रिका में 'हिन्दी में छायावाद' शीर्षक चार निबंधों की एक लेख श्रृंखला में प्रकाशित करवाए थे। तब से हिन्दी में छायावाद का प्रारम्भ माना जा सकता है।   
  • उन्होंने अपने निबन्धों में छायावाद की पांच विशेषताओं का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार हैं— 1. वैयक्तिकता, 2. स्वातंत्र्य चेतना, 3. रहस्यवादिता, 4. शैलीगत वैशिष्ट्य और 5. अस्पष्टता आदि।
  • श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक 1903 से 1920 ई. तक रहे थे, जिसके आधार पर द्विवेदी युग का समय 1920 ई. तक निर्धारित करके 'छायावाद' का समय 1920 ई. से आरंभ माना जा सकता है।
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी छायावाद का प्रारम्भ 1918 ई. से माना है, क्योंकि छायावाद के प्रमुख कवियों में पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाएं लगभग इसी वर्ष के आस-पास लिखनी प्रारम्भ की थी। 
  • सुशील कुमार ने 'हिन्दी में छायावाद' शीर्षक एक संवादात्मक निबंध लिखा। इस व्यंग्यात्मक निबन्ध में छायावादी कविता को टैगोर स्कूल की चित्रकला के समान 'अस्पष्ट' कहा गया है।

विभिन्न विद्वानों के द्वारा 'छायावाद' के अर्थ ग्रहण किये गए—
  1. मुकुटधर पांडेय — रहस्यवाद
  2. सुशील कुमार — अस्पष्टतावाद
  3. डॉ. बच्चन सिंह — स्वच्छंदतावाद
  4. डॉ. नगेन्द्र — स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह
  5. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी — व्यंग्यार्थ प्रधान शैली
  6. महावीर प्रसाद द्विवेदी — अन्योक्ति पद्धति
  7. आचार्य रामचंद्र शुक्ल — शैली वैचित्र्य/मधुचर्या/चित्र भाषा शैली
  8. गंगा प्रसाद पाण्डेय — वस्तुवाद व रहस्यवाद के बीच की कड़ी
  9. नन्द दुलारे वाजपेयी — वक्त सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान
  10. सुमित्रानंदन पंत — सौन्दर्य की छाया
  11. जयशंकर प्रसाद — कान्ति
  12. शान्तिप्रिय द्विवेदी — प्रकृति में ही समान आत्मा का दर्शन करने की प्रवृत्ति
मुकुटधर पांडेय ने छायावाद के लिए किस शब्द का प्रयोग किया है? 
— रहस्यवाद (मिस्टिसिज्म)
  • सुशील कुमार ने अपने निबन्ध में छायावादी कविता को 'कोरे कागद की भांति अस्पष्ट', 'निर्मल ब्रह्म की विशद छाया', वाणी की नीरवता, निस्तब्धता का उच्छ्वस एवं अनंत का विलास कहा है।  
  • 1918 ई. में प्रसाद का 'झरना' प्रकाशित हो चुका था तथा निराला की प्रसिद्ध कविता 'जूही की कली' 1916 ई. में प्रकाशित हुई थी। पंत के 'पल्लव' की कुछ कविताएं भी 1918 ई. में प्रकाशित हो चुकी थी। 
  • छायावादी काव्य का जन्म द्विवेदी युगीन काव्य की प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ, क्योंकि द्विवेदी युगीन कविता विषयनिष्ठ, वर्णन-प्रधान और स्थूल थी, जबकि छायावादी कविता व्यक्तिनिष्ठ, कल्पना प्रधान एवं सूक्ष्म है। 
  • प्रारम्भ में 'छायावाद' का प्रयोग व्यंग्य रूप में उन कविताओं के लिए किया गया जो अस्पष्ट थी, जिनकी 'छाया' (अर्थ) कहीं और पड़ती थी, किन्तु कालान्तर में यह नाम उन कविताओं के लिए रूढ़ हो गया जिनमें मानव और प्रकृति के सूक्ष्म सौन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भान होता था और वेदना की रहस्यमयी अनुभूति की लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक शैली में अभिव्यंजना की जाती थी।

छायावाद की प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित हैं—


  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, “छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों से समझना चाहिए एक तो रहस्यवाद के अर्थ में, जहां उसका सम्बन्ध काव्य वस्तु से होता है, अर्थात् जहां कवि उस अनन्त और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है। छायावाद शब्द का दूसरा प्रयोग काव्य शैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में है।"
  • जयशंकर प्रसाद, "जब वेदना के आधार पर स्वानुभूतिमयी अभिव्यक्ति होने लगी तब हिन्दी में उसे 'छायावाद' के नाम से अभिहित किया गया। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृति छायावाद की विशेषताएं हैं।"
  • डॉ. रामकुमार वर्मा "परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है और आत्मा की छाया परमात्मा में, यही छायावाद है।"
  • डॉ. नगेन्द्र  "छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है। छायावाद एक विशेष प्रकार की भाव पद्धति है, जीवन के प्रति एक विशेष भावात्मक दृष्टिकोण है।"
  • महादेवी वर्मा "छायावाद तत्वतः प्रकृति के बीच जीवन का उद्गीथ है, उसका मूल दर्शन सर्वात्मवाद है।"
  • डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, "छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह नहीं रहा, वरन थोथी नैतिकता, रूढ़िवाद और सामन्ती साम्राज्यवादी बन्धनों के प्रति विद्रोह रहा है। यह विद्रोह मध्यवर्ग के तत्वाधान में हुआ था इसलिए उसके साथ मध्यवर्गीय असंगति, पराजय और पलायन की भावना भी जुड़ी हुई है।"
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "छायावाद के मूल में पाश्चात्य रहस्यवादी भावना अवश्य थी। इस श्रेणी की मूल प्रेरणा अंग्रेजी को रोमांटिक भाव धारा की कविता से प्राप्त हुई थी और इसमें सन्देह नहीं कि उक्त भावधारा की पृष्ठभूमि में इसाई सन्तों की रहस्यवादी साधना अवश्य थी।"
  • शांतिप्रिय द्विवेदी के अनुसार, ''छायावाद एक दार्शनिक अनुभूति है।''
  • डॉ. देवराज का कथन है, ''छायावाद गीति काव्य है, प्रकृति काव्य है, प्रेमकाव्य है।''
  • श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय के अनुसार, इन्होंने भावलोक की प्रगति के तीन चरण माने हैं— 1. वस्तुवाद, 2. छायावाद, 3. रहस्यवाद, अत: उनके शब्दों में 'छायावाद वस्तुवाद व रहस्यवाद के बीच की कड़ी है।' 

  • 'छायावाद' हिन्दी की रोमांटिक काव्यधारा की विकसित अवस्था है।
  • सुमित्रानन्दन पंत — 'मेरे विचार से छायावाद की प्रेरणा छायावाद के प्रमुख कवियों को उस युग की चेतना से स्वतंत्र रूप से मिली है। ऐसा नहीं हुआ कि किसी एक कवि ने पहले उस धारा का प्रवर्तन किया हो और दूसरों ने उसका अनुगमन कर उसके विकास में सहायता दी हो।'
  • छायावादी काव्यधारा का प्रादुर्भाव हिन्दी साहित्य में 1920 ई. के लगभग माना जाता है।
  • रामचंद्र शुक्ल ने इस काव्यधारा के प्रवर्तक मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय को माना है।
  • डॉ. विनयमोहन शर्मा और प्रभाकर माचवे छायावादी कविता के प्रवर्तक का श्रेय मानखलाल चतुर्वेदी को देते हैं। 
  • परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि छायावादी कविता के जनक जयशंकर प्रसाद है।


उक्त परिभाषाओं से छायावादी काव्य के निम्नलक्षण निरूपित किये जा सकते हैं:

  1. छायावादी काव्य में रहस्यवादी प्रवृति रहती है।
  2. छायावादी कविता प्रेम, सौन्दर्य एवं प्रकृति का काव्य है।
  3. छायावाद में स्थूलता के स्थान पर सूक्ष्मता रहती है। 
  4. छायावाद के शैली-शिल्प एवं अभिव्यंजना पद्धति में नवीनता है।
  5. छायावाद में स्वानुभूति की प्रधानता है। 

उक्त लक्षणों के आलोक में छायावाद की एक सर्वमान्य परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है:

  • 'प्रेम, प्रकृति और मानव सौन्दर्य की स्वानुभूतिमयी रहस्यपरक सूक्ष्म अभिव्यंजना लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक शैली जिस काव्य में होती है, उसे छायावाद कहा जाता है।'


छायावादी काव्य की विशेषताएं

  • छायावादी काव्य विषय वस्तु एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से अपने पूर्ववर्ती काव्य से अलग है। इस काव्यधारा की प्रमुख प्रवृतियों का निरूपण निम्न शीर्षकों के अर्न्तगत किया जा सकता है— 

1. आत्माभिव्यंजन

  • छायावादी कवियों ने काव्य की विषय वस्तु अपने व्यक्तिगत जीवन से ही खोजने का प्रयास किया। अपने जीवन के निजी प्रसंगों, घटनाओं एवं व्यक्तिगत भावनाओं को अनेक छायावादी कवियों ने काव्य-वस्तु बनाया। छायावादी कविता में वैयक्तिक, सुख-दुख की खुलकर अभिव्यक्ति हुई। 
  • प्रसाद कृत 'आंसू' काव्य और पंत कृत 'उच्छ्वास' नामक कविता इस कथन के समर्थन में पेश की जा सकती है। पन्त जी ने अपनी 'प्रिया' को मन मन्दिर में बसाकर उसे पूजने का उल्लेख निम्न पंक्तियों में किया है।

विधुर उस के मृदुभावों से तुम्हारा कर नित नव श्रृंगार।

पूजता हूँ मैं तुम्हें कुमारि, मूंद दुहरे दृग द्वार।। - पन्त


  • निराला की कई कविताओं में उनके व्यक्तिगत जीवन का सत्य व्यक्त हुआ है। 'राम की शक्तिपूजा में राम की हताशा, निराशा में कवि के अपने जीवन की निराशा की अभिव्यक्ति हुई है। उन्हें जीवन भर लोगों के जिस विरोध को झेलना पड़ा उसकी गूंज निम्न पंक्तियों में है -


"धिक जीवन जो पाता ही आया है विरोध।

धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।। - निराला


2. सौन्दर्य-चित्रण

  • छायावादी काव्य में सौन्दर्य भावना मुख्यत: नारी सौन्दर्य, प्रकृति सौन्दर्य तथा अलौकिक प्रेम के रूप में उभरी है। इस सौन्दर्य चित्रण में मांसलता तथा अश्लीलता का सर्वथा अभाव है। यदि सौन्दर्य में कही मांसलता की गंध आती है तो कवि अलौकिक उपनामों के द्वारा उस सौन्दर्य को अस्पृश्य बना देते हैं। जैसे—  

कमल से जो चारू दो खंजन प्रथम।

पंख फड़काना नहीं थे जानते।।

चपल चोखी चोट कर अब पंख की।

विकल करते भ्रमर को आनन्द से।। - प्रसाद


  • शारीरिक अंगो की कान्ति का वर्णन भी उसमें बड़े आकर्षक ढंग से हुआ है। कामायनी में प्रसाद जी ने श्रद्धा के सौन्दर्य का वर्णन निम्न प्रकार किया है -

नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग।

खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ वन बीच गुलाबी रंग।। - प्रसाद


3. श्रृंगार-निरूपण 

  • द्विवेदी युगीन कविता में श्रृंगार-निरूपण बहुत कम हुआ है, जहां हुआ है वहां भी मर्यादित रूप में ही है। छायावाद में आकर कविता में पुनः श्रृंगार की प्रतिष्ठा हुई। इन कवियों ने श्रृंगार के संयोग एवं वियोग दोनों पक्षों के आकर्षक चित्र अंकित किए। निराला ने 'जूही की कली' नामक कविता में प्रकृति के प्रतीकों से प्रेम व्यापारों का निरूपण किया। - 

निर्दय उस नायक ने निपट निठुराई की।

झोंको की झाड़ियों से, 

सुन्दर सुकुमार देह,

सारी झकझोर डाली। 


  • पन्त के काव्य में प्रेम और श्रृंगार भावना की बड़ी सहज अभिव्यक्ति हुई है। प्रिया का आकर्षण मन को पागल कर देता है:


'तुम हो लावव्य मधुरिमा जो असीम सम्मोहन

तुम पर प्राण निछावर करने पागल हो उठता मन।

नहीं जानती क्या निज बल तुम, निज अपार आकर्षण?'

- पन्त


  • वियोग श्रृंगार के अति भव्य चित्र प्रसाद कृत आंसू में उपलब्ध होते हैं।

  • प्रिया के वियोग से मन की विकलता कितनी तीव्र हो गई है, इसका चित्र इन पंक्तियों में देखा जा सकता है:

झंझा झकोर गर्जन था बिजली थी नरिद माला।
पाकर इस शून्य हृदय को सबने आ घेरा डाला।। - प्रसाद

रो-रोकर सिसक-सिसक कर कहता मैं करूण कहानी।
तुम सुमन नोचते सुनते करते जानी अनजानी।। - प्रसाद


  • कविवर पन्त ने भी वियोग व्यथा का मार्मिक वर्णन अपनी कविताओं में किया है। वे तो यह मानते हैं कि कविता का जन्म ही वियोग व्यथा से हुआ होगा। उस प्रेमी की आहों ने ही कविता का रूप धारण कर लिया होगा: 
''वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
निकलकर आंखों से चुपचाप, बहि होगी कविता अनजान।।'' - पन्त


  • प्रिया का ध्यान हृदय में वेदना की कसक उत्पन्न कर उसे अधीर कर देता है:

''तड़ित सा सुमुखि तुम्हारा ध्यान, प्रभा के पलक मार उर चीर।

गूढ़ गर्जन कर जब गम्भीर, मुझे करता है अधिक अधीर।

जुगुनुओं से उड़ मेरे प्राण,

खोजते हैं तब तुम्हें निदान।।'' - पन्त


4. नारी भावना 

  • छायावादी कवियों ने नारी के प्रति उदात्त दृष्टिकोण अपनाकर समाज में उसके सम्मानीय स्थान को प्रतिष्ठित किया। रीतिकालीन कवियों ने नारी को विलास की वस्तु और उपभोग की सामग्री मात्र माना, जबकि छायावादी कवियों ने उसे प्रेरणा का पावन उत्स मानते हुए गरिमा प्रदान की। वह दया, क्षमा, करूणा, प्रेम की देवी है और अपने इन गुणों के कारण श्रद्धा की पात्र है:


''नारी तुम केवल हो, विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।। - प्रसाद


  • पन्त ने 'देवि, माँ, सहचरि, प्राण कहकर नारी के प्रति अपने आदर का परिचय दिया। प्रसाद जी के हृदय में नारी का बहुत ऊँचा स्थान था। निम्न पंक्तियों से उनके विचारों को जाना जा सकता हैः

''तुम देवि! आह कितनी उदार

वह मातृमूर्ति है निर्विकार।

हे सर्वमंगले! तुम महती

सबका दुःख अपने पर सहती।। - पन्त


  • निराला ने भी नारी को पुरूष के हृदय में आशा का संचार करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया। 'राम की शक्ति पूजा' में राम के निराश हृदय में सीता की स्मृति मात्र से आशा का संचार होते दिखाया गया है:

 

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विधुत।

जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत।। - निराला


5. रहस्य - भावना 

  • छायावादी काव्य में रहस्यवाद की प्रवृति भी प्रमुख रूप से उपलब्ध होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसी कारण 'छायावाद' का अर्थ 'रहस्यवाद' माना है। प्रायः सभी छायावादी कवियों ने अज्ञात सत्ता के प्रति 'जिज्ञासा' के भाव व्यक्त किए हैं। पन्त की 'मौन निमंत्रण' कविता में इसकी अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर ढंग से हुई है। 


''न जाने कौन अए द्युतिमन,

जान मुझको अबोध अज्ञान।

सुझाते हो तुम पथ अनजान,

फूंक देते छिद्रों में गान।।''


  • प्रसाद जी ने 'कामायनी' में स्थान-स्थान पर उस अज्ञात सत्ता के अस्तित्व का बोध कराया है। पता नहीं वह अज्ञात सत्ता कौन है, कैसी है और क्या है:


'हे अनन्त रमणीय कौन तुम,

यह मैं कैसे कह सकता।

कैसे हो, क्या हो, इसका तो

भार विचार न सह सकता।।' - प्रसाद


  • निराला की 'तुम और मैं' कविता में उस परमात्मा से अनेक प्रकार के सम्बन्ध जोड़े गए हैं। यदि वह हिमालय है तो मैं उससे निःसृत होने वाली गंगा, यदि वह हृदय के भाव हैं तो मैं उससे जन्म देने वाली कविता:

तुम तुंग हिमालय श्रृंग और मैं चंचल गति सुरसरिता।

तुम विमल हृदय उच्छवास और मैं कान्त कामिनी कविता।। 

- निराला


6. प्रकृति-चित्रण 

  • छायावादी कविता प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। इन कवियों ने प्रकृति पर मानवीय चेतना का आरोप करते हुए उसे हंसते-रोते हुए भी दिखाया है:

''अचिरता देख जगत की आप, शून्य भरता समीर निश्वास।

डालता पातों पर चुपचाप, ओस के आंसू नीलाकाश।।''


  • यहां वायु को ठण्ड़ी सांस भरते हुए, आकाश को रोते हुए दिखाया गया है। पन्त जी ने तो प्रकृति को ही अपनी काव्य-प्रेरणा माना है और वे प्रकृति सौन्दर्य को नारी सौन्दर्य पर वरीयता देते हैं 'मोह' नामक कविता में वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि नारी सौन्दर्य में आकर्षण होता है, पर वह इतना नहीं कि प्रकृति सौन्दर्य की उपेक्षा करवा सके:

छोड़ द्रुभों की मृदु छाया

तोड़ प्रकृति से भी माया

बाले! तेरे बाल-जाल में, कैसे उलझा दूं लोचन?

भूल अभी से इस जग को। - पन्त


7. दुःख और वेदना की विवृति 

  • छायावादी काव्य में दुःख और वेदना भाव की अभिव्यक्ति हुई है। 
  • महादेवी तो वेदना की ही कवयित्री है। वे अपने वेदना विहल हृदय की तुलना 'मेघखण्ड' से करती हुई कहती है:

''मैं नीर भरी दुःख की बदली

विस्तृत नभ का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना

परिचय इतना इतिहास यही

उमड़ी कल थी मिट आज चली।।'' 

- महादेवी वर्मा


  • महादेवी वर्मा के गद्य-पद्य में जो दुःखवाद और करूणा के भाव दिखाई पड़ते हैं, वे बौद्ध दर्शन के प्रभाव स्वरूप माने जा सकते हैं। 
  • प्रसाद के 'आंसू' काव्य में भी वेदना की ही कहानी है। उन्होंने अपनी पीड़ा को ही काव्य के रूप में व्यक्त किया है:

''जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई।

दुर्दिन में आंसू बनकर वह आज बरसने आई।।'' - प्रसाद


  • पन्त ने 'परिवर्तन' कविता में यह स्वीकार किया है कि संसार में दुःख की अधिकता है, यहां शान्ति जीवनपर्यन्त प्राप्त नहीं हो सकती 
यहां सुख सरसों शोक सुमेरू,

अरे जग है जग का कंकाल।

वृथा रे यह अरूण - चीत्कार,

शान्ति सुख है उस पार।। - पन्त


8. राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति 

  • छायावादी काव्य में राष्ट्रीयता के स्वर भी मुखरित हुए है। प्रसाद जी ने अपने नाटकों में जो गीत योजना की है, उसमें राष्ट्रीय भावना की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है। उन्होंने भारत के अतीत गौरव के चित्र अंकित करते हुए देश की महिमा का बखान किया है:


अरूण यह मधुमय देश हमारा।

जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।

- प्रसाद


  • माखन लाल चतुर्वेदी के गीतों में राष्ट्रभक्ति अपने चरम उत्कर्ष पर है। 'पुष्प की अभिलाषा' में उन्होंने एक पुष्प की यह इच्छा व्यक्त की है कि उसे शहीदों के चरणों तले आने का सौभाग्य मिलेः

''मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक।

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।।

- माखनलाल चतुर्वेदी


9. शैलीगत प्रवृतियां 

  • छायावादी काव्य विषय वस्तु एवं शिल्प दोनों ही दृष्टियों से नवीनता लिए हुए है। लाक्षणिक भाषा का प्रयोग, प्रतीकात्मक शैली, उपचारवक्रता एवं नवीन अलंकार विधान के कारण इस काव्य में शिल्पगत नवीनता दिखाई पड़ती है। पन्त को अग्र पंक्तियों में प्रतीकात्मकता एवं लाक्षणिकता को देखा जा सकता है:

अभी तो मुकुट बंधा था माथ

हुए कल ही हल्दी के हाथ

खुले भी न थे लाज के बोल

खिले भी चुम्बन शून्य कपोल।

हाय रूक गया यही संसार

बना सिन्दूर अंगार।

वातहत लतिका वह सुकुमार

पड़ी है छिन्नाधार।। - पन्त


प्रमुख छायावादी काव्य संग्रह:

  • जयशंकर प्रसाद के झरना, आंसू और कामायनी आदि ग्रंथों में छायावादी प्रवृत्तियां स्पष्टत: परिलखित होती हैं।
  • 'कामायनी' छायावादी कविता का एकमात्र महाकाव्य है।
  • पंत : वीणा, पल्लव, ग्रन्थि और गुंजन
  • निराला : परिमल, गीतिका, अनामिका और तुलसीदास 
  • महादेवी : नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा
  • डॉ. रामकुमार वर्मा : अंजलि, रूप—राशि, चित्ररेखा, चन्द्र किरण 
  • भगवतीचरण वर्मा : मधुकरण, प्रेम—संगीत, मानव 
  • अंचल : अपराजिता, मधूलिका 


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