गुप्त साम्राज्य: आर्थिक स्थिति, कला, साहित्य एवं विज्ञान

गुप्त साम्राज्य: आर्थिक स्थिति, कला, साहित्य एवं विज्ञान

240 ई से 550 ई. तक


  • गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में हुआ था। विष्णु पुराण, वायु पुराण और भागवत पुराण से ज्ञात होता है कि आरम्भिक गुप्त राज्य में मगध एवं उत्तर-पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी के तटीय के प्रदेश सम्मिलित थे।
  • श्री गुप्त - प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त का उल्लेख गुप्त वंश के ‘आदिराज’ के रूप में किया गया है।
  • इन्होंने 240ई0 से 280 ई0 तक शासन किया।
  • श्रीगुप्त ने महाराज की उपाधि धारण की।
  • श्री गुप्त स्वतंत्र शासक न होकर संभवतः किसी शासन के अन्तर्गत सामन्त थे।

घटोत्कच 280 ई. - 319 ई. -

  • लगभग 280 ई0 में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया, इसने भी महाराज की उपाधि धारण की।
  • प्रभावती गुप्त के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का प्रथम राजा बताया गया है, इसका राज्य सम्भवतः मगध के आस-पास तक ही सीमित था। इसने 319ई0 तक शासन किया।

चन्द्रगुप्त प्रथम 319 ई. से 335 ई. तक -

  • घटोत्कच के उत्तराधिकारी के रूप में शासक बना। चन्द्रगुप्त प्रथम एक प्रतापी राजा था, सने उस समय के प्रसिद्ध लिच्छवि कुल की कन्या कुमार देवी से विवाह किया। इस विवाह के उपरान्त गुप्त वंश की प्रसिद्धि बढ़ने लगी। उसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की, जो प्रायः सर्वोच्च शासन के लिए प्रयोग की जाती है। चन्द्रगुप्त प्रथम ने एक संवत् ’गुप्त संवत्’ (319-320ई0) के नाम से चलाया।

समुद्रगुप्त 335 ई से 375 ई.

  • चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा। समुद्रगुप्त के दरबार में प्रसिद्ध कवि हरिषेण रहता था, जिसने प्रयाग प्रशस्ति लेख में समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का उल्लेख किया। यह अभिलेख उसी स्तंभ पर उत्कीर्ण है, जिस पर अशोक का स्तम्भ लेख है। इसने अपनी विजयों की उद्घोषणा हेतु ‘अश्वमेध यज्ञ’ सम्पन्न करवाया था। समुद्रगुप्त के प्राप्त सिक्कों में कुछ पर ‘अश्वमेध पराक्रम’ लिखा मिलता है।
  • प्रयाग स्तंभ अभिलेख जो इलाहाबाद, उतरप्रदेश में विद्यमान हैं, गुप्तकाल का महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत है। जिसमें समुन्द्रगुप्त के राज्याभिषेक, दिग्विजय एवं व्यक्तित्व पर विशद् प्रकाश डाला गया है तथा कई अधिकारियों के पदों व नामों के उल्लेख से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था की जानकारी मिलती है। अलंकारिक संस्कृत भाषा, ब्राह्मी लिपि व चम्पूशैली तात्कालिक समृद्ध साहित्य के प्रगति की प्रतीक है। 
  • प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को ‘‘कविराज’’, गायन व संगीत में दक्षता में गुरु तुम्बरू व नारद को लज्जित करने वाला, लाख गायों का दानी, उच्चकोटि का विद्वान, विद्या का संरक्षक एवं धर्म का प्राचीर कहा गया। ऐरण अभिलेख में उसे पराक्रम तथा विजय का स्रोत कहा गया। अश्वमेघ प्रकार व वीणा बजाते सिक्कों आदि से समुद्रगुप्त के विद्वान, संगीतज्ञ, गायक, दानी, धर्मनिष्ठ, पराक्रमी, विनयशील तथा विजयाकांक्षी आदि वैयक्तिक गुणों का पता चलता है। 
  • श्रीलंका के राजा मेघवर्मन ने कुछ उपहार भेजकर समुद्रगुप्त से गया में एक बौद्ध मन्दिर बनवाने की अनुमति मांगी थी। 
  • समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार में कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपुताना, सिंध और गुजरात के अतिरिक्त शेष सारा भारत सम्मिलित था। समुद्रगुप्त ने भारत में एक नए युग की स्थापना की, वह अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श से प्रेरित हुआ तथा सम्पूर्ण भारत वर्ष को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा।

समुद्र गुप्त की विजय -

  • समुद्रगुप्त एक महान् शासन, सेनापति, कूटनीतिज्ञ, बहुआयामी प्रतिभा से युक्त यर्थाथवादी व्यक्तित्व था। उसके दरबारी कवि एवं महासंधिविग्रहक हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में अपने आश्रयदाता समुद्रगुप्त के पराक्रम व दिग्विजय का वर्णन किया है।
  • समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम आर्यवर्त अर्थात् गंगा, यमुना दोआब पर सैनिक अभियान किया। जो दो चरणों मंे पूरा हुआ। नौ राजाओं रूद्रवेद, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मन, गणपति, नाग, नागसेन, अच्चुत, नंदी एवं बलवर्मा को पराजित किया, जिन्हें राजप्रसभोद्धरण की नीति के तहत साम्राज्य में मिला लिया।
  • समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों कौशल, महाकान्तर, कोरल, कोट्टूर, पिष्टपुर, एरनपल्ली, कांची, अवमुक्त, वैंगी, पल्लक, देवराष्ट्र, कुस्थलपुर आदि को पराजित किया। लेकिन उसने उन्हें ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति अर्थात् ग्रहण (शत्रु पर अधिकार), मोक्ष (शत्रु को मुक्त करना) एवं अनुग्रह (राज्य को लौटाकर) के तहत फिर मुक्त कर दिया।
  • वह जानता था कि इन दूरस्थ भागों पर प्रत्यक्ष शासन असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य था। अतः उसने ग्रहणमोक्षानुग्रह की व्यवहारिक नीति का अवलम्बन किया।
  • समुद्रगुप्त ने मध्य भारत के आटविकों को भी परास्त किया व उन्हें अपना भृत्य बना दिया। सीमान्त प्रदेशों के राजतन्त्रात्मक एवं गणतन्त्रात्मक राज्यों में भी भयभीत होकर अधीनता स्वीकार कर ली। जिनमें उत्तर पूर्व भारत के समतट डवाक् कामरूप, नेपाल, कर्तपुर व पश्चिमी भारत के नौ गणतन्त्र राज्य आभीर, अर्जुनायन मालव, यौद्धेय मद्रक प्रार्जुन, सनकानिक, काक व खरपरिक थे। इनके साथ सर्वदानाज्ञाकरण प्राणायाम की नीति का अवलंबन किया। 
  • देवपुत्र, शाहिशाहानुशाही, शक-मुरूण्ड तथा सिंहल आदि विदेशी शासकों ने समुद्रगुप्त से भयभीत होकर उससें मैत्रीयाचना की, इनके साथ आत्म-निवेदन, कन्योपायान, गुरूत्मदंकित, स्वविषय, भुक्ति, शासन याचना की नीति का अनुसरण किया। इस प्रकार समुद्रगुप्त ने भारत के बहुत बड़े भाग को अपने अधीन कर एकता के सूत्र में बाँधा और उससे कहीं अधिक भू-भाग में उसका लोहा माना जाता था, जो उसकी यथार्थवादी नीति का प्रतीक है। स्मिथ ने समुद्रगुप्त उसकी बहादुरी एवं युद्ध कौशल के कारण भारत का नेपोलियन कहा है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय:-

  • समस्त गुप्त राजाओं में समुद्रगुप्त का पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न था।
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से किया, रूद्रसेन की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाट्क राज्य को अपने राज्य में मिलाकर उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनायी। 
  • चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। इसके दरबार में कालिदास एवं अमर सिंह जैसे विद्वान रहते थे। शकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के विशेष सिक्के जारी किए। 
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सर्वप्रथम वैवाहिक संबंधों द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ की, उसने नागवंश की कुबेर नागा तथा कदम्ब वंश की राजकुमारी से स्वयं एवं वाकाटक वंश के रूद्रसेन द्वितीय से अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह किया। इनसे प्रभावशाली शासकों की मित्रता व संरक्षण प्राप्त हो गया। 
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया और सौराष्ट्र प्रायद्वीप को विजित किया। उसने पश्चिमी भारत के शकों को पराजित किया तथा शक शासक रूद्रसेन तृतीय को हराया। इससे गुजरात, मालवा व कठियावाड़ गुप्त साम्राज्य के अंग बन गए। 
  • हुणों की सक्रियता को देखते हुए उसने उत्तर पश्चिम के गणराज्यों का विलय कर लिया। महरौली अभिलेख से विदित होता है कि उसने पश्चिम में बाहलिक (बैक्ट्रिया) व पूर्व में बंगाल तक अपनी सत्ता का विस्तार किया। 
  • उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाने से राज्य के समुद्री व्यापार एवं गुजरात प्रान्त के संसाधनों में वृद्धि हुई। 
  • चन्द्रगुप्त ने अपने पराक्रम और शौर्य से गुप्त साम्राज्य की सीमाओं का चतुर्दिक विकास किया और अपना यश में वृद्धि की।


कुमारगुप्त प्रथम 415 ई - 455 ई.:

  • चन्द्रगुप्त द्वितीय के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त गद्दी पर बैठा। उसने बड़ी संख्या में मुद्राएं जारी करवाईं। बयाना-मुद्राभाण्ड से कुमारगुप्त की करीब 623 मुद्राएं मिली है। ह्वेनसांग ने कुमारगुप्त का नाम शक्रादित्य बताया। 
  • कुमारगुप्त को अपने शासन के अन्तिम समय में पुष्यमित्र जातियों के विद्रोह का सामना करना पड़ा। इसकी जानकारी स्कन्दगुप्त के भीतरी स्तम्भ लेख से मिलती है। यहीं से गुप्त साम्राज्य विघटन की ओर अग्रसर हुआ। संभवतः नालन्दा विश्वविद्यालय का संस्थापक कुमारगुप्त ही था।
  • स्कन्दगुप्त को राजसिंहासन पर बैठते ही जूनागढ़-अभिलेख में मलेच्छ के रूप में उल्लिखित हूणों के आक्रमण का सामना करना पड़ा, जिसका उल्लेख भीतरी स्तम्भ लेख में मिलता है जिसमें स्कन्दगुप्त को सफलता मिली। इनकी स्वर्ण मुद्राओं पर विक्रमादित्य की उपाधि मिलती है। 
  • स्कन्दगुप्त ने सौराष्ट्र में पर्णदत्त को गवर्नर के रूप में नियुक्त किया। स्कन्दगुप्त ने गिरिनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील के पुनरुद्धार का कार्य गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को सौंपा था, जिसने झील के किनारे एक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था। 
  • स्कंदगुप्त के शासन के प्रारम्भ में गुप्त साम्राज्य आन्तरिक व बाहरी समस्याओं से ग्रसित था। स्कंदगुप्त के भीतरी स्तम्भ लेख, जूनागढ़ अभिलेख तथा चन्द्रगुप्त परिपृच्छा आदि अभिलेखों एवं साहित्यिक स्रोतों से हूण आक्रमण का एवं स्कंदगुप्त के द्वारा उनको पराजित करने को उल्लेख मिलता है। यह युद्ध संभवतः उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती क्षेत्र में हुआ। 
  • स्कंदगुप्त ने बाह्य शत्रुओं, पुष्यमित्रों व हूणों को परास्त कर गुप्त साम्राज्य को भीषण संकट से बचाया एवं गुप्त साम्राज्य को स्थायित्व व व्यवस्था प्रदान की। इसके अतिरिक्त उसने वाकाटकों व नागवंश के आक्रमण को असफल कर उनके क्षेत्रों पर अधिकार कर साम्राज्य की रक्षा की व क्षेत्र में वृद्धि की। अपने साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाए रखा तथा सुदृा एवं उसकी सुरक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। 
  • उसने साम्राज्य को प्रान्तों में विभक्त किया एवं योग्य प्रान्तपतियों की नियुक्ति की, जो पूर्णरूप से प्रजाहित को महत्त्व देते थे। वह प्रजापालक, उदार तथा धर्म-सहिष्णु शासक था। उसके साम्राज्य में सभी सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी। उसका बुद्धिमतापूर्ण शासन, उसके शौर्यपूर्ण युद्ध, उसकी स्वदेशी भक्ति इस सबने स्कंदगुप्त को महान् गुप्त सम्राटों में से एक बना दिया। उसकी मृत्यु के साथ गुप्त साम्राज्य विघटन एवं विभाजन की दिशा में अग्रसर हुआ।

सुदर्शन झील -

  • रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के सौराष्ट्र प्रान्त के गर्वनर पुष्यगुप्त वैश्य द्वारा जनकल्याण हेतु सुदर्शन झील के निर्माण कराया एवं स्वयं रूद्रदामन द्वारा इसकी मरम्मत कराने का उल्लेख मिलता है। स्कंदगुप्त के जूनागील प्राचीन भारत के शासकों द्वारा जल प्रबन्धन एवं संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  •  स्कन्दगुप्त के पश्चात पुरूगुप्त, नरसिंहगुप्त, कुमार गुप्त द्वितीय, बुद्धगुप्त, बालादित्य द्वितीय, कुमारगुप्त तृतीय और विष्णुगुप्त ने शासन किया, लेकिन धीरे-धीरे उनका राज्य सीमित होता गया। संभवतः बंगाल के गौड़ों ने अन्तिम रूप से गुप्त साम्राज्य को समाप्त किया।
  • गुप्तों के पतन का मूल कारण केन्द्रीय शक्ति का दुर्बल होना था। डॉ. हेमचन्द्र रायचौधरी ने गुप्त सम्राटों का बौद्ध धर्म की ओर झुकाव को भी इनके पतन का कारण माना है। गुप्त सम्राटों ने सैनिक शक्ति और शान्तिपूर्ण विदेश नीति का पालन नहीं किया, जिसके कारण विदेशी शत्रुओं, शक्तिशाली सामन्तों एवं अधीन शासकों को लाभ उठाने का अवसर मिला।

गुप्त कला, साहित्य एवं विज्ञान का विकास
प्राचीन भारत में स्थापत्य, मूर्ति एवं चित्रकला आदि क्षेत्रों में विकास की चरमसीमा गुप्तकाल में प्राप्त होती है। इस युग की कला में भारतीयकरण, सौन्दर्याभिव्यक्ति, भावचित्रण एवं आध्यात्मिकता का अंकन उल्लेखनीय है। इस काल की कला में रूढ़िवादिता का अभाव, स्वाभाविक एवं यर्थाथवादिता का अंकन, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्य के अनुरूप सृजन, आध्यात्मिक आदर्श, कला, तकनीक की सादगी और अभिव्यंजना, लावण्य और लालित्य का संयमित प्रदर्शन मिलता है। इस काल में मन्दिर वास्तु के विकास के साथ-साथ इसके शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए। गुप्तकालीन मन्दिर नागर शैली के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। आधार पीठिका, गर्भगृह, सभा-मण्डप, शिखर, अन्तराल, प्रदक्षिणा पथ तथा द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्तियां आदि इनकी सामान्य विशेषताएं हैं। यह ईंटों व पत्थरों से निर्मित है। तिगवां का विष्णु मन्दिर, भूमरा का शिव मन्दिर, नाचना कुठार का पार्वती मन्दिर, भितरीगांव का लक्ष्मण मन्दिर व देवगढ़ का दशावतार मन्दिर आदि प्रमुख मन्दिर हैं।
इनमें क्रमशः मन्दिर की योजना व आकृति में सतत् विकास दृष्टिगोचर होता है। इनके अतिरिक्त विहार, स्तूप, गुहा, चैत्य आदि निर्मित हुए, जिनमें अजंता, बाघ, एलोरा, उदयगिरी के गुहा के मन्दिर धमेख स्तूप व महाबोधि विहार (बोधगया) मुख्य है।
मूर्तिकला:- 

  • मथुरा, सारनाथ व पाटलीपुत्र मूर्तिकला के प्रमुख केन्द्र थे। मूर्तियां धातु , पत्थर व मिट्टी की बनाई जाती थी। परिधानों की महत्ता, अलंकृत प्रभा-मण्डल, विशेष केश सज्जा, मुद्रा आसन, आध्यात्मिकता, सरलता व भारतीयकरण मूर्तिकला की प्रमुख विशेषता है। 
  • प्रतिमा निर्माण शास्त्रीय नियमों के अनुसार होता था, सुल्तानगंज की बुद्ध, मथुरा से महावीर, देवगढ़ व मथुरा की विष्णु, ऐरण व उदयगिरी की वराह की मूर्तियाँ उत्कृष्ट मूर्तिकला के उदाहरण हैं। 
  • शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की रचना भी इसी समय की गयी।

चित्रकला:-

  • गुप्त चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता व ग्वालियर की बाघ गुफाओं से प्राप्त हुए हैं। अजंता के चित्रों में प्राकृतिक सौन्दर्य, बुद्ध व बौधिसत्व तथा जातक ग्रंथों के वर्णात्मक दृश्यों का अंकन हुआ है।
  • सुन्दर कल्पना, रंगों की प्रभा, रेखाओं का लालित्य, विषय वस्तु की विविधता, अभिव्यक्ति से सम्पन्नता व अभिव्यंजना के कौशल के कारण अजंता के चित्र अद्वितीय हैं।
  • इनमें गुफा सं. 16 में उर्त्कीण मरणासन्न राजकुमारी के सहित अवलोकिश्वर, यशोधरा व राहुल आदि चित्र प्रसिद्ध हैं। गुफा सं. 17 के चित्र को चित्रशाला कहा गया है। इस गुफा में माता और शिशु का चित्र सर्वोत्कृष्ट है।
  • बाघ में नौ गुफाएँ मिलती हैं। बाघ के भित्ति चित्र, लौकिक जीवन से संबंधित हैं, जो तत्कालिक वेशभूषा, केश-विन्यास, प्रसाधन आदि की जानकारी देती है। यहाँ संगीत एवं नृत्य आदि के दृश्य का एक प्रसिद्ध चित्र मिलता है। संगीत, नाटक, अभिनय कला और नृत्यकला की अद्वितीय उन्नति हुई। समुद्रगुप्त का वीणा लिए हुए सिक्कों पर अंकित किया जाना, उसके संगीत प्रेम को सिद्ध करता है।

साहित्य:-

  • गुप्तकाल में साहित्य का अद्भुत विकास हुआ। साहित्य में संस्कृत भाषा एवं जटिल अलंकारिक शैली का विकास हुआ। प्रयाग एवं महरौली आदि प्रशस्तियों की रचना हुई।
  • भास ने स्वप्नवासवदत्ता, शुद्रक ने मृच्छकटिकम्, विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस, कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् आदि सुखान्त नाटकों एवं रघुवंश जैसे महाकाव्यों की रचना की।
  • पुराणों, स्मृतियों, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों को अन्तिम रूप दिया गया।
  • संस्कृत व्याकरण का विकास हुआ। अमरसिंह ने अमरकोश, चन्द्रगोमिन् ने चन्द्रव्याकरण आदि व्याकरण ग्रन्थ रचे। विष्णु शर्मा ने पंचतन्त्र नामक जैसे नीति ग्रंथ, ईश्वर कृष्ण ने सांख्यकारिका एवं दिङ्नाग ने प्रमाण समुच्चय आदि दार्शनिक ग्रंथो की रचना की, वाक्पतिराज का गोहडवो, प्रवरसेन का सेतुबंध आदि प्राकृत गं्रथों की रचना भी इसी काल में हुई। इस युग में लौकिक साहित्य का बाहुल्य था।

गुप्तकाल में हिन्दू विधियों का संकलन:-

  • गुप्तकाल में मनुस्मृति के आधार पर नारद, बृहस्पति, कात्यायन, याज्ञवलक्य आदि स्मृतियों में कानून का संकलन हुआ।
  • इनमें याज्ञवलक्य व्यावहारिक दृष्टि से उपयोगी है। इसमें धर्म, वर्ण, आश्रम, विधि समाज प्रायश्चित राज्य शास्त्र आदि पक्षों का उल्लेख है।
  • नारद स्मृति में व्यवहार व न्यायिक विचार, बृहस्पति ने दीवानी व फौजदारी दोनों पक्षों का विवेचन किया। कात्यायन ने कानून के चार अंग ध व्यवहार चरित्र और राजशासन बताया।
  • प्राचीन भारत में यह गुप्तों की साहित्य में महत्त्वपूर्ण देन है।
  • नालन्दा भारत का प्रमुख शिक्षा केन्द्र था। संभवत गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने इसका निर्माण कराया। गुप्त एवं पूर्व मध्यकाल में इसकी ख्याति पराकाष्ठा पर थी। देश-विदेश से छात्र शिक्षा ग्रहण करने यहां आते थे। जिनका प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता था। शिक्षकों एवं छात्रों की संख्या 10,000 से अधिक थी। यहां धर्म, विज्ञान, उद्योग, तर्क आदि की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ विशाल पुस्तकालय भी था। गणमति, स्थिरमति, शीलभद्र यहाँ के प्रसिद्ध कुलपति थे।

विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी:-

  • गुप्तकाल में विज्ञान एवं तकनीक की विभिन्न शाखाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल में गणित, ज्योतिष, खगोल, रसायन, भौतिक, आयुर्वेद, शल्यचिकित्सा आदि का विकास प्रमुख रूप से हुआ।
  • आर्यभट्ट का गणित एवं ज्योतिष में विशेष स्थान था, जिन्होंने दशगितिक सूत्र, आर्याष्टि शतक ग्रंथों की रचना की। उन्होंने पृथ्वी गोल एवं उसके घुरी पर घूर्णन का सिद्धान्त का विवेचन किया।
  • प्रसिद्ध खगोलशास्त्री भास्कर प्रथम ने भाष्य नामक ग्रंथ व आर्यभट्ट के ग्रंथों दशगितिक सूत्र एवं आर्यष्टि शतक पर टीका लिखी।
  • वराहमिहिर ने भारतीय एवं यूनानी ज्योतिष का समन्वय कर रोमक तथा पौलिश का सिद्धान्त प्रतिपादन किया। वराहमिहिर ने पंच सिद्धान्तिका, वृहत्संहिता व वृहत्जातक आदि ग्रंथों की रचना की। उन्होंने वर्गमूल व घनमूल निकालने की पद्धति तथा खगोल विज्ञान की विस्तृत विवेचना की।
  • ब्रह्मगुप्त ने गणित, ज्योतिष खगोल शास्त्र पर ब्रह्मफुट सिद्धान्त खण्ड खाद्यक आदि ग्रंथ लिखे एवं गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  • औषधिशास्त्र का सैद्धान्तिक पक्ष गुप्तकाल में प्रबल हुआ। वाग्भट्ट ने आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ 'अष्टांग हृदय' की रचना की, धनवन्तरी एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक एवं शल्य चिकित्सक थे। नवनीतकम आयुर्वेद का ग्रंथ था। इस समय वानस्पतिक औषधियों का प्रयोग होता है।
  • पशु चिकित्सा पर भी ग्रंथ लिखे गये। पलकाप्व ने हस्तायुर्वेद नामक ग्रंथ लिखा, जो हाथियों की चिकित्सा से सम्बन्धित था।
  • भौतिक एवं रसायन विज्ञान के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण अध्ययन हुए।
  • कणाद ऋषि ने गुप्त काल में वैशेषिक दर्शन एवं अणु सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। नागार्जुन रसायन तथा धातु विज्ञान के विद्वान थे। उन्होंनें चांदी, सोना आदि खनिज पदार्थों के रसायनिक प्रयोगों से रोगों के निवारण को प्रमाणित किया एवं पारद का आविष्कार किया।
  • तकनीक का विशेष ज्ञान श्रेणियों के पास था। धातुओं को रसायनिक क्रियाओं द्वारा पिघलाने तथा ढालने की कला की उन्नत्ति हुई।
  • महरौली का लौह स्तम्भ सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • सुल्तान गंज में बुद्ध की 1 टन की तांबे की खड़ी मूर्ति मिली है। सिक्के, आभूषण एवं मोहरें भी तकनीकी उपलब्धि की साक्षी है।
  • इस प्रकार गुप्तकाल में विज्ञान व तकनीक में अभूतपूर्व विकास हुआ।

आर्थिक जीवन:-

  • गुप्त काल में आर्थिक जीवन समृद्ध हुआ। विस्तृत साम्राज्य एवं सुयोग्य प्रशासन के कारण आर्थिक जीवन के सभी पक्षों-कृषि, पशुपालन, उद्योग एवं शिल्प तथा व्यापार-वाणिज्य में अभूतपूर्व उन्नति हुई।

कृषि 

  • स्मृतियों, बृहत्संहिता, अमरकोष आदि से गुप्तकालीन कृषि के बारे में जानकारी मिलती है। हल में लोहे के फाल का प्रयोग किया जाता था। 
  • बृहत्संहिता में बीजों की गुणवत्ता बढ़ाने एवं धरती की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करने के तरीकों का उल्लेख किया गया है। 
  • कृषक अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर होते थे, लेकिन गुप्त सम्राटों की ओर से प्रजा को सिंचाई की सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयास किया गया। 
  • स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख ने अनुसार उसने गिरिनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार करवाया। यह कार्य उसके सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने करवाया था। सिंचाई में रहट या घटीयंत्र का प्रयोग होता था। 
  • अमरकोष में उपज की विभिन्न वस्तुओं के नाम मिलते हैं- गेहूँ , धान, ज्वार, ईख, बाजरा, मटर, दाल, तिल, सरसों, अलसी, अदरक, कालीमिर्च आदि। 
  • बृहत्संहिता में तीन फसलों का उल्लेख है। एक फसल श्रावण के महीने में तैयार होती थी, दूसरी बसंत में और तीसरी चैत्र या बैसाख मे ंतैयार होती थी।
  • ह्वेनसांग के अनुसार पश्चिमोत्तर भारत में ईख व गेहूँ तथा मगध एवं उसके पूर्वी क्षेत्रों में चावल की पैदावार होती थी।
  • अमरसिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोष में 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख किया है। इस समय प्रचलन में करीब 5 प्रकार की भूमि का उल्लेख मिलता है- क्षेत्र भूमि, वास्तु भूमि, चारागाह भूमि, सिल व अप्रहत भूमि इत्यादि। 
पशुपालन 

  • पशुपालन जीविका का एक अन्य प्रमुख साधन था। कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार गोपालन वैश्य का पेशा है। अमरकोश में पालतू पशु के रूप में गाय के अतिरिक्त घोड़े, भैंस, ऊँट, बकरी, भेड़, गधा, कुत्ता, बिल्ली आदि को गिनाया गया है। बैल हल चलाने और सामान ढोने के काम आता था।

उद्योग एवं शिल्प

  • गुप्तकालीन उद्योगों एवं शिल्पों में जहां एक ओर विशेषज्ञता का विकास दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर प्रौद्योगिकी या तकनीकी कौशल में अद्भुत प्रगति दृष्टिगोचर होती है।
  • इस काल में धातु-शिल्प, वस्त्र-निर्माण, शिल्प साथ ही पाषाण-शिल्प, हाथीदाँत का काम आदि उद्योगों में विशेष प्रगति हुई। आभूषण, हाथीदाँत, धातुकर्म, बर्तन, जहाज उद्योग विकसित हुए।
  • गुप्तकाल में धातु-शिल्प के क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई। इस काल में धातुविज्ञान के क्षेत्र में हुई अद्भुत प्रगति का एक भव्य उदाहरण मैहरोली (दिल्ली) का लौह-स्तम्भ है जो इतनी शताब्दियों बाद भी बिना जंग लगे हुए, अक्षत खड़ा है।
  • गुप्तकालीन ताम्रशिल्प का एक श्रेष्ठ उदाहरण तांबे की विशालकाय बुद्ध की मूर्ति है जो सुलतानगंज ( जिला भागलपुर, बिहार ) से मिली थी और इस समय इंग्लैण्ड के बर्मिंघम के संग्रहालय में है।
  • गुप्तकालीन धातुकर्म का सर्वोत्तम रूप इस काल के सिक्कों में देखा जा सकता है। इस काल के ताम्रपत्रों पर लगी हुई मुहरें भी धातुशिल्प की श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • गुप्तकाल की सहस्त्रों स्वर्णमुद्रायें प्राप्त हुई है, जो विशुद्ध भी हैं तथा कलात्मक भी। गुप्तकाल की आर्थिक सम्पन्नता, कलात्मक सौन्दर्यसृष्टि तथा तकनीकी कौशल का वे ज्वंलत उदाहरण है।
  • गुप्त सम्राटों में सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने सिक्के प्रचलित किये। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय सोने के अतिरिक्त चांदी एवं तांबे का भी मुद्राओं के लिए प्रयोग किया गया। कुमारगुप्त प्रथम ने सर्वाधिक सिक्कों का प्रचलन किया। इन स्वर्ण मुद्राओं को अभिलेखों में ‘दीनार’ कहा गया है।
  • फाह्यान ने बताया कि गुप्तकाल में साधारण जनता दैनिक जीवन के विनिमय में वस्तुओं के आदान-प्रदान या फिर कौड़ियों से काम चलाती थी।

वस्त्र 

  • निर्माण भी गुप्तकाल का एक प्रमुख उद्योग था। ‘अमरकोष’ में उसका उल्लेख आता है। गुप्तकाल में धनी व्यक्तियों के लिए बहुत बारीक कपड़ा बनाया जाता था। इसीमें रेशम का कपड़ा बुनने की पूरी प्रक्रिया का विवेचन है।
  •  भारत के उत्तर-दक्षिण व्यापार में वस्त्रों का प्रमुख स्थान था तथा विदेशी बाजारों में भी भारतीय वस्त्रों की बहुत मांग थी। रेशमी वस्त्र, मलमल, लिलन, ऊनी व सूती वस्त्रों की विदेशों में अधिक मांग थी।
  • गुप्तकाल में आभूषण बनाने का शिल्प भी उन्नत अवस्था में था। आभूषण बनाने के लिए स्वर्ण एवं रजत के अलावा विभिन्न प्रकार के रत्नों का भी बहुलता से प्रयोग किया जाता था। ‘बृहत्संहिता’ में 22 प्रकार के रत्नों का उल्लेख है। साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि गुप्तकाल में काष्ठ-शिल्प भी विकसित अवस्था में था। इलाहाबाद के निकट भीत नामक स्थल पर गुप्तकालीन हाथीदाँत की बनी दो मुहरें प्राप्त हुई है।

श्रेणी संगठन

  • शिल्पी, उद्यमी तथा व्यापारी संगठित थे और उन्होंने अपने-अपने संघ बना रखे थे। इन संघों को ‘श्रेणी’, ‘निगम’ अथवा ‘गण’ कहा जाता था। ये श्रेणियां व्यावसायिक उद्यम एंव निर्माण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।
  • अपने व्यवसायों के संचालन के लिए उनके अपने नियम और कोष थे। वे आधुनिक बैंकों की भाँति काम करते थे। ये ऋण ब्याज पर देते थे और निधियाँ ब्याज पर अपने पास रखते थे। व्यापार व उद्योग श्रेणियों में संगठित थे। श्रेणियों में वस्त्रोद्योग, बैंकिंग आदि का कार्य प्रमुख था।
  • ‘श्रेणियाँ’ आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होती थीं और सामाजिक दृष्टि से उपयोगी कार्य भी करती थी, जैसे सभागृहों, यात्रियों के लिए पीने योग्य पानी की सुविधाआंे से युक्त विश्रामगृह, जलाशयों, उद्यानों, मन्दिरों आदि का निर्माण।
  • मन्दसौर के एक कुमारगुप्त-कालीन लेख से ज्ञात होता है कि दशपुर (मन्दसौर) में तन्तुवाहों (जुलाहों) की एक श्रेणी थी जिसने सूर्य-मन्दिर की स्थापना की थी।
  • श्रेणियाँ अपने आन्तरिक मामलों में पूर्ण स्वतंत्र होती थीं।
  • श्रेणी के प्रधान को ‘ज्येष्ठक’ कहा जाता था। यह पद आनुवांशिक होता था।
  • नालन्दा एवं वैशाली से गुप्तकालीन श्रेणियों, सार्ववाहों एवं कुलिकों की मुहरें प्राप्त हुई है।
  • गुप्तकाल में श्रेणी से बड़ी संस्था होती थी, जिसकी शिल्प श्रेणियाँ सदस्य होती थीं, उसे निगम कहा जाता था अर्थात् व्यापारिक समितियों को निगम कहते थे।
  • प्रत्येक शिल्पियों की अलग-अलग श्रेणियाँ होती थीं।
  • ये श्रेणियाँ अपने कानून एवं परम्परा की अवहेलना करने वालों को सजा देने का अधिकार रखती थीं। व्यापारिक कारवाँ का नेतृत्व करने वाला सार्थवाह कहलाता था। निगम का प्रधान ‘श्रेष्ठि’ कहलाता था।

गुप्तकाल में व्यापार एवं उद्योग
आन्तरिक व्यापार 

  • गुप्तकाल में व्यापार एवं वाणिज्य अपने चरम् उत्कर्ष पर था। आंतरिक व्यापार सड़कों और नदियों के द्वारा किया जाता था।
  • गुप्तकाल में दीर्घ राजनीतिक स्थिरता एवं शान्ति की स्थिति तथा गुप्तकालीन नरेशों द्वारा प्रचुर मात्रा में प्रचलित स्वर्ण मुद्राओं ने व्यापार के विकास में बहुत सहयोग दिया। आन्तरिक व्यापार की प्रमुख वस्तुओं में दैनिक उपयोग की लगभग सभी वस्तुएँ शामिल थीं जिन्हें नगरों एवं ग्रामों के बाजारों में मुख्यतः बेचा जाता था जबकि विलासितापूर्ण वस्तुओं में दूरस्थ प्रदेशों से लाई गई वस्तुएँ शामिल थीं।
  • सार्थ भ्रमणशील व्यापारी थे, जिनका नगरीय जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान था।
  • नारद एवं बृहस्पति की स्मृतियों में क्रेताओं और विक्रेताओं के समान हितों की रक्षा के लिए अनेक नियम-विनियम मिलते हैं। गुप्तकाल में मार्गों से यात्रा सुरक्षित एवं निरापद थी।
  • चीनी यात्री फाह्यान ने भारत में अपनी यात्रा के दौरान कहीं असुरक्षा महसूस नहीं की।
  • उज्जैन, भड़ौच, प्रतिष्ठान, विदिशा, प्रयाग, पाटलिपुत्र, वैशाली, ताम्रलिप्ति, मथुरा, अहिच्छत्र, कौशम्बी आदि महत्त्वपूर्ण व्यापारिक नगर थे। इन सब में उज्जैन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्थल था क्योंकि देश के हर कोने से मार्ग उज्जैन की ओर आते थे।
  • पेशावर, मथुरा, उज्जैन, पैठान मुख्य व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र थे।
विदेशी व्यापार

  • भारतीय बन्दरगाहों का बाहर के अनेक देशों से स्थायी सामुद्रिक संबंध बना हुआ था। ये देश थे- चीन, श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, बैजन्टाइन (रोमन) साम्राज्य तथा हिन्द महासागर के द्वीप।
  • गुप्तकाल में चीन के साथ भारत के विदेशी व्यापार में अत्यधिक वृद्धि हुई। चीन का रेशम जो ‘चीनांशुक’ के नाम से प्रसिद्ध था, भारत के बाजारों में अत्यधिक लोकप्रिय था।
  • रोमन साम्राज्य के पतन से कमजोर हुआ पश्चिमी विदेशी व्यापार में पुनः वहाँ बैजन्टाइन साम्राज्य की स्थापना के बाद वृद्धि हुई। यहां निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में रेशम व मसाले प्रमुख थे।
  • भृगुकच्छ (भड़ौच) पश्चिमी समुद्रतट पर स्थित एक प्रसिद्ध बन्दरगाह था।
  • कैम्बे, सोपार व कल्याण बन्दरगाह थे। पूर्वी तट पर स्थित बन्दरगाहों में घंटशाला, कदूरा तथा गंगा के मुहाने पर ताम्रलिप्ति स्थित था।
  • ताम्रलिप्ति पूर्वी भारत में होने वाले सामुद्रिक व्यापार का यह सबसे बड़ा केन्द्र था। चीन, इण्डोनेशिया तथा श्रीलंका के व्यापारिक जहाज यहाँ आते-जाते थे।
  • रघुवंश एवं दशकुमारचरित में ताम्रलिप्ति से होने वाले समृद्ध सामुद्रिक व्यापार के उल्लेख है। इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि गुप्त साम्राज्य एशिया का प्रमुख केन्द्र स्थल था एवं विश्व के सामुद्रिक देशों में वह सर्वप्रमुख सामुद्रिक शक्ति के रूप में प्रसिद्ध था।
  • भारत में चीन से रेशम, इथोपिया से हांथीदाँत व अरब ईरान तथा बेक्ट्रिया से घोड़ों का आयात होता था। दक्षिण पूर्वी एशिया, चीन व पश्चिम से ताम्रलिप्ति, भड़ौच आदि बन्दरगाहों से व्यापार होता था।
  • मसाले, मोती, वस्त्र, हाथीदांत, नील का निर्यात एवं धातु, चिनाशंकु, घोड़ो आदि का आयात किया जाता था। 
राजस्व के स्रोत 

  • गुप्तकाल में भू राजस्व राजकीय आय का प्रमुख स्रोत था। साहित्य में निम्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है -
  • भाग - राजा का भूमि के उत्पादन से प्राप्त होने वाला 1/6 हिस्सा।
  • भोग - राजा को हर दिन फल-फूल, सब्जियों के रूप में दिया जाने वाला कर।
  • उपरिकर एवं उद्रंग - ये एक प्रकार के भूमि कर थे।
  • गुप्तकाल में भूमिकर की अदायगी नकद (हिरण्य) व अन्न (मेय) दोनों रूपों में की जा सकती थी, इस समय भूमि, रत्न, खाने एवं नमक आदि राजस्व के अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत थे।
  • भू राजस्व कुल उत्पादन का 1/4 से 1/6 भाग तक होता था।
  • गुप्तकाल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।
  • फाह्यान ने गुप्तकाल में धार्मिक सहिष्णुता, सरल दण्ड व्यवस्था, घरों में तालों का अभाव तथा प्याज-लहसुन के असेवन का उल्लेख किया है, जो समाज में अपराधवृत्ति की न्यूनता, सम्पत्ति की सुरक्षा, अहिंसक तथा सात्विक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। जिन भावनाओं को जनता में पल्लवित करने हेतु मौर्य सम्राट अशोक को उपदेश देना पड़ा, वो अब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगी।
  • मौर्यों के पश्चात् पहली बार राजनीतिक एकता एवं सुव्यवस्था स्थापित हुई। गुप्तकाल में अर्थव्यवस्था का मौद्रीकरण हुआ। उद्योग तथा व्यापार प्रौन्नत थे।
  • इस युग की कला में आध्यात्मिकता, शालीनता तथा भारतीयता की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। अजन्ता, बाघ के गुहा चित्र, देवगढ़ भितरी गांव आदि के मन्दिर, विष्णु, बुद्ध, महावीर की मूर्तियों आदि, इस युग की कला के चरमोत्कर्ष के द्यौतक हैं, जो सामाजिक समृद्धि एवं सौहार्द्र का प्रतीक है।
  • साहित्य में कालिदास, हरिषेण, विष्णुशर्मा आदि ने उच्च कोटि की रचनाएं की। आर्यभट्ट, वराहमिहिर, नागार्जुन आदि ने विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विकास किया तथा भारतीय संस्कृति का भी विदेशों में प्रचार-प्रसार भी गुप्तकाल में हुआ।
  • निःसंदेह गुप्त युग कला, वास्तु, मूर्ति, शिल्प, चित्रकला, साहित्य, वैज्ञानिक प्रवृत्तियों के अवतरण, पल्लवन और मुद्रा प्रसारण में समग्र रूप से प्रगति का युग था। राजनीतिक एकता प्रतापी सम्राट, आर्थिक वैभव, धार्मिक सहिष्णुता, विदेशियों को हिन्दू धर्म में सम्मिलित करना, हिन्दूधर्म का पुनरुत्थान, संस्कृत साहित्य की प्रगति, सभी ललित कलाओं की उन्नति, विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार करने के कारण, प्राचीन भारतीय इतिहास में गुप्तकाल का स्थान श्रेष्ठ हैं। इन कार्यों के लिए निःसन्देह गुप्तकाल प्राचीन भारत का स्वर्ण युग था।
  • श्री अरविन्द ने लिखा है कि ’भारत ने अपने इतिहास में अपनी जीवन शक्ति को विभिन्न क्षेत्रों में इतना पल्लवित होते हुए कभी नहीं देखा, जितना गुप्तकाल में विकास हुआ।’


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