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Thursday, December 13, 2018

पल्लव वंश के महान शासक व स्थापत्य कला


  • कांची के पल्लव वंश की ऐतिहासिक जानकारी सबसे पहले हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति एवं ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से मिलती है।
  • पल्लव सातवाहनों के सामंत थे।
  • सिंहविष्णु ने 575 ई. में पल्लव वंश की स्थापना की।
  • किरातार्जुनीयम’ के लेखक भारवि को सिंहविष्णु (अवनीसिंह) का संरक्षण प्राप्त था।
  • सिंहविष्णु ने मामल्लपुरम में आदिवराह गुहा मंदिर बनवाया।
  • पल्लव वंश की राजधानी कांची थी।

प्रमुख शासक:-
महेन्द्र वर्मन प्रथम 600-630 ई.
  • इसके शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के मध्य लम्बा संघर्ष शुरू हो गया था।
  • उसने ‘मत्तविलासप्रहसन’ नामक हास्य नाटक की रचना की, जिसमें कापालिकों, भिक्षुओं पर व्यंग्य किया है। उसने भगवदज्जुकीयम ग्रंथ भी लिखा।
  • उसने प्रसिद्ध संगीतज्ञ रूद्राचार्य से संगीत की शिक्षा ली।
  • संगीतशास्त्र पर आधारित ग्रंथ ‘कुडमिमालय’ की रचना इसके संरक्षण में की गई थी।
  • पहले जैन धर्म को मानता था लेकिन शैव संत अप्पार के प्रभाव में आकर शैव धर्म स्वीकार कर लिया।
  • उसने मत्तविलास, विचित्रचित्र, चेत्थकारी, चित्रकारपुल्ली, ललिताकुर एवं गुणभार की उपाधि धारण की थी।


नरसिंह वर्मन प्रथम 630-668 ई.
  • सर्वाधिक पल्लव शक्तिशाली शासक था।
  • उसके समय 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची आया था।
  • उसने चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को लगभग 642 ई. में परास्त किया और राजधानी बादामी पर अधिकार कर ‘मामल्ल’ और ‘वातापिकोंडा’ की उपाधि धारण की।
  • विजयस्तम्भ बनावाया।
  • श्रीलंका के मानवर्मन को सहायता के लिए शक्तिशाली नौ-सेना भेजी, उसे पुनः राजगद्दी प्राप्त करने में मदद की।
  • इसका उल्लेख काशक्कुड्डि ताम्रपत्र और महावंश में किया गया है।
  • महाबलीपुरम के एकाश्म मंदिर जिन्हें रथ कहा गया है का निर्माण पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के द्वारा करवाया गया था।
  • महालिपुरम के सप्त पैगोडा का निर्माण नरसिंह वर्मन प्रथम ने करवाया।
  • रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रौपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।
  • महाबलीपुरम् एक प्रमुख बंदरगाह था।

महेन्द्र वर्मन द्वितीय 668-670 ई.

परमेश्वर वर्मन प्रथम 670-680 ई.
  • शैव मतानुयायी था। उसने एकमल्ल, रणजय, उग्रदंड, गुणभाजन उपाध्यिां धारण की।

नरसिंह वर्मन द्वितीय 704-728 ई.
  • इसके समय में अरबों के आक्रमण हुए।
  • उसने राजसिंह, आगमप्रिय और शंकरभक्त की उपाधियां धारण की।
  • उसने कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण करवाया जिसे राजसिद्धेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। इसी मंदिर के निर्माण से द्रविड़ स्थापत्य कला की शुरुआत हुई। यह महाबलिपुरम् के शोर मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • दशकुमारचरित’ के लेखक दण्डी नरसिंहवर्मन द्वितीय के दरबार में रहते थे।
  • उसने अपना एक दूत मंडल भेजा था।
  • उसके समय चीनी बौद्ध यात्रियों के लिए नागपट्टम में एक विहार का निर्माण करवाया था।

नंदिवर्मन प्रथम 731-795 ई.
  • वैष्णव मतानुयायी था।
  • उसने कांची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा बैकुंठ पेरूमल मंदिर का निर्माण करवाया था।
  • प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमंगाई अलवार उसका समकालीन था।
  • वैलूरपाल्यम अभिलेख में दंतिवर्मन को ‘विष्णु का अवतार’ कहा गया है।
  • नंदिवर्मन तृतीय की राजसभा में ‘भारतवेणवा’ ग्रंथ के रचनाकार संत पेरुंदेवनार निवास करता था
  • पल्लव वंश का अन्तिम शासक अपराजित 879-897 ई. था।

पल्लव कला एवं वास्तुकला
  • द्रविड़ शैली - पल्लवों के नेतृत्व में द्रविड़ शैली का विकास चार चरणों में हुआ था।

महेन्द्रशैली -
  • इसके अन्तर्गत कठोर पाषाणों को काटकर गुहा मन्दिरों का निर्माण हुआ, जिन्हें (मण्डप शैली) मण्डप कहा जाता है।

नरसिंह शैली (मामल्लशैली) - 
  • इस शैली का विकास नरसिंह वर्मन प्रथम मामल्ल के काल में हुआ। इसमें रथ या एक शिलाखंडीय (एकाश्म मंदिर) हैं जो मामल्लपुरम में पाए जाते हैं किन्तु वास्तव में आठ हैं - धर्मराज, अर्जुन, भीम, सहदेव, द्रौपदी, गणेशपिदारी एवं वालायन कुट्टीय।

राजसिंह शैली - 
  • इसके अन्तर्गत गुहा मंदिरों के स्थान पर पाषाण, ईंट की सहायता से इमारती मन्दिरों का निर्माण किया गया इस शैली का प्रयोग नरसिंह वर्मन द्वितीय ने किया।
  • महाबलीपुरम् का तट, ईश्वर तथा मुंद मंदिर, कांची का कैलाशनाथ मंदिर एवं ऐतरातेश्वर मंदिर।

नंदिवर्मन शैली - 
  • इस शैली के अंतर्गत अपेेक्षाकृत छोटे मंदिर निर्मित हुए।
  • इसका प्रयोग नंदिवर्मन ने किया, जैसे - कांची के मुक्तेश्वर मंदिर, बैकुण्ठपेरूमल मंदिर आदि।

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