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Saturday, March 24, 2018

राजस्थान की प्राचीन सभ्यता


  • आहड़ 
  • ताम्रनगरी के सांस्कृतिक अवशेष
  • तांबे के औजारों तथा बर्तनों की उपस्थिति के कारण ही अनेक स्थानों पर आहड़ को ताम्रनगरी कहा गया है।

  • 10वीं 11वीं शताब्दी में आहड़ को आघाटपुर अथवा आघाटदुर्ग भी कहा जाता था। समयान्तर से इन टीलों को 'धूलकोट' नाम से भी जाना जाने लगा।
  • धूलकोट उत्खनन में निकाले गए आवास गृहोंए मिट्टी के विविध पात्रों, तांबे के औजारों, पत्थरों के हथियारों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की मुद्राओंए मणियों, गोमेद, स्फटिक आदि का काल निर्धारण ईसापूर्व 19वीं शताब्दी निर्धारित किया गया हैं। आहड़ सभ्यता का बनास तथा सिन्धु सभ्यता से सीधा सम्बन्ध था।
  • आहड़ के मकानों की दीवारें काले पत्थर से निर्मित थीं जिन्हें जोड़ने के लिए मिट्टी का प्रयोग किया जाता था। ये दीवारें आज भी सुरक्षित हैं। इन आवासगृहों में बने कमेर विभिन्न आकारों के हैं। सबसे बड़े कमरे का आकार 33 गुणा 20 फुट है।
  • एक-एक मकान में तीन-तीन चूल्हें बने हुए मिले हैं।
  • अपवादस्वरूप एक मकान में 6 चूल्हें भी बने हुए मिले हैं।
  • मकानों की दीवारों की सुरक्षा हेतु स्फटिक के टुकड़ों का प्रयोग किया जाता था। अपने दैनिक क्रिया.कलापों में आहड़ के लोग लाल व भूरे रंग के मृदभाण्डों का प्रयोग करते थे।
  • वे आकार तथा अलंकरण में अत्यन्त सुन्दर है। मृदपात्रों में मटकोंए प्यालोंए कटोरियों तश्तरियों ओर भण्डार कलश आदि की प्रमुखता हे तथा वे अनेक रंग.बिरंगे अलंकरणों से चित्रित है। यहां से प्राप्त मणियां, गोमेद और स्फटिक आदि भी आकार तथा अलंकरण की दृष्टि से बेजोड़ हैं।
  • आहड़ से प्राप्त हाथी, घोड़ों, बैलों आदि के खिलौने, पूजा के पात्रों, चूड़ियों के टुकड़ों, चर्म सामग्री तथा अस्थियों व ताम्र-लोहे आदि से निर्मित उपकरणों के आधार पर अनेक पुरातत्वविदों न आहड़ सभ्यता का काल ईसा पूर्व 19वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक माना है।
  • आहड़ से जो मोहरें अथवा मुद्राएं मिली हैं, वे तांबे की बनी हैं और उन पर खड़े पोलो तथा त्रिशुल आदि के चिह्न बने हैं।
  • तांबे की 6 मुद्राएं व तीन मोहरें भी प्राप्त हुई हैं। आहड़ के आस-पास तांबे की खानें हैं। यहां से जो तांबे के औजार प्राप्त हुए हैं उनमें कुल्हाडियां, अंगूठियां और चूडियां प्रमुख हैं।
  • आहड़ से मिले पुरावशेषों से ज्ञात हुआ है कि यहां के निवासियों को प्रशासन तथा नगर व्यवस्था का पर्याप्त ज्ञान था। वे एक सामाजिक समुदाय में मिलजुल कर रहते थे। कृषि व पशुपालन उनका प्रमुख व्यवसाय था।

  • कालीबंगा
  • हनुमानगढ़ ज़िले में स्थित कालीबंगा हडप्पा कालीन सभ्यता का स्थल है। जो दृषद्वती और सरस्वती नदियों के किनारे का क्षेत्र होने के कारण यहां अनेक प्रकार के खेतों के अस्तित्व का भी पता चलता है।
  • इस सभ्यता की खोज 1952 ई. में अमलानन्द घोष ने की।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के निदेशक श्री बी के थापर तथा स्कूल ऑफ आर्किलॉजी के निदेशक बी.बी.  लाल के निर्देशन में 1961.62 के दोरान इस क्षेत्र में उत्खनन कार्य किया गया।
  • इस सभ्यता की खुदाई का कार्य पांच स्तरों तक किया गयाए जिसमें प्रथम एवं द्वितीय स्तर हड़प्पा सभ्यता से प्राचीन है तथा तीसराए चौथा औा पांचवां स्तर हड़प्पा सभ्यता के समकालीन माना जाता है।


  • प्रमुख साक्ष्य
  • खेत उत्खनन से प्राप्त साक्ष्य विश्व के अन्य खेतों की तुलना में अनूठे है। यहां एक खेत में दो फसलें लिए जाने के उदाहरण सामने आए हैं।
  • कालीबंगा क्षेत्र के आस.पास आज भी ग्रिड पैटर्न की खेती की जाती है।
  • जिससे सरसों व चने के साक्ष्य एक साथ दो फसले उगाने के प्रमाण मिले हैं। इस कारण इसे ष्बहुधान्य प्रमुखश् क्षेत्र कहा जाता है।
  • कालीबंगा से प्राचीन नगर के अवशेष प्राप्त हुए हैं वे हड़प्पा संस्कृति से बिल्कुल मिलते.जुलते हैं। नगर के चारों ओर मिट्टी की दीवारों का परकोटा बनाया गया था। मकान भी ईंटों और मिट्टी से बनाए जाते थे। सभी भवनों में एक ही प्राकार की ईंटे काम में ली गई थी। नगर में चौड़ी एवं पक्की सड़कें बनायी जाती थीं हड़प्पा व मोहनजोदड़ों की भांति अनेक छोटी.बड़ी गलियों द्वारा बस्तियों को जोड़ा गया था। मकानों के नीचे पानी  के निकास की गलियों के अतिरिक्त सड़कोंए स्नानागार व धान.भण्डार आदि का निर्माण भी हड़प्पा कालीन प्द्धति पर हुआ थां नगर नियोजन की दृष्टि से यहां के निवासी पर्याप्त समृद्ध थे।
  • कालीबंगा की खुदाई से मोहरों, खिलौनों के अतिरिक्त भारी संख्या में मिट्टी के पात्र और बर्तन आदि प्राप्त हुए हैं ये लालए गुलाबीए भूरे ओर मक्खनियां रंगों के हैं। इनमें अलंकरण बने हैंए वे ज्यामितिक आकारों में है। पक्की हुई मिट्टी से बने खिलौनों में जो आकृतियां बनी हुई हैंए उनमें चिड़ियोंए बैलगाडियों तथा मानवाकृतियों की प्रमुखता हैं। 
  • कालीबंगा के निवासी लेखन कला की चित्रलिपि का प्रयोग करते थे।
  • वे एक पंक्ति दाएं से बाएं और दूसरी पंक्ति बाएं से दाएं लिखा करते थे। यहां की लिपि सैंधव लिपि कहलाती थी।
  • यहां खुदाई से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों के अलावा हाथी दांतए पत्थर तथा अन्य धातुओं से बनी वस्तुएंए मूल्यवान पत्थरों के मनके आदि भी प्राप्त हुए हैं।


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