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Wednesday, February 7, 2018

मेवाड़ का इतिहास

मेवाड़ का इतिहास

गुहिलों का अभ्युदय


  • अबुल फजल मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौ शेरखां आदिल की सन्तान होना मानते है।
  • डी. आर. भण्डारकर मेवाड़ के गुहिलों को ब्राह्मण वंश से मानते है, क्योंकि बापा के लिए ‘विप्र’ शब्द आया है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा भी यह मानते है।
  • मुहणौत नैणसी इन्हें आदिरूप में ब्राह्मण एवं जानकारी से क्षत्रिय मानते है।
  • डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझाा, इन्हें ‘सूर्यवंशी’ मानते है।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को विदेशियों की संतान माना
  • मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात में गुहिलों की 24 शाखाओं का जिक्र किया हैं
  • मेवाड का प्राचीन नाम शिवि, प्राग्वाट, मेदपाट आदि था।
  • गुहिल (गुहादित्य) ने 566 ई. में स्थापना की।
  • मेवाड़ के गुहिल प्रारम्भ में गुर्जर प्रतिहारों के सामंत थे।
  • 11वीं सदी में गुर्जर नरेश विजयपाल के समय में भर्तृभट्ट ने गुर्जरों से अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।


बापा रावल


  • बापा रावल का मूल नाम कालभोज था।
  • रावल इसका विरुद (उपाधि) थी।
  • कविराजा श्यामलदास ने ‘वीरविनोद’ में बापा द्वारा मौर्यों से चित्तौड़ दुर्ग छीनने का समय 734 ई बताया है।
  • गुहिलों की राजधानी नागदा थी।
  • बापा के समय में तांबे एवं स्वर्ण धातु के सिक्के मिले है। जिन पर कामधेनु, शिवलिंग, बछड़ा नन्दी, दण्डवत करता हुआ पुरूष, नदी, त्रिशूल, चमर आदि का अंकन हुआ है।
  • बापा रावल हारीत ऋषि का शिष्य एवं पाशुपत सम्प्रदाय का अनुयायी था। अतः  उसने पाशुपत एकलिंगजी का कैलाशपुरी (उदयपुर) में मंदिर बनवाया तथा एकलिंगजी को मेवाड का राजा घोषित किया साथ ही अपने आपको उनका दीवान कहा।
  • सी.वी. वैध ने बापा को ‘चार्ल्स मार्टल’ कहा है।
  • बापा रावल के वंशज अल्लट के समय मेवाड़ की बड़ी उन्नति हुई। आहड़ उस समय एक समृद्ध नगर तथा बड़ा व्यापारिक केन्द्र था।
  • अल्लट ने आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
  • अल्लट ने मेवाड़ में सबसे पहले नौकरशाही का गठन किया।
  • रणसिंह ने आहोर के पर्वत पर किला बनवाया। रणसिंह के दो पुत्र थे-

क्षेमसिंह - रावलशाखा

  • राहप- सीसोदा ग्राम की स्थापना, राणा शाखा (सिसोदिया वंश की स्थापना की।)
  • क्षेमसिंह के दो पुत्र- सामंतसिंह
  • जयसिंह सूरी के हम्मीर मदमर्दन के अनुसार जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को परास्त कर पीछे धकेल दिया। लेकिन युद्ध के कारण भारी क्षति पहुंची। इसलिए जैत्रसिंह ने अपनी राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित की (1234)।

तेजसिंह (1253-73)

  • परमभट्टारक, महाराजाधिराज और परमेश्वर की उपाधि धारण की। बलबन का आक्रमण असफल
  • तेजसिंह की रानी जयतल्लदेवी ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
  • तेजसिंह के समय ‘श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रचूर्णि’ चित्र


राणा कुंभा

  • इस विजय की स्मृति में राणा ने चित्तौडगढ में विजय स्तम्भ ‘कीर्तिस्तम्भ’ का निर्माण 1440-48 करवाया। विजयस्तम्भ 30 फीट फुट उंचा है, 9 मंजिला। नवीं मंजिल को पुनर्निर्मित राणा स्वरूपसिंह ने करवाया।
  • स्तम्भ के स्थापत्यकार जैता, लापा और पूंजा थे तथा कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति का प्रशस्तिकार कवि अत्रि था। इसको ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष’ कहा गया है।

चंपानेर की संधिः 1456 ई.

  • यह संधि मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी एवं गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दी के मध्य 1456 ई. में राणा कुभी के विरूद्ध हुई।
  • डसके बडे पुत्र उदा ‘उदयकरण’ ने राणा की हत्या कर दी।

राणा कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियां

  • कविराजा श्यामलदास के अनुसार मेवाड के 84 दुर्गो में से कुम्भा ने 32 दुर्गो का निर्माण करवाया था। सिरोही के निकट बसन्ती का दुर्ग बनावाया। मेरों के प्रभाव को बढने से रोकनक के लिए मचान का दुर्ग का निर्माण करवायां कोलन और बदनौर के निकट बैराट के दुर्गो की स्थापना की। आबू में 1509 वि.सं. में अचलगढ का दुर्ग बनवाया। यह दुर्ग परमारों के प्राचीन दुर्ग के अवशेशों पर निर्मित है।
  • यहां एक ‘विजयस्तम्भ’ बनवाया आबू में अचलगढ- अचलेश्वर के पास कुम्भस्वामी मंदिर ‘विश्णु’ और चित्तौडगढ का पुनःनिर्माण करवाया तथा आदिवराह मंदिर, कुंभश्याम मंदिर
  • एकलिंगजी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
  • ऐसे मंदिरों में कुंभस्वामी तथा श्रृंगारचौरी का मंदिर ‘चित्तौड’ मीरा मंदिर ‘एकलिंगजी’, रणकपुर का मंदिर।

कुंभलगढ 1443-59
  • शिल्पीः मण्डन था। परकोटा 36 किमी. लम्बा।
  • किले का सबसे उंचा भाग जो ‘कटारगढ’ कहा जाता है।
  • कुंभलगढ प्रशस्ति 1460 ई. के रचियता कवि महेश। कुंभा के काल में रणकपुर के जैन मंदिरों का निर्माण 1439 ई. में एक जैन श्रेश्ठि धरनक ने करवाया था। रणकपुर के चौमुखा मंदिर ‘आदिनाथ’ का निर्माण देपाक नामक शिल्पी के निर्देशन में हुआ।
  • कुंभा के प्रमुख ग्रंथ- संगीतराज, संगीत मीमांसा, कामराज रतिसार, गीतगोविंद की टीका 'रसिकप्रिया’, सूडप्रबंध, सुधा प्रबंध’ रसिक प्रिया का पूरक ग्रंथ, चण्डी शतक पर टीका, संगीत रत्नाकर की टीका, राजवर्णन- एकलिंग महात्मय।
  • उपाधिः अभिनव भारताचार्य ‘संगीतकला में निपुण’
  • मण्डन ‘खेता ब्राह्मण का पुत्र’ रचित ग्रंथः

महाराणा सांगा 1509-28 ई.

  • महाराणा संग्रामसिंह मेवाड के परम यशस्वी शासक महाराणा कुम्भा के पौत्र तथा महाराणा रायमल्ल के पुत्र थे।
  • जन्मः 12 अप्रैल 1482 को, राज्याभिषेक मई 1509 में।
  • बडे भाई पृथ्वीराज और जयमल ईर्ष्यावश इन्हें मारना चाहते थें। सांगा का आश्रयदाता अजमेर के कर्मचन्द पंवार थे।

राणा सांगा और मालवा

गागरोन युद्ध 1519 ई.
  • मेदिनीराय की षक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से महमूद खिलजी द्वितीय ने गागरोान पर आक्रमण किया। सांगा की विजय महमूद को बन्दी बनाया।

राणा सांगा और गुजरात

  • ईडर के रावभाण के पौत्रों- रायमल और भारमल की आपसी लडाई में राणा सांगा ने रायमल की सहायता कर उसे ईडर का षासक बनाने में मदद की।


दिल्ली सल्तनत और सांगा

  • इब्राहीम लोदी 22 नवंबर, 1517 को सिंहासन पर बैठा।
  • दिल्ली सल्तनत में व्याप्त इस अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए सांगा ने पूर्वी राजस्थान के उन क्षेत्रों को जो दिल्ली सल्तनत के अधीन थे जीतकर अपने राज्य में मिला लिया।

खातोली का युद्ध 1517-18 ई.
  • दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी और राणा सांगा के मध्य पहला युद्ध बूंदी के निकट खातोाली नामक स्थान पर हुआ। इब्राहीम लोदी की पराजय हुई।
  • बाडी 'धौलपुर' का युद्ध 1519 ई.
  • इब्राहीम लोदी ने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए मियां मक्कन के नेतृत्व में षाही सेना राणा सांगा के विरूद्ध भेजी, इस युद्ध में षाही सेना की बाडी के युद्ध में बुरी तरह पराजित हुई।
  • राणा सांगा को ‘हिन्दूपत’ कहा जाने लगा।

बयाना युद्धः

  • 16 फरवरी 1527 को सांगा ने बाबर की सेना को हरा बायाना दुर्ग पर कब्जा कर लिया।


खानवा का युद्ध 1527 ई.

  • 15 मार्च, 1527 ‘भरतपुर, रूपवास तहसील में’
  • कलपी नामक स्थान पर 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा का स्वर्गवास हो गया। उनको मांडलगढ लाया गया जहां उनकी समाधि है।


महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)

  • महाराणा प्रताप का जन्म वीर विनोद के अनुसार 15 मई 1539 ई. (मुहणोत नैनसी के अनुसार 4 मई 1540 ई.) को कुंभलगढ़ में हुआ था।
  • पिताः उदयसिंह
  • माताः जैवन्ता बाई
  • प्रताप का बचपन का नामः कीका
  • उदयसिंह ने अपनी रानी भटयाणी के प्रभाव में आकर प्रताप की जगह जगमाल को उत्तराधिकारी बना गया।
  • सोनगरा अखैराज ने जगमाल को गद्दी से हटाकर प्रताप को गद्दी पर बैठाया, कृष्णदास ने प्रताप की कमर में राजकीय तलवार बांधी। 
  • उनका 28 फरवरी, 1572 ई. में गोगुन्दा में राज्याभिषेक हुआ और मेवाड़ के शासक बना।
  • अकबर ने महाराणा प्रताप के संबंध में 1572 ई. से 1576 ई. के बीच चार शिष्ट-मण्डल भेजे, परन्तु वे प्रताप को अधीन लाने में असफल रहे।
  • अ. 1572 ई. में दरबारी जलाल खां को भेजा जो महाराणा प्रताप को आत्मसमर्पण करवाने में असफल रहा।
  • ब. जून 1572 ई. में ही आमेर के राजकुमार मानसिंह को भेजा। दोनों की मुलाकात उदयसागर की पाल झीन के पास हुई लेकिन वह भी राणा को अकबर की अधीनता स्वीकार करवाने में असफल रहा।
  • स. सितम्बर 1573 ई. में राजा भगवन्तदास को भेजा लेकिन वे भी असफल रहे।
  • द. दिसम्बर 1573 ई. में टोडरमल को भेजा लेकिन वह भी असफल रहा। अंत में अकबर ने युद्ध से महाराणा प्रताप को बंदी बनाने की योजना बनाई तथा मानसिंह को मुख्य सेनापति बनाकर भेजा।
  • हल्दीघाटी का युद्ध 21 जून 1576 ई. में हुआ। कर्नल टॉड ने इसे थार्मोपल्ली का युद्ध कहा है। इस युद्ध को इतिहासकार खमनौर व गोगुन्दा का युद्ध भी कहते है। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एक मात्र मुस्लिम सरदार हकीम खां सूरी थे।
  • पहले मुगल सेना हार रही थी परन्तु मुगल सेना के नेता मिहत्तर खां ने अकबर की आने की झूठी अफवाह फैला दी जिससे मुगलों के सैनिकों में जोश आ गया।
  • राणा प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया, राणा प्रताप युद्ध से भेजा गया। राव बीदा झाला ने राज चिह्न को धारण कर अंतिम दम तक मुगलों से लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हो गए।
  • अमरकाव्य वंशावली तथा राज-प्रशस्ति के अनुसार प्रताप के युद्ध से बच निकलने के बाद उनके भाई शक्ति सिंह से भेंट हुई।
  • प्रताप ने लूणां चावण्डिया को परास्त कर 1585 ई. में चावण्ड को अपनी राजधानी बनाई। 
  • 19 जनवरी, 1597 ई. को मृत्यु हो गई।

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