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Monday, December 25, 2017

राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज



राजा राममोहन राय 

  • 19वीं शताब्दी के सांस्कृतिक जागरण के अग्रगामी थे। उन्हें आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में जाना जाता है।
  • पट्टाभिसीता रमैय्या ने लिखा ‘अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी राजाराम मोहन राय को भारतीय राष्ट्रवाद का अग्रदूत और जनक कहा जाता है।’
  • उनकी मान्यता थी कि भारत का जितना जल्दी आधुनिकीकरण होगा भारतीयों के लिए उतना ही हितकर होगा। भारतीय समाज की जड़ों में व्याप्त रूढ़ियों और कुरीतियों का उन्होंने खुला विरोध किया।
  • जन्मः 22 मई, 1772 ई. को, बंगाल के हुगली जिले में स्थित राधानगर में हुआ।
  • राजा राम कई भाषाओं के ज्ञाता थे जिनमें प्रमुख थी- अरबी, फारसी, संस्कृत जैसी प्राच्य भाषायें तथा अंग्रेजी, फ्रांसीसी, लैटिन, यूनानी और हिब्रू जैसी पाश्चात्य भाषायें।
  • पिता - रमाकांत के घर हुआ। वे रूढ़िवादी ब्रह्मण थे। ‘राम’ की उपाधि इन्हें पिता से प्राप्त हुई थी।
  • बचपन से ही उनको मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रहा। उन्होंने 1803 ई. में फारसी भाषा में ‘तूहफात-उल-मुवाहेदिन’ नामक पुस्तक की रचना की, जिसमें उन्होंने एकेश्वरवाद पर बल दिया।
  • 1820 में उनकी ‘प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस’ पुस्तक प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उन्होंने न्यू टेस्टामेंट को कहानियों से अलग करने का प्रयास किया।
  • 1809 ई. में राय ने ‘एकेश्वरवादियों को उपहार’ नामक पुस्तक लिखी। 1917 ई.में डेविड हेयर के सहयोग से राजा राममोहन ने ‘हिन्दू कॉलेज’ की स्थापना की। 1825 में उन्होंने ‘वेदान्त कॉलेज’ की स्थापना की। 
  • ब्रह्म समाज की स्थापना
  • 1815 ई. में राजाराम मोहन राय ने ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की और 1816 में उन्होंने वेदान्त कॉलेज खोला। मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने उनको अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए इंग्लैण्ड भेजा और ‘राजा’ की उपाधि दी।
  • 20 अगस्त, 1828 को राजा राम मोहन राजय ने ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की जिसके तीन प्रमुख उद्देश्य थे-
1. हिन्दू समाज की बुराइयों को दूर करना।
2. ईसाई धर्म के भारत मे बढ़ते प्रभाव को रोकना।
3. सभी धर्मों में आपसी एकता स्थापित काना।
ब्रह्म समाज का स्वरूप पूर्णतया भारतीय था। विद्वानों ने इसे अद्वैतवादी हिन्दू संस्था बताया है।
1833 ई. में राजाराम मोहन राय की मृत्यु के बाद 1842 में देवेन्द्र नाथ टैगोर ब्रह्म समाज में सम्मिलित हुए और आजीवन इस संस्था की सेवा की 1854 में केशवचन्द्र सेन ब्रह्म समाज के सदस्य बने।
उन्होंने वाक्चातुर्य और उदारवादी विचारों ने इस आन्दोलन को सामान्य जनता तक पहुंचाया। अनेक स्थानों पर इसकी शाखायें उत्तर प्रदेश, पंजाब और मद्रास में स्थापित हुई। केशवचन्द सेन पूर्णतया नवीन विचारों के समर्थक थे, अतः देवेन्द्र नाथ टैगोर से कुछ मतभेद हो जाने के कारण उन्होंने नये सामाजिक संगठन ‘आदि ब्रह्म समाज’ की स्थापना की।
आगे चलकर इसका भी एक और विभाजन हो गया। केशव चन्द्र सेन के विरोधियों ने ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राजा राममोहन राय के सम्बन्ध में लिखा है कि ‘उन्होंने भारत में नये युग का सूत्रपात किया। वस्तुतः वे आधुनिक भारत के जनक थे।’

एनी बेसेण्ट के शब्दों में, ‘वे एक असाधारण लौहपुरुष तथा अविजित शक्ति के प्रतीक थे। उनकी वीरता ने अकेले ही हिन्दू कट्टरता का मुकाबला किया और उन्होंने स्वतंत्रता का बीजारोपण किया।’


ब्रह्म समाज के सिद्धान्त -

ब्रह्मसमाज के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं-
1. ईश्वर एक है। वह अनादि, अनन्त, निराकार एवं सर्वशक्तिमान है तथा पूजा योग्य है।
2. ब्रह्म समाज बहुदेववाद तथा मूर्तिपूजा का त्याग करता है।
3. ब्रह्म समाज वर्ण-व्यवस्था का विरोधी है।
4. ब्रह्म समाज मे व्यक्ति के नैतिक पक्ष पर विशेष बल दिया गया है।
5. आत्मा अमर और अजर है।
6. पाप कर्म का प्रायश्चित एवं दुष्प्रवृत्तियों के त्याग द्वारा ही मुक्ति संभव है।
7. ईश्वर के लिए सभी समान है। वह सभी की प्रार्थना समान रूप से स्वीकार करता है।
8. ब्रह्म समाज कर्म फल के सिद्धांत में विश्वास करता है।
9. धार्मिक स्थलों का प्रयोग मनुष्य में ईश्वर भक्ति, प्राणी मात्र के प्रति प्रेम व दया बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।
10. राजा राम मोहन राय ने सत्य के अ्रन्वेषण पर बल दिया और कहा कि यह अन्वेषण आध्यात्मिक अनुभूति से ही संभव है।

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