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Sunday, November 19, 2017

शुंग राजवंश

मौर्योत्तर भारत

शुंग राजवंश :184 ई.पू. - 72 ई.पू.

पुष्यमित्र द्वारा अन्तिम मौर्य सम्राट का वध कर सिंहासन प्राप्त करने का विवरण मिलता है - हर्षचरित में

शुंग इतिहास के साधन

साहित्य -

पुराण:-


  • पुराणों में मत्स्य, वायु तथा ब्रह्माण्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
  • हर्षचरित - इसकी रचना महाकवि बाणभट्ट ने की थी। पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की सेना निरीक्षण के बहाने बुलाकर हत्या कर दी और सिंहासन पर अधिकार कर लिया। इसमें उसे ‘अनार्य; तथा ‘निम्न उत्पत्ति’ का बताता है।

पतंजलि का महाभाष्य 


  • पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे। उनके ‘महाभाष्य’  में यवन आक्रमण की चर्चा हुई है, जिसमें बताया गया हैं कि यवनों ने साकेत तथा माध्यमिका को रौंद डाला था।

गार्गी संहिता


  • एक ज्योतिष ग्रंथ, इसके युग-पुराण खण्ड में यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है। 
  • यवन आक्रांता साकेत, पंचाल, मथुरा को जीतते हुए कुसुमध्वज (पाटलिपुत्र) के निकट तक जा पहुंचे।

मालविकाग्निमित्र


  • यह महाकवि कालिदास का नाटक है। इससे शुंगकालीन राजनैतिक गतिविधियों का ज्ञान प्राप्त होता है। 
  • पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का राज्यपाल था तथा उसने विदर्भ को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। कालिदास यवन आक्रमण का भी उल्लेख करता है, जिसके अनुसार अग्निमित्र के पुत्र वसुमित्र ने सिंधु नदी के दाहिने किनारे यवनों को पराजित किया था।

थेरावली


  • इसकी रचना जैन लेखक मेरुतुंग ने की थी। उज्जयिनी के शासकों की वंशावली दी। यहां पुष्यमित्र का भी उल्लेख किया।

हरिवंश


  • पुष्यमित्र को ‘औद्भिज्ज’ (अचानक उठने वाला) कहा गया हैं जिसने कलियुग में चिरकाल से परित्यक्त अश्वमेध यज्ञ किया था। इसमें उसे ‘सेनानी’ तथा ‘काश्यपगोत्रीय’ इसकी पहचान पुष्यमित्र से करते हैं।

दिव्यवदान

पुरातत्व -

अयोध्या का लेख 


  • यह पुष्यमित्र के अयोध्या के राज्यपाल धनदेव का है। इससे पता चला हैं कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किये।

बेसनगर का लेख 


  • यह यवन राजदूत हेलियोडोरस का है तथा गरुड़ स्तम्भ के ऊपर खुदा है। इसमें मध्यभारत में भागवत धर्म की लोकप्रियता सूचित होती है।

भरहुत का लेख


  • यह भरहुत स्तूप की वेष्टिनी पर खुदा हैं इससे पता चलता है कि यह स्तूप शुंगकालीन रचना है।

शुंगों का उत्पत्ति 


  • शुंगवंश को महर्षि पाणिनि ने ‘भारद्वाज’ गोत्र का ब्राह्मण कहा है।
  • बौद्धायन श्रौतसूत्र से पता चलता हैं कि बैम्बिक ‘काश्यप गौत्र’ के ब्राह्मण थे।
  • मालविकाग्निमित्र में पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र को ‘बैम्बिक कुल’ से सम्बन्धित किया।
  • आश्वालायन श्रौतसूत्र में शुंगों का उल्लेख आचार्यों के रूप में
  • वृहदारण्यक उपनिषद् में ‘शौंगीपुत्र’ नामक एक आचार्य का उल्लेख हैं
  • शुंग पहले मौर्यों के पुरोहित थे।

पुष्यमित्र शुंग (184 ई.पू. - 148 ई.पू.)


  • पुष्यमित्र अन्तिम मौर्य शासक बृहद्रथ का प्रधान सेनापति था।
  • उसने स्वयं दो अश्वमेध यज्ञ किये।
  • पुष्यमित्र ने मगध साम्राज्य पर अपना अधिकार जमाकर देश की रक्षा काी वहीं दूसरी ओर देश में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना कर वैदिक धर्म एवं आदर्शों की जो अशोक के शासनकाल में उपेक्षित हो गये थे- पुनः प्रतिष्ठा की। इसी कारण उसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल भी कहा जाता है।

विदर्भ युद्ध


  • मालविकाग्निमित्र से ज्ञात होता हैं कि पुष्यमित्र के समय विदर्भ (आधुनिक बरार) का प्रान्त यज्ञसेन के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया था उसे शुंग का ‘स्वाभाविक शत्रु’ (प्रकृत्यमित्र) बताया गया है।
  • पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र विदिशा का राज्यपाल (उपराजा) था। उसका मित्र सेनापति वीरसेन को तुरन्त विदर्भ पर आक्रमण करने का आदेश दिया। 
  • यज्ञसेन पराजित हुआ और विदर्भ राज्य दो भागों में बांट दिया गया। वर्धा नदी दोनों राज्यों की सीमा मान ली गई एक भाग का शासक माधवसेन व दूसरे का शुंगों की अधीनता स्वीकार करने पर यज्ञसेन को शासक बनाया गया।

यवनों का आक्रमण

इस घटना की चर्चा पतंजलि के महाभाष्य, गार्गीसंहिता तथा कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक में हुई है।
पतंजलि पुष्यमित्र के पुरोहित थे।
पाटलिपुत्र साम्राज्य की राजधानी थी।

  • मालविकाग्निमित्र में ‘अमात्य-परिषद्’ तथा महाभाष्य में ‘सभा’ का उल्लेख हुआ है।

अश्वमेध यज्ञ


  • पतंजलि के महाभाष्य, मालविकाग्निमित्र, अयोध्या लेख, हरिवंश पुराण में 2 अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख हुआ है।
  • इस वंश का 9वां शासक भागवत (भागभद्र) था। इसके शासन काल के 14 वें वर्ष तक्षशिला के यवन नरेश एन्टियालकीड़स का राजदूत हेलियोडोरस उसके विदिशा स्थित दरबार में उपस्थित हुआ था। उसने भागवत धर्म ग्रहण कर लिया तथा विदिशा (बेसनगर) में गरुड़ स्तम्भ की स्थापना कर भागवत विष्णु की पूजा की।
  • शुंगवंश का अंतिम शासक नरेश देवभूति (देवभूमि) था।
  • उसके अमात्य वसुदेव ने उसकी हत्या कर दी और कण्व अथवा कण्वायन वंश की स्थापना की।

सुशर्मा कण्व वंश का अन्तिम शासक था उसकी हत्या शिमुख ने की।

शुंगकालीन संस्कृति

मौर्य साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर वैदिक संस्कृति के आदर्शों की प्रतिष्ठा की और इस कारण उनका शासनकाल वैदिक पुनर्जागरण का काल माना जाता है।

  • सामाजिक जीवन


शुंगकालीन समाज वर्णाश्रम व्यवस्था पर आधारित था। जातिप्रथा की जटिलता बढ़ गई।
मनु स्मृति जो इस काल की रचना है, में वर्णाश्रम धर्म के नियमों का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में कहा गया है कि ‘स्वधर्म निम्न होने पर भी श्रेष्ठ परधर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है।’
यदि निम्नजाति का व्यक्ति लोभवश उच्च जाति के पेशों को अपनाएं, तो राजा को चाहिए कि वह उसकी सम्पत्ति जब्त कर ले तथा उसे देश निकाला दे। 
मनुस्मृति में शूद्र अध्यापकों तथा शुद्र शिष्यों का भी उल्लेख मिलता हैं जो इस बात का सूचक है कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नहीं रखा गया था। कुछ सीमा तक उन्हें सम्पत्ति रखने का अधिकार भी दिया गया था।
मनुस्मृत्ति शूद्रों को दासों की कोटि में रखती हैं। वर्णाश्रम धर्मों तथा संस्कारों का पालन न करने वाले लोगों ‘व्रात्य’ वृषिल अथवा शंकर कहे गये हैं।
शुंगकालीन समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उच्चवर्ग का व्यक्ति निम्नवर्ग की कन्या से विवाह (अनुलोम विवाह) कहा जाता था।
मनुस्मृति में ब्राह्मण पुरुष का शूद्र कन्या के साथ विवाह की अनुमति प्रदान की।
सगोत्र तथा सपिण्ड विवाह वर्जित था तलाक की प्रथा नहीं थी। नियोग प्रथा प्रचलित थी तथा विधवा विवाह भी होते थे। समाज में सतीप्रथा के प्रचलित होने के उल्लेख नहीं मिलता।
समाज में बालविवाह का प्रचलन हो गया।

  • आर्थिक जीवन


मिलिन्दपन्हों में अनेक व्यावसायिक का उल्लेख हुआ है- मालाकार, स्वर्णकार, लोहकार, ताम्रकर, जौहरी, कुम्हार, चर्मकार, चित्रकार, रंगरेज, जुलाहे, दर्जी, रथकार आदि।
जातक ग्रंथों में 18 श्रेणियों का उल्लेख मिलता हैं।
पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, वैशाली, हस्तिनापुर, वाराणसी तथा तक्षशिला प्रमुख व्यापारिक नगर थे।
श्रृंगुकच्छ, सुप्पारक, ताम्रलिप्ति, प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह थे।
स्मुद्री व्यापार के लिए बड़े-बड़े जहाजों का निर्माण होने लगा, जिससे पोत निर्माण का एक प्रमुख व्यवसाय बन गया।
रेशमी वस्त्र, हीरे-जवाहरात, हाथीदांत की वस्तुएं तथा गर्म मसाले बाहर भेजे जाते थे। व्यापार-विनिमय में नियमित सिक्कों का प्रयोग होता था। स्वर्ण मुद्रा को निष्क, दीनार, सुवर्ण, सुवर्णमासिक कहा जाता था।
तांबे के सिक्के कार्षापण कहलाते थे।
चांदी के सिक्के के लिए पुराण अथवा धारण शब्द आया है।


  • धार्मिक दशा


शुंग राजाओं का शासनकाल वैदिक अथवा ब्राह्मण धर्म के पुनर्जागरण का काल माना जाता है। वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान पुनः प्रारम्भ हुआ। स्वयं पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किये थे। यज्ञों में पशुबलि की प्रज्ञा पुनः प्रचलित हुई। ब्राह्मण धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया।
समाज में भागवत धर्म का उदय हुआ तथा वासुदेव विष्णु की उपासना प्रारम्भ हुई तक्षशिला के एक यवन हेलियोडोरस ने वासुदेव के सम्मान में विदिशा के पास बेसनगर (भिलसा) में गरुड़ स्तम्भ का निर्माण करवाया था।
वह यवन नरेश एंटीयालकीड़स का राजदूत था। जो शुंग शासक भागभद्र के विदिशा के दरबार में आया था। वह स्वयं भागवत हो गया।
इस स्तम्भलेख पर ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है कि तीन अमर साधनों द्वारा स्वर्ग प्राप्त किया जा सकता हैं- दम (आत्मसंयम), त्याग तथा अप्रमदा (सतर्कता)।
मथुरा के समीप ‘मोरा’ नामक स्थान से प्राप्त प्रथम शताब्दी ई. के एक लेख से ज्ञात होता है कि ‘तोस’ नामक किसी विदेशी स्त्री ने संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, शाम्ब तथा अनिरुद्ध की मूर्तियों की स्थापना की थी।
भागवत धर्म के साथ-साथ महेश्वर तथा पाशुपत सम्प्रदाय का भी प्रचार था।
उन्होंने बौद्ध मतावलम्बियों को संरक्षण दिया। दिव्यावदान में कुछ बौद्धों को अमात्य के पद पर नियुक्त किया था।

  • भाषा तथा साहित्य


शुंगकाल में संस्कृत काव्य की भाषा न रहकर लोकभाषा में परिणत हो गई।
महर्षि पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों पर एक महाभाष्य लिखा।
मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप इसी युग में रचा गया था। शुंगों के समय ही महाभारत के शांतिपर्व तथा अश्वमेध पर्व का भी परिवर्धन हुआ।
कला एवं स्थापत्य
मौर्यकाल एक दरबारी कला थी जिसका प्रधान विषय धर्म था। शुंग कला के विषय धार्मिक जीवन की अपेक्षा लौकिक जीवन से अधिक सम्बन्धित है। शुंगकाल के उत्कृष्ट नमूने मध्यप्रदेश के भरहुत सांची, बेसनगर तथा बिहार के बौद्ध गया से प्राप्त होते हैं।

  • भरहुत स्तूप


श्रहुत (सतना के समीप) में इस समय एक विशाल स्तूप का निर्माण हुआ था।
भरहुत स्तूप का निर्माण पक्की ईंटों से हुआ था तथा नींव पत्थर की सुदृढ़ बनी थी स्तूप को चारों ओर से घेरने वाली गोलाकार वेदिका पूर्णतया पाषाण निर्मित थी। जिसमें सम्भवतः चार तोरण द्वार लगे थे।
भरहुत स्तूप मूलतः ईंट-गारे की सहायता से अशोक के समय में बनवाया गया, लेकिन इसकी पाषाण वेदिका तथा तोरणों का निर्माण शुंगों के काल में (दूसरी शती के पूर्वार्द्ध) में हुआ।
स्तूप के पूर्वी तोरण पर उत्कीर्ण लेख में शुंग शासक धनभूति का उल्लेख मिलता है। एक चित्र माया देवी के स्वप्न से सम्बन्धित है जिसमें स्वेत हाथी आकाश मार्ग से उतरकर उनके गर्भ में प्रवेश करते हुए दिखाया गया है। इसे अवक्रांति कहते हैं।

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