- गेब्रील रिक्यूती मिराबो (1749-1791 ई.) का फ्रांस में महत्वपूर्ण योगदान है।
- वह दिखने में अत्यन्त कुरूप और भद्दा था परंतु अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि का धनी था। उसे सदैव लक्ष्य पूर्ति की सनक सवार रहती थी तथा इसकी पूर्ति के लिए वह सिद्धांतों को भी त्याग देता था।
- उस पर भ्रष्टाचार एवं दुराचरण के भी आरोप लगे। उसके चरित्र को इस बात से भली-भांति समझा जा सकता है कि स्वयं उसके पिता ने उसे जेल भिजवाया था।
- फिर भी वह फ्रांसीसी क्रांति का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति था। उसे 'खण्डित होते हुए समाज में दुस्साहसिक कार्य करने वाला बुद्धिमान' कहा जाता था।
- इस व्यक्ति ने बूढ़े फ्रांस की जड़ों को पकड़कर हिला दिया और मानों अकेले ही इस गिरते भवन को डगमगाता हुआ थामे रहा, गिरने नहीं दिया'
- कहा जाता है 1791 ई. में उसकी अर्थी के पीछे सम्राट के प्रतिनिधियों और जैकोबिन क्लब के सदस्यों का 9 मील लम्बा जुलुस था। पेरिस में तीन दिन तक शोक मनाया गया।
- वह इंग्लैण्ड की वैधानिक राजतंत्रात्मक प्रणाली से प्रभावित हुआ। इसी प्रकार की शासन पद्धति वह फ्रांस में भी स्थापित करना चाहता था। इसी कारण उसने राजा को समझाने का प्रयत्न किया कि वह प्रजा का नेतृत्व स्वीकार कर ले। इसी के साथ-साथ उसने व्यवस्थापिका सभा को भी समझाने का प्रयास किया कि वह राजा के प्रति उदार बनी रहे। किंंतु मिराबो का यह दुर्भाग्य था कि न राजा ने और न ही व्यवस्थापिका सभा ने उसका विश्वास किया। अत: वह अपने उद्देश्य को पूरा करने में असफल रहा।
- यद्यपि मिराबो सामंत वर्ग का था किंतु 1789 ई. में जब संसद में चुनाव हुए, तो वहां वह तीसरी एस्टेट्स जनरल के तीसरे सदन का सदस्य चुना गया। जब यह प्रश्न उठा कि संसद के तीनों सदन एक साथ बैठें या अलग-अलग बैठें, तब मिराबो ने तीसरे सदन का नेतृत्व करते हुए यह मांग की कि तीनों सदन एक ही स्थान पर बैठें।
- बाद में संयुक्त अधिवेशन आहूत किया गया था परंतु तब बहुत देर हो चुकी थी।
- टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून, 1789 ई.) की घटना में मिराबो का प्रमुख था।
- जब राजा के प्रतिनिधि ने जनसाधारण वर्ग के लोगां को टेनिस कोर्ट चले जाने को कहा, तो मिराबो ने ही राजा के प्रतिनिधि से कहा था, 'जाओ, जाकर कह दो उनसे जिन्होंने तुम्हें भेजा है कि संगीनों की शक्ति जनता की शक्ति के आगे कुछ नहीं है।' यहां पर नेताओं ने घोषणा की कि वे यहां से तब तक नहीं हटेंगे, जब तक कि देश के लिए एक संविधान का निर्माण न कर लें।
- वास्तव में यह घोषणा एक क्रांतिकारी कदम थी।
- डेविड थॉमसन के शब्दों में 'इसने राजतंत्र की जड़ों को हिला दिया।'
- इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि जनसाधारण के प्रतिनिधि राजा या उसके समर्थकों से भयभीत होने वाले नहीं है। इस कारण हेज इस घटना से फ्रांस की क्रांति की शुरुआत मानते हैं।
- मिराबो के प्रयासों से पेरिस से सेना हटाने के लिए लुई 16वें को विवश होना पड़ा। मिराबो ने ही मतदान भवन (वोट बॉस ऑर्डर) के स्थान पर प्रतिनिधि के अनुसार मतदान (वोट बॉय हैड) कराया। उसके प्रयत्नों से ही जनता से वसूल किये जाने वाले टाइथ कर समाप्त किया गया। केटलबी ने व्यवस्थापिका सभा व राजा के बीच सम्बन्ध रखने के लिए मिराबो की सराहना की।
- मिराबो की मृत्यु के समय कहा गया, 'उसकी मृत्यु से फ्रांस ने एक कर्णधार खो दिया।'
- साल्वेमिनी के मतानुसार 'उसका सारा जीवन महानता व नीचता, यश व अपयश के बीच की गाथा बनकर रह गया।'
- इन सबके बावजूद 'मिराबो क्रांति का अलार्म था, वह राष्ट्रीय सभा का प्रवक्ता तथा फ्रांसीसी व्याख्याता का आदर्श था।'
मिराबो
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