कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी

कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी



राष्ट्रीय आंदोलन में ठहराव के वर्ष
         
- चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध जारी रखने के लिए एक नई रणनीति की वकालत की।
- राष्ट्रवादी आंदोलनकारी विधान परिषदों का बहिष्कार बंद करें। इन परिषदों का सदस्य बनकर वे 'पाखंडी संसद' का पर्दाफाश करें, परिषदों के सभी कामों में रूकावट डालकर नौकरशाही के इस नकाब को उघाड़ दें।
- सी.आर. दास 1922 कांग्रेस के अध्यक्ष थे और मोतीलाल नेहरू महामंत्री। इन नेताओं ने गया कांग्रेस अधिवेशन 'दिसंबर 1922' में इस नए कार्यक्रम से संबद्ध प्रस्ताव रखा।
- वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद और सी. राजगोपालाचारी ने इनका विरोध किया। प्रस्ताव के पक्ष में 890 मत और विरोध में 1748 मत पड़े, प्रस्ताव नामंजूर हो गया।
- सी.आर. दास और मोतीलाल ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया और 1 जनवरी, 1923 को एक नई पार्टी 'कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी' के गठन की घोषणा की। सी.आर. दास इसके अध्यक्ष थे और मोतीलाल महामंत्री थे।
- विधान परिषदों में हिस्सा लेने के समर्थकों को 'प्रो चेंजर्स' परिवर्तन समर्थक तथा इसके विराधियों को 'नो चेंजर्स' परिवर्तन विरोधी की संज्ञा दी गई।
- स्वराजियों का मानना था कि राजनीतिक निष्क्रियता को खत्म करने के लिए विधान परिषदों में हिस्सा लेना जरूरी है। इससें राजनीतिक रूप से जागरूक भारतीयों का मनोबल बढ़ेगा, अखबारों में खबर छपेंगी। जनता का उत्साह बढ़ेगा। चुनाव में हिस्सा लेने और विधान परिषदों में भाषणबाजी से राजनीतिक आंदोलन को बल मिलेगा। आंदोलन का प्रचार होगा।
- स्वराजियों का दावा था कि विधानमंडल में हिस्सा लेने के पीछे उनका मकसद इसे भी राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाना है। उनका कथन है कि वे औपचारिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए विधान परिषदों को बतौर हथियार इस्तेमाल करना चाहते हैं।
- रणनीति में किसी तरह के परिवर्तन का विरोध करनेवालों का तर्क था कि संसदीय कार्यों में संलग्न होने से रचनात्मक कार्यों की उपेक्षा होगी। इनका मानना है कि विधान परिषदों से बाहर रहकर रचनात्मक कार्यो के माध्यम से जनता को सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे दौर के लिए तैयार किया जा सकता है।
- सितंबर, 1923 में, दिल्ली कांग्रेस के एक विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने विधानपरिषदों का विरोध बंद करने का निश्चय किया कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव लडने और मतदान करने की इजाजत दी गई।

गांधीजी की रिहाई
- 5 फरवरी, 1924 को स्वास्थ्य की खराबी के आधार पर।
- गांधीजी विधान परिशदों का सदस्य बनने और उसकी कार्यवाही में बाधा पहुंचानं की नीति के विरोधी थे।
- 25 अक्टूबर 1924 को सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया, जिसके तहत कांग्रेस कार्यालयों और नेताओं के घरों पर छापे मारे गए। इनमे सुभाष चंद्र बोस और बंगाल विधानमंडल के दो स्वराजी विधायक अनिल बरनराय और एस.सी. मित्र भी शामिल थे।
- 31 अक्टूबर को गांधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखाः ‘रौलट ऐक्ट तो मर चुका है, पर जिन मनोभावनाओं के चलते इसे लाया गया था, वे आज भी जिंदा है। जब तक अंग्रेजों के हित भारतीयों के हित से टकराते रहेंगे, रौलट ऐक्ट कोई-न-कोई रूप मे धारण करता ही रहेगा।'
- 6 नवंबर, 1924 को गांधीजी ने स्वराजियों और उनके विरोधियों के बीच की खाई को पाट दिया। सी.आर.दास, मोतीलाल और गांधीजी ने एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किया जिसमें कहा गया था कि स्वराजी नेता कांग्रेस के अभिन्न अंग के रूप में, कांग्रेस के नेतृत्व में, विधानमंडल में अपना काम करते रहेंगे।
- दिसंबर में बेलगांव कांग्रेस अधिवेशन में इस निर्णय को मंजूरी दी गई। इस अधिवेशन की अध्यक्षता गांधीजी ने ही की। कांग्रेस कार्यकारिणी में गांधीजी ने स्वराजियों को काफी स्थान दिया।
  
चुनाव में हिस्सेदारी
- नवंबर, 1923 में विधान परिषदों के चुनाव हुए। 14 अक्टूबर को जारी अपने घोषणापत्र में स्वराजियों ने साम्राज्यवाद के विरोध को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाया था। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली की 101 निर्वाचित सीटों में से 42 पर इनकी जीत हुई।
- मध्यप्रांत में इन्हें स्पष्ट बहुमत मिला, बंगाल में ये सबसे बडे दल के रूप में अभरे और बंबई तथा उत्तर प्रदेश में भी इन्हें अच्छी सफलता मिली। मद्रास और पंजाब में जातिवाद और सांप्रदायिकता की लहर के कारण इन्हें खास सफलता नही मिली।
- सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में स्वराजियों ने साझा राजनीतिक मोर्चा बनाया। इसमें जिन्ना के नेतृत्व में उनके समर्थक, उदारवादी व व्यक्तिगत रूप में कुछ विधायक, जैसे मदनमोहन मालवीय शरीक थे।
- कार्यपालिकाऐं सीधे अंग्रेजी हुकूमत के प्रति उत्तरदायी थी।
- 1925 में इन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली, एक स्वराजी नेता विट्ठल भाई पटेल को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली का अध्यक्ष बनवाने में ये कामयाब रहे।
- इन्होंने स्वशासन की स्थापना के लिए संविधान में परिवर्तन, नागरिक स्वतंत्रता की बहाली ‘राजनीतिक बंदियों की रिहाई और दमनकारी कानूनों की समाप्ति’ और देशी उद्योगों का विकास की मांग की।

नगरपालिकाओं में काम 1923-24

- सी.आर. दास कलकत्ता के मेयर चुने गए। सुभाष चंद्र बोस मुख्य अधिशासी अधिकारी बनें।
- विट्ठल भाई पटेल अहमदाबाद नगरपालिका के, राजेन्द्र प्रसाद पटना नगरपालिका के और जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए।
  
स्वराजी संकट में
- 16 जून, 1925 को सी.आर. दास का निधन हो गया। इसमें सत्ता में पद चाहने वाले और सुधारों के समर्थक शामिल हो गए थे। एम. सी केलकर, एम.आर. जयकर
- लाजपतराय और मदन मोहन मालवीय ने सत्ता में साझेदारी व सांप्रदायिकता के मुद्दे पर स्वराज पार्टी छोड़ दी। मार्च 1926 से विधान मंडल में हिस्सा न लेने का फैसला किया।
  
स्वराजियों पर हमला
- नवंबर 1926 में चुनाव में स्वराज पार्टी ने हिस्सा लिया। केंद्र में इसे 40 सीटों मिली।
- 1928 में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक ‘पब्लिका सेफ्टी बिल’ पर सरकार की पराजय हुई। सभी राष्ट्रवादी एकजुट होकर इस विधेयक का विरोध कर रहे थें।
- लाला लाजपतराय ने कहा ‘बोल्शेविकों या लेनिनवाद से हमें कोई खतरा नहीं है। हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा पूंजीवादियों और शोषकों की ओर से है।’
- मोतीलाल नेहरू ने रूस में अपने अनुभवों को बताया और रूस-विरोधी सरकारी प्रचार की निन्दा की। ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ को उन्होंने ‘भारतीय हमला’ कहां इस विधेयक को ‘भारतीय गुलामी विधेयक नं. 1’ की संज्ञा दी।
- टी. प्रकाशम ने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य किसानों और मजदूरों के बीच राष्ट्रीयता की भावना के प्रसार को रोकना है।
- दीवान चमनलाल ने घोषणा कि ‘यदि आप हमें समाजवाद के खिलाफ उपदेश देना चाहते है, यदि आप समाजवाद के दमन का अधिकार मांग रहे है, तो आप मुगालते में है आपको यह अधिकार हासिल करने के लिए हमारी लाशों पर से गुजरना होगा।’
- पूंजीवादी के दो कट्टर समर्थको, पुरूषोत्तम दास ठाकुरदास और जी.डी. बिडला ने भी विधेयक का विरोध किया। मार्च 1929 में 31 बड़े कम्युनिस्ट नेताओं, मजदूर नेताओं तथा वामपंथी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और मेरठ में इन पर मुकदमा चलाया गया।
- लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पारित प्रस्तावों और सविनय अवज्ञा आंदोलन छिड़ने के कारण 1930 में स्वराजियों ने विधान मंडल का दामन छोड दिया।
- बारदोली तालुका ‘गुजरात’ में वेदची आश्रम में चिमनलाल मेहता, जगतराम दवे और चिमनलाल भट्ट ने आदिवासियों को शिक्षित करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

 वरसाड आंदोलन 1923-24

- गुजरात में सरकार द्वारा लगााये गये 'डकैती कर' के विरोध में।
- सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में।
- सरकार द्वारा सितंबर 1923 में वरसाड के प्रत्येक व्यस्क पर 2 रुपये 7 आने का कर लगाने की घोषणा।
- 104 ग्राम प्रभावित ने कर न अदायगी का निर्णय लिया।
- 7 फरवरी 1924 को समाप्त।
- वरसाड सत्याग्रह को हार्डिमन ने ग्रामीण गुजरात में पहला सफल गांधीवादी सत्याग्रह कहा है।

वायकोम सत्याग्रह 1924-25

उद्देश्य-
- निम्न जातीय एझवाओं एवं अछुतों द्वारा गांधीवादी तरीके से त्रावणकोर के एक मंदिर की निकट की सड़कों के उपयोग के बारे में अपने-अपने अधिकारों को मनवाना।
नेतृत्वः एझवाओं के कांग्रेसी नेता- टी.के. माधवन, के. केलप्पन तथा के.पी. केशवमेनन।
- मार्च 1925 में महात्मा गांधी ने वायकोंम का दौरा किया।
- मंदिर प्रवेश का प्रथम आंदोलन।
- सरकार ने अछूतों के लिए अलग सड़क का निर्माण किया।














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