राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा - 2005



वर्ष 2005 में प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में यशपाल समिति गठित की गई एवं वर्तमान पाठ्यचर्या में सुधार करने के उद्देश्य से 'शिक्षा बिना बोझ' शीर्षक के द्वारा कुछ प्रमुख प्रावधान प्रतिपादित किए गए। 

पाठ्यचर्या की अर्थ 
पाठ्यचर्या का अर्थ अत्यधिक व्यापक होता है एवं पाठ्यचर्या के द्वारा बालक के समग्र विद्यालय से संबंधित गतिविधियों को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया जाता है। 

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के प्रमुख प्रावधान निम्न हैं—

  • शिक्षा को रोजगार उन्मुखी बनाने का प्रयास किया जाए। 
  • शिक्षा का उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास एवं गुणात्मक शिक्षा हो।
  • गणित शिक्षण का उद्देश्य बालक में अमूर्त चिंतन का विकास करना एवं तर्क—वितर्क की क्षमता का विकास करना होना चाहिए। 
  • विज्ञान का उद्देश्य बालकों की समझ विकसित करना होना चाहिए। 
  • नागरिक शास्त्र विषय को राजनीति विज्ञान में परिवर्तित कर दिया जाए। 
  • त्रिभाषा सूत्र को पुन: लागू किया जाए जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा जोड़ दी जाए अथवा तीसरी भाषा के रूप में बालक की कोई भी क्षेत्रीय भाषा हो सकती है। 
  • हिंदी को पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय बनाया जाए। 
  • मातृभाषा एवं क्षेत्रीय भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाया जाए। 
  • परीक्षा के तनाव को दूर करने के लिए खुली परीक्षा एवं सामूहिक परीक्षा के अवसर प्रदान किए जाएं। 
  • विकेंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था को लागू किया जाए। 
  • शांति शिक्षा को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाए। 
  • पर्यावरण शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा एवं कला शिक्षक को पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए। 
  • हस्तकला, कठपुतली कला इत्यादि को विद्यालय में अनिवार्य रूप से जुड़ा जाए। 
  • समग्र व सतत मूल्यांकन को सभी विद्यालयों में लागू कर दिया जाए। 
  • शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में मूल्य शिक्षा को जोड़ा जाए। 
  • शिक्षकों के लिए समय समय पर कार्यशाला का आयोजन किया जाए। 
  • शिक्षकों को गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रेरित किया जाए। 
  • कक्षा—कक्ष में बालकों को वैचारिक आदान-प्रदान की स्वतंत्रता दी जाए। 
  • संपूर्ण देश में एक समान पाठ्यचर्या लागू करने का प्रयास किया जाए। 
  • इस प्रकार राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के द्वारा संपूर्ण देश में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया जाए। 
  • इतिहास को हमारे अतीत के रूप में पहचान ना जाए।

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