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धर्म क्या है?



  • मानव द्वारा पशुवत्तियों का त्याग व दैनिक आचरण को संयमित करना या एक बंधन जो मानव में संस्कारों से पशुवृत्तियों को दूर करता है। 
  • धर्म गरीबों की गरीबी नहीं मिटा सकता हैं। यह सत्य है कि सभी धर्मों में ऊंच-नीच का भेद पाया जाता हैं। 
  • धर्म का भेदभाव मिट जाए तो आर्थिक रूप से मानव फिर बंट जाता है। कहीं पद का तो कही वर्ण का, कही वेतन का भेदभाव देखने को मिलता है।
  • विश्व का कोई धर्म नहीं जो मानव में असमानता मिटा कर समानता ला सके, कोई पूंजी नहीं जो मानव का कष्ट हर सके।

कारण 
  • मानव में नकारात्मक महत्त्वकांक्षा जो समय के साथ बदलती है। पहले शक्ति ही सर्वेसर्वा थी और आज पैसा सब कुछ है। शक्ति सम्पन्न लोगों ने पहले जाति दी और पूंजीपति वर्ग ने पद के अनुसार पैसा देकर आर्थिक सूचक पद।

क्या दिया धर्म ने?
  • कुछ नहीं दिया सिर्फ मानव को पशुवृत्तियों से अलग कर एक सभ्य व अपनी दैनिक दिनचर्या को नियमबद्ध बना दिया जो पशुओं से मानव को अलग करती है।

पर धर्म देता क्या?

  • धर्म के पास होता क्या है यह तो एक श्रेष्ठ मानव को संस्कारित करने का माध्यम मात्र है। बाकी तो मानव में जाग्रत नकारात्मक महत्त्वाकांक्षा है, जो बुद्धि, बल और धन से मानव में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है।
  • यकीनन नकारात्मक महत्त्वाकांक्षा तब जाग्रत होती हैं जब व्यक्तियों की संख्या अधिक हो और पद या धन का अभाव हो तब व्यक्ति जीवन के विभिन्न सुखों को आसानी से प्राप्त करना चाहता है। तब यह दौर शुरू होता है। 
  • सकारात्मक महत्त्वाकांक्षा सबको समान अवसर व समान प्रगति के लिए उत्तरदायी है। पर इसको हर कोई नहीं अपना सकता है। 

क्या धर्म भीख मांगने की कहता है?

  • नहीं। धर्म अपनी व्याख्या खुद नहीं करता क्योंकि मानव ने धर्म अर्थात् मानव जीवन को अच्छे से जीने के लिए कुछ नियम बनाये हैं। जिनको अपनाकर व्यक्ति पशुओं जैसी हरकतों को त्याग कर एक श्रेष्ठ मानव बनता है पर व्यक्ति के स्वार्थ दूसरे व्यक्ति के निम्न बनाने के लिए जाग्रत होता है।


क्या धर्म असमानता लाता है?
  • नहीं। धर्म कभी लोगों असमानता नहीं लाता है। मानव ही अपनी नकारात्मक महत्त्वाकांक्षा के कारण अपने व निजी जनों के स्वार्थों को पूरा करने के लिए शक्ति व धन का दुरुपयोग करते हैं। यही कारण है कि हर धर्म में असमानता पाई जाती है।

क्या धर्म जाति व्यवस्था को मानता है?
  • नहीं। जाति या गोत्र सिर्फ एक समान नामों में अंतर का माध्यम है जोकि मानव ने अपने सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के उद्देश्य से बनायी थी। परन्तु नकारात्मक महत्त्वाकांक्षी लोगों ने इसे अपने अहम् या स्टेट्स का प्रश्न बना लिया और उसे कट्टर जाति के रूप में व्यवस्थित कर दिया। जोकि सर्वथा अनुचित है।

कौनसा धर्म श्रेष्ठ है?
  • सभी धर्म श्रेष्ठ है क्योंकि जिस भी धर्म के सिद्धांतों को उदार हृदय से पढ़ेंगे तो सब का एक ही लक्ष्य है मानव कल्याण। ताकि मानव उन सिद्धांतों को अपनाकर पशुवृत्तियों का त्यागकर एक श्रेष्ठ और सुखी जीवनयापन कर सके।
  • पर कुछ नकारात्मक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति कट्टरता से लोगों को अपने धर्म को अपनाने के लिए कहते हैं जिससे उनका जीवन उन लोगों से श्रेष्ठ गुजरता है और लोग गुलाम बन उनकी हर बात मान सके। वे हर पहलुओं का आनंद लेते हैं और वे सबसे ज्यादा नियमों का तोड़ते हैं।
  • दोस्तों मैं धर्म को मानता हूं पर उसकी कट्टरता को कदापि नहीं। 
  • हमें प्रकृति ने आश्रय दिया है वही श्रेष्ठ ईश्वर है और वही उस ईश्वर की कृति है। 
  • सूर्य जिसने सभी धर्मों को अपनी रोशनी में पलने को मौका दिया है। 
  • सोचो जब मानव सभ्यता के विकास का दौर था तब सूर्य को लगभग सब सभ्यताओं ने ईश्वर के रूप में पूजा है। 

क्यों मानव ने आदिम काल में नंगा रहना स्वीकार नहीं किया?
  • शायद, वह अपने आपको पशुओं से अलग दिखना चाहता था और एक सभ्य जीव बनकर जीवन बिताना चाहता था। ताकि प्रकृति में एक अलग पहचान बने।


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