भारतेन्दु युगीन काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां

भारतेन्दु युगीन काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां bhartendu yugin kavya ki pramukh pravritiyan

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का प्रारंभ भारतेन्दु युग से हुआ, जिसकी समय सीमा 1850 से 1900 ई. तक मानी जाती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अपने युग के प्रमुख साहित्यकार थे। उनकी बहुआयामी साहित्य सेवा के आधार पर इस युग का नाम उनके नाम पर किया गया।
भारतेन्दु युगीन कवियों की हिन्दी काव्य रचनाओं का फलक अत्यन्त विस्तृत है। इस युग में ही गद्य साहित्य का अनूठा विकास हुआ है। गद्य की विविध विधाएं भारतेन्दु युग में अपने अनूठे और प्रेरक रूप में विकसित हुई हैं।
इस काल की रचनाओं में एक तरफ मध्य युगीन रीति और भक्ति की प्रवृत्तियां दिखाई देती है तो दूसरी ओर समकालीन परिवेश के प्रति अनूठी जागरूकता दिखाई देती है। इस काल का कवि समकालीन परिस्थितियों का मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करने में अनूठी सफलता प्राप्त कर चुका है।

भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं-


राष्ट्रीयता

  • भारतेन्दु युग की राजनीति में देशभक्ति की प्रबल धारा दिखाई देती है। ऐसी ही भावधारा इस काल के काव्य में मिलती है। इस काल की कविता में यदि विदेशी शासन के प्रति रोष है तो प्राचीन भारतीय आदर्श पर गर्व है।
भारतेन्दु की पंक्तियां उद्धरणीय हैं
''अंग्रेजी राज सुख साज सजे सब भारी
पै धन विेदश चलि जात यहै अति ख्वारी।''

''भीतर-भीतर सब रस चूसै बाहर से तन मन धन भूसै।
जाहिर वातन में अति तेज क्या सखि साजन नहीं अंग्रेज।।''

  • इस काल का कवि भारतीय राजनीति, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक भावनाओं में अनुकूल उत्कर्ष देखना चाहता है। अतीत के प्रेरक प्रसंगों को प्रस्तुत कर कवि नवयुवकों में नव भाव संचार करना चाहता है। भारतेन्दु, प्रेमधन, मैथिलीशरण गुप्त आदि की कविताओं में देशभक्ति की प्रबल भावना अभिव्यंजित हुई है।

सामाजिक चेतना

  • रीतिकालीन काव्य सुरा—सुन्दरी के चित्रण तक सीमित हो गया था। भारतेन्दु युग के साहित्य ने समाज की विभिन्न समस्याओं को व्यापक रूप में प्रस्तुत करने की सराहनीय भूमिका निभाई है। नारी शिक्षा, अस्पृश्यता और विधवा विवाह का मार्मिक चित्रण भारतेन्दु युग की कविताओं में मिलता है।
  • इस काल की कविता में एक तरफ मध्य वर्गीय समाज की विषमताओं को रूपायित किया गया है तो दूसरी तरफ समाज की रूढ़ियों और अंधविश्वासों का मुखर स्वर से विरोध किया गया है।
  • इस काल की कविता में ब्रह्म समाज और आर्य समाज की नवीन सामाजिक चेतना उभरी है। सुधारवादी दृष्टिकोण इस काल की कविता की प्रमुख विशेषता है।
  • भारतेन्दु ने 'अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा नाटक में वर्ण व्यवस्था और सामाजिक अंधेर के संकीर्ण विचारों का खुलकर विरोध किया है—
बहुत हमने फैलाए धर्म।
बढ़ाया छुआछुत का कर्म।
  • इस काल के काव्य में भारतीय समाज और स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेरक अनुराग दिखाई देता है। सामाजिक विषमता और निर्धनता को देखकर कवि का हृदय चीत्कार कर उठता है। यहां के जनजीवन के शिथिल विचारों अकाल और महंगाई में पिसते हुए मध्यम वर्ग को देखकर उनकी वाणी करुणा भाव से भीग उठती है—
रोवहु सब मिलि, आवहु भारत भाई
हा!हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।

  • अंग्रेजी पढ़कर और विलायती सभ्यता में ढलकर अंग्रेज बनने की दिशा में प्रयत्नशील भारतीयों की हीन मनोवृत्ति पर आघात करते हुए प्रेमघन कहते हैं—
अच्छर—चार पढेंह अंग्रेजी, बन गये अफलातून।

भक्ति भावना

  • भारतेन्दु युग में भक्ति भावना का सीमित और सामान्य रूप सामने आता है। इस काल की भक्ति भावना सम्बन्धी रचनाएं भक्तिकाल की रचनाओं से बहुत भिन्न है। ऐसी रचनाओं में भक्ति और देश प्रेम को एक ही धरातल पर प्रस्तुत किया गया है। जिसमें संवेदना का प्रबल रूप दिखाई देता है। इस काल की भक्ति में निर्गुण, वैष्णव और स्वदेशानुराग समन्वित तीन धाराएं मिलती है।
  • भक्ति भावना में उपदेशात्मक रूप है। ऐसी भक्ति भावना में माधुर्य भक्ति के साथ रीति पद्धति भी उभर आई। यत्र—तत्र राम और कृष्ण पर आधारित रचनाएं मिलती है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निर्गुण भक्ति का पुट प्रस्तुत किया—
सांझ—सवेरे पंछी सब क्या करते हैं कुछ तेरा है
हम सब इक दिन उड़ जायेंगे यह दिन चार बसेरा है।

ऐसी भक्ति भावना पर श्रृंगार पद्धति का प्रभाव दिखाई देता है-
"सुखद सेज सोवत रघुनंदन जनक लली संग कोरे।
प्रीतम अंक लगी महाराणी, शापित सुनि खग सोरे।"

  • राम काव्य की उपेक्षा कृष्ण काव्य अधिक विस्तृत रूप पा सका है। यत्र-तत्र उर्दू शैली का भी रूप मिला है। अनेक रचनाओं में ईश्वर भक्ति और देश भक्ति का अनुपम समन्वय मिलता है।
प्रताप नारायण मिश्र की पंक्तियां उद्धरणीय हैं-
''हम आरत-भारत वासिनी पै अब दीन दयाल दया करिये।''

शृंगारिकता


  • भारतेन्दु युगीन कविताओं में शृंगार निरूपण की प्रवृत्ति भी प्रचुर रूप में पायी जाती है। भारतेंदु कालीन शृंगार-निरूपण में भक्ति कालीन एवं रीतिकालीन शृंगार वर्णन का समन्वय है। भक्तिकालीन काव्य से माधुर्य भाव की भक्ति के शृंगार परक संदर्भों को ग्रहण किया गया है तथा रीति काल से नख-शिख निरूपण, षड़ ऋतु वर्णन और नायिका भेद वर्णन की परंपरा को अपनाया गया है। साथ में उर्दू और अंग्रेजी की संवेदना और अभिव्यंजना भी प्रकट हुई है।
  • भारतेन्दु की प्रेम सरोवर, प्रेम माधुरी, प्रेम तरंग, प्रेम फुलवारी में भक्ति और शृंगार दोनों ही भावों का समावेश हुआ है। भारतेन्दु के प्रेम वर्णन की सरसता अवलोकनीय है-
''आजु लौं न मिले तो कहा हम तो तुमरे सव भांति कहावैं
मेरे उराहनों कहु नाहिं सबै फल आपुने भाग को पावैं
... प्यारे जू है जग की यह रीति विदा की समे सब कण्ठ लगावै।''
 
माधुर्य भाव का यह प्रसंग दृष्टव्य है-
नैन भरि देख लेहु यह जोरी।
मन मोहन सुंदर नर नागर श्री वृषभान किसोरी।

जनजीवन चित्रण


  • रीतिकालीन साहित्य राज दरबार के परिवेश में रचा गया और उसमें जनसामान्य के चित्रण का प्राय: अभाव ही रहा। भारतेन्दु युग का काव्य जन सामान्य के मध्य रखा गया है। उसमें जन सामान्य की समस्याओं का विशद और विस्तृत चित्रण मिलता है। इस युग का प्रत्येक कवि रूढ़ियों कुरीतियों और अत्याचार आदि को समाप्त करने का प्रेरक स्वर प्रस्तुत करता है। क्योंकि रीतिकाल का कवि राजा को प्रसन्न देखना चाहता था तो भारतेन्दु युग का कवि जन सामान्य को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता था। वह स्वस्थ समाज और प्रसन्न मनुष्यों को देखने की इच्छा रखता है। यही कारण है कि इस युग की कविता में युगीन यथार्थ के साथ प्राचीन संस्कृति का अनुपम गौरव गान मिलता है।

प्रकृति चित्रण


  • भारतेन्दु युग के कवियों ने उत्तर—मध्य युग की उसी कमी को पूरा किया जिसमें प्रकृति के स्वतंत्र और प्रेरक चित्रण का अभाव था। इस युग की कविता में प्रकृति सौन्दर्य का स्वच्छन्द रूप मिलता है। प्रकृति के माध्यम से नायक—नायिकाओं की मनोदशा का सुन्दर चित्रण किया गया है। प्रकृति के विभिन्न दृश्यों के चित्रण में इस काल का कवि सराहनीय रूप में सफल हुआ है। प्रकृति का हरा—भरा रूप, वीरान रूप, उत्प्रेरक रूप विभिन्न कविताओं में अपनी विशेषताओं के साथ प्रस्तुत हुआ है।
प्रकृति का बिम्बात्मक और चित्रात्मक रूप निश्चय ही अवलोकनीय है।
''पहार अपार कैलास से कोटिन ऊंची शिखा लगी अम्बर चूमै
निहारत दीहि भ्रमैं पगिया गिरिजात उत्तंगता ऊपर झूमैं।

काव्य रूप

  • भारतेन्दु युग की प्राय: सभी रचनाएं मुक्तक काव्य पर आधारित हैं। हरिनाथ पाठक की श्री ललित रामायण और प्रेमधन की जीर्ण जनपद आदि कुछ एक प्रबन्धात्मक रचनाएं अपवाद स्वरूप है। इस काल के अधिकांश कवियों ने गीत, लोक संगीत और विनोद से सम्बंधित रचनाओं को मुक्तक में ही प्रस्तुत किया है।
  • भारतेन्दु जैसे कुछ कवियों ने गजल के रूप में भी रचनाएं प्रस्तुत की है। इनकी हिन्दी रचनाओं में उर्दू का भावात्मक रूप स्पष्ट दिखाई देता है। इस युग का काव्य परम्परागत मुक्तकों के साथ नवीन प्रयोग भी सामने आया है। इस काल में काव्य के साथ गद्य की निबन्ध समीक्षा, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, प्रहसन आदि विधाओं का सुन्दर विकास हुआ है।

भाषायी चेतना

  • भारतेन्दु युग में राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रति प्रबल प्रेम दिखाई देता है। इस काल का कवित सहज, सुगम और उर्दू मिश्रित हिन्दी भाषा का प्रयोग करता था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की भाषा में भी उर्दू ही नहीं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का प्रयोग मिलता है। सरलता और सहजता के साथ भाषा में प्रभावोत्पादक रूप लाने के लिए लोकोक्ति और मुहावरों का भी अनुकरणीय प्रयोग इस काल की कविता की प्रमुख विशेषता है। इस काल की कविता में विभिन्न अलंकारों का सहज प्रयोग विशेष प्रभावोत्पादक बन गया है। सभी रसों का सुन्दर परिपाक भी मिलता है। हिन्दी के प्रति अनुपम अनुराग इस युग की कविता की प्रमुख विशेषता है।
'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को सूल।'
  • भारतेन्दु युग की प्रवृत्तियों पर विशद चिंतन करने के पश्चात यह स्पष्ट रूप से कहा जाता सकता है कि यह हिन्दी साहित्य का नवजागरण काल है जिसमें राष्ट्रीयता, सामाजिकता और भाषायी प्रेम की अनुपम त्रिवेणी बहती है। 

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