ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs)
भारत की अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव आया है। क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां-जैसे कि Google, JP Morgan, या Microsoft, अपने सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी और अनुसंधान (Research) का काम भारत से क्यों करवा रही हैं? इसका जवाब है-ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs)।
आज के ब्लॉग में, हम जानेंगे कि GCC क्या हैं, वे भारत के विकास में कैसे योगदान दे रहे हैं, और छात्रों व पेशेवरों के लिए इसमें क्या अवसर छिपे हैं।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) क्या है?
सरल शब्दों में, GCCs (Global Capability Centers) वे ऑफशोर यूनिट्स (offshore units) हैं जो बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने देश के बाहर स्थापित करती हैं। पहले इन्हें केवल "बैक-ऑफिस" या "सपोर्ट डेस्क" माना जाता था (जैसे कॉल सेंटर), लेकिन अब यह पूरी तरह बदल चुका है। आज ये केंद्र पेरेंट कंपनी के लिए इनोवेशन पावरहाउस बन गए हैं। वे अब केवल सपोर्ट नहीं देते, बल्कि रिसर्च, डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और R&D का मुख्य काम संभालते हैं।
भारत में GCC की अद्भुत विकास यात्रा
भारत में टैलेंट और टेक्नोलॉजी का मिलन एक नई क्रांति ला रहा है। आइए आंकड़ों पर नजर डालते हैं जो इस विकास की कहानी बयां करते हैं:
संख्या: भारत में 1,700 से अधिक GCCs काम कर रहे हैं।
राजस्व (Revenue):
- वित्त वर्ष 2019 में $40.4 बिलियन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में $64.6 बिलियन हो गया है। जो सालाना 9.8% की स्वस्थ गति से बढ़ रहा है।
- रोजगार: संख्या तक सीमित नहीं, ये जीसीसी अब देश भर में 19 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं, जो यहीं भारत से तकनीक और व्यवसाय के भविष्य को आकार दे रहे हैं।
- ये केंद्र दुनिया भर में अपने मूल संगठनों के लिए नवाचार, डिजिटल परिवर्तन और रणनीतिक संचालन को आगे बढ़ाते हैं।
- भारत सरकार ने प्रगतिशील नीतियों, बुनियादी ढांचे के विकास और स्टार्टअप समर्थन के माध्यम से इस पारिस्थितिकी तंत्र के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
ये केंद्र अब केवल आईटी सपोर्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एयरोस्पेस, डिफेंस, सेमीकंडक्टर और AI/ML जैसे क्षेत्रों में ग्लोबल लीडरशिप दे रहे हैं। इंजीनियरिंग रिसर्च से जुड़े GCCs सामान्य सेटअप की तुलना में 1.3 गुना तेजी से बढ़ रहे हैं।
2030 का विजन: भविष्य की तस्वीर
PIB की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ग्लोबल विस्तार के केंद्र में है। 2030 तक की भविष्यवाणियां बेहद उत्साहजनक हैं:
मार्केट साइज: यह सेक्टर $105 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
सेंटर्स: लगभग 2,400 सेंटर्स काम कर रहे होंगे।
कर्मचारी: इसमें 28 लाख (2.8 Million) से अधिक प्रोफेशनल्स काम करेंगे।
हब: बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, मुंबई और दिल्ली-NCR इसके मुख्य क्लस्टर बने रहेंगे।
यह सब संभव कैसे हुआ? (सरकारी नीतियां और इकोसिस्टम)
भारत का यह उभार संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का नतीजा है। सरकार की प्रोग्रेसिव नीतियों ने इस इकोसिस्टम को मजबूती दी है:
इंफ्रास्ट्रक्चर: संशोधित इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर (EMC 2.0) योजना के तहत प्लग-एंड-प्ले सुविधाएं और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।
स्टार्टअप सहयोग: जेनेसिस (Gen-Next Support) जैसी पहल के जरिए टियर-II और टियर-III शहरों में स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो GCCs के लिए इनोवेशन पार्टनर बन रहे हैं।
स्किल डेवलपमेंट: स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया के माध्यम से युवाओं को क्लाउड कंप्यूटिंग, डेटा एनालिटिक्स और AI में ट्रेन किया जा रहा है। भारत आज ग्लोबल STEM वर्कफोर्स का 28% योगदान देता है।
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: सरल FDI पॉलिसी और सिंगल-विंडो क्लियरेंस ने विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना आसान बना दिया है।
निष्कर्ष: छात्रों और पेशेवरों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर आप एक छात्र हैं या अपने करियर की शुरुआत कर रहे हैं, तो GCCs का उदय आपके लिए सुनहरे अवसर लेकर आया है।
हाई-वैल्यू जॉब्स: अब नौकरियां केवल कोडिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रिसर्च और स्ट्रैटेजिक लीडरशिप में बढ़ रही हैं।
ग्लोबल एक्सपोजर: भारत में बैठकर आप दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के कोर ऑपरेशन्स को लीड कर सकते हैं। 2030 तक ग्लोबल लीडरशिप रोल्स 6,500 से बढ़कर 30,000 होने की उम्मीद है।
भारत अब "सर्विस देने वाले देश" से आगे बढ़कर दुनिया का "स्ट्रैटेजिक नर्व सेंटर" बन रहा है। नीति से समृद्धि तक की यह यात्रा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।