पाबूजी: ऊंटों के देवता, प्लेग रक्षक देवता




  • 13 वीं शताब्दी (1239 ई) में फलौदी, जोधपुर के पास कोलूमण्ड में हुआ।
  • राठौड़ वंश के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे। अपने बहनोई जीन्दराव खींची से देवल चारणी (जिसकी केसर कालमी घोड़ी ये मांग कर लाये थे) की गायें छुड़ाने गए और देचूँ गांव में युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए।
  • विवाह - अमरकोट के सूरजमल सोडा की पुत्री फूलमदे से हुआ।
  • उपनाम - ऊंटों के देवता, प्लेग रक्षक देवता, राइका/रेबारी जाति के देवता आदि।
  • राइका /रेबारी जाति का संबंध मुख्यतः सिरोही से है।
  • मारवाड़ क्षेत्र में सर्वप्रथम ऊंट लाने का श्रेय पाबूजी को है।
  • पाबूजी ने देवल चारणी की गायों को अपने बहनोई जिन्द राव खींचीं से छुडाया।
  • पाबु जी के लोकगीत पवाडे़ कहलाते है। 
  • माठ वाद्य का उपयोग होता है।
  • पाबु जी की फड़ राज्य की सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है।
  • पाबु जी की जीवनी "पाबु प्रकाश" आंशिया मोड़ जी द्वारा रचित है।
  • इनकी घोडी का नाम केसर कालमी है।
  • पाबु जी का गेला चैत्र अमावस्या को कोलू ग्राम में भरता है।
  • पाबु जी की फड़ के वाचन के समय "रावणहत्था" नामक वाद्य यंत्र उपयोग में लिया जाता है।
  • प्रतीक चिन्ह - हाथ में भाला लिए हुए अश्वारोही।


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