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Sunday, November 25, 2018

खबरदार ये बात जगजाहिर की तो, वो खाल खिंचवा देंगे


नमस्कार दोस्तों, 

  • आप सभी का स्वागत है, बासी खबरों के बासेपन में। मैं मीडिया पुरोहित (न्यूज एंकर को दिया नाम जो बिजनेस को बढ़ावा ज्यादा देते हैं जैसे प्राचीन काल में राजपुरोहित राजा और लोगों को जोड़े रखता था वैसे ही अखबार वाले राजनीतिक पार्टी, बिजनेस घराने और क्या खरीदें और क्या नहीं सब से लोगों को जोड़े रखते हैं)
  • खबरों का बासापन से तात्पर्य है वे खबरें जो बार-बार उसी अन्दाज में छापती है, लोग पढ़ते हैं और भूल जाते हैं। कोई बड़े बदलाव की गुंजाइश नहीं। उन खबरों पर सरकार की ओर कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है और आती है तो कोई कड़े कानून नहीं बनते हैं। कभी-कभी अपराधी इतना ताकतवर होता है कि मीडिया तक चुप हो जाता है। और वे खबरें हम लोगों के मुंह से सुनते हैं क्योंकि लोग डरते अवश्य  है पर सच्चाई जानते हैं। ये खबरें पढ़-पढ़ कर लोग तंग आ जाते हैं। तो हमने इन खबरों को एक नया नजरिया दिया है।
  • तो इस श्रृंखला का पहला लेख है।
  • मैंने खबर पढ़ी, खबरदार ये बात जगजाहिर की तो। वो खाल खिंचवा देंगे, हमारी क्योंकि बड़े अधिकारी जो है साब!
  • ऐसा ही तो होता था राजतंत्र में। एक अधिकारी दूसरे अधिकारी को बचा लेता था रिश्वत के इल्जाम में। वैसे आज भी ऐसा ही हो रहा है और अब लोकतंत्र में भी देखने को मिलता है। हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी ऐसा हो रहा है। 
  • एक मीडिया पुरोहित का दावा जिन पर लोगों का बड़ा विश्वास है। उसकी बड़ी हैडिंग में लिखा घूस लेने वालों को पकड़ा सही एबीसी वालों ने, पर विभाग के बड़े बाबू भैय्या ने अपने जिगरी को बचा लिया, कोर्ट तक मामला जाने ही नहीं दिया। बेचारी एबीसी की मेहनत पर पानी फिर गया। कहते ऐसे में एक को ओर भ्रष्टाचार बढ़ाने में प्रोत्साहन मिलेगा और दूसरे का काम करने के नजरिये में परिवर्तन आयेगा क्योंकि उसका भी घर परिवार है, फिर पहली कोशिश बेकार तो क्यूं करेगा वह भ्रष्टाचार पर बार।
  • ताजुव्व की बात है इन अधिकारियों के सर से अभी भी राजाशाही का भूत गया नहीं। नहीं तो ये कब के ही घूसखोर को सलाखों के पीछे धकेल देते। पर किसमें हिम्मत जो ऐसा करे क्योंकि कई लोगों से सुना है बड़े साब का भी, दिया टारगेट पूरा करना जो होता है। ऐसे में यदि बात ज्यादा नहीं आगे बढ़ी तो वे ही उसे दोष मुक्त कर देते हैं और जब साब के ऊपर बन आये तो फिर नेताजी की सिफारिश बड़ी काम आती है। 
  • पर ऐसा करने से बड़े बाबू भी डरते हैं क्या पता कल उनकी बारी हो और सलाखों के पीछे कैद जिगरी मार के आगे सच उगल दे। ऐसा ही कुछ माजरा है तभी तो ये लोग एक-दूजे पर इल्जामों से बरी हो जाते हैं। बस फंसता है तो गरीब।
  • कारण स्पष्ट है एक विभाग दूसरे पर विश्वास नहीं करता क्योंकि सबका मालिक एक है सरकार और सरकार पांच साल के लिए होती है। वे भी अपना घर भरते हैं। ये भी तो प्रचार-प्रसार में अपना सब कुछ दाव पर लगा देते हैं।
  • तो समझ आया भैय्या किसी भी व्यवस्था को दोष देने से अच्छा है आदमी को ही दोष दें क्योंकि न राजतंत्र बुरा था न लोकतंत्र, क्योंकि सबकी बागडोर आदमी के हाथ में होती है।  कोई बुरा है तो वह है महत्त्वाकांक्षी आदमी जो अपने निजी जनों के सिवाय न जाति के लोगों की सोचता है न धर्म की। वह तो अपनी अय्यासी के लिए जीता है।
  • ये एक चक्र है जो हर व्यवस्था में चलता है। लोग कहे सरकार भ्रष्ट, सरकार कहे हमारी योजनाएं लोककल्याणकारी है पर अधिकारियों के भ्रष्ट होने से सफल नहीं होती, अधिकारी कहे जनता ही ऐसी। 
  • तो भैय्या किसे दोष दे हम तो अपने परिवार को भी दोषी मानते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे की बातें नहीं मानते। हां ज्यादातर परिवारों में ऐसा ही होता है क्योंकि हम मानव है और एक साथ कभी नहीं चल सकते। तो दोस्तों सबसे पहले बदलाव परिवार से ही लाना पड़ेगा।


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