भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं तो एक छोटी सी कोशिश अवश्य करें


प्रिय शहरवासियों,
दिवांशुः सभ्यता निर्माता आपसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कहना और एक छोटी सी कोशिश करने का आग्रह करता है।
अक्सर हम लोगों से शिकायत सुनते हैं कि बस कंडक्टर भ्रष्ट होते हैं। यह सच है ज़्यादातर मौकों पर ऐसा होता है पर कभी हम खुद भी इसे बढ़ने में योगदान देते हैं। ऐसा करना कोई नहीं चाहता लेकिन किसी की मजबूरी यानि पैसों का अभाव हमें ऐसा करने के लिए विवश कर दें।
मैं यहां किसी को दोषी नहीं बल्कि यह बताना चाहता हूं कि हमें अक्सर दूसरों के दोष या अवगुण बहुत जल्द दिख जाते हैं, पर हमारे खुद के दोष नजर नहीं आते हैं।
दोषी कोई भी हो सकता है पर आप न बनें। मैंने कई बार जयपुर में लोफ्लोर बसों में यात्रा के दौरान कंडक्टरों को देखा है कि वे या तो कम पैसे में टिकट नहीं देते हैं और यदि देते हैं तो यदि 12 रुपये का टिकट है तो वह सवारी के 10 रुपये देने पर उससे 2 रुपये मांगने पर यदि सवारी नहीं देती है तो वह उसे या तो 8 रुपये का या फिर टिकट ही नहीं देता है।
इससे हमें माना 2 रुपये का फायदा हो लेकिन हमारी सरकार को सीधा 10 रुपये की हानि हुई है यह सब आपको भी पता है। मगर हम अक्सर ऐसी गलती करते हैं।
कई बार देखने में आया है कि कंडक्टर टिकट के पीछे बाकी पैसे लिख देता है। ऐसे या तो सवारी पैसे भूल जाती है या कंडक्टर को जब टिकट देते हैं तो वह उसका कॉर्नर फाड़कर टिकट अपने पास रख लेता है और दूसरे राउण्ड में सब नयी सवारी होती है तो वह पुराना टिकट उन सवारियों को दे देता है।
कंडक्टर की चालकी का मैं खुद शिकार हो चुका हूं लेकिन दूसरी बार मैंने इसका पूरे साहस के साथ विरोध किया और पूरे पैसे देकर सही टिकट लिया।
मेरा आपसे अनुरोध है कि यदि आप कंडक्टर से बाकी पैसे ले तो टिकट भी जरूर ले। हम यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं तो एक छोटी सी कोशिश अवश्य कर सकते हैं।
दिवांशुः सभ्यता निर्माता
लेखक - राकेश सिंह राजपूत

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