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Thursday, February 22, 2018

बूंदी की सुंदरता में चार चाँद लगाता है तारागढ़ दुर्ग और झीलें


  • राजस्थान के अरावली पर्वतमाला में बसे बूंदी ज़िले की सुरक्षा प्रहरी की तरह है बूंदी का तारागढ़ दुर्ग।
  • हाड़ा राजपूतों के अप्रतिम शौर्य और वीरता का प्रतीक बूंदी का तारागढ़ पर्वतशिखरों से सुरक्षित होने के साथ-साथ नैसर्गिक सौन्दर्य से भी ओतप्रोत है।
  • यह गिरि दुर्ग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • इसका निर्माण 14वीं सदी में 1354 ई. में बूंदी के संस्थापक राव देव हाड़ा ने करवाया। राजस्थान के अन्य किलों की तुलना में इस दुर्ग पर मुगल स्थापत्य कला का कोई खास प्रभाव दिखाई नहीं देता। यह दुर्ग ठेठ राजपूती स्थापत्य व भवन निर्माण कला से बना हुआ है। 
  • सुदृढ़ और उन्नत प्राचीर, विशाल प्रवेशद्वार और अतुल जलराशि से परिपूर्ण तालाब ऐसा नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करते हैं कि तारागढ़ का सौन्दर्य देखते ही बनता है।
  • बूंदी और उसका निकटवर्ती प्रदेश (कोटा सहित) तक हाड़ा राजवंश द्वारा शासित होने के कारण हाड़ौती के नाम से जाना जाता है।
  • कविराजा श्यामलदास द्वारा लिखित ग्रंथ ‘वीर विनोद’ में उल्लेख -
‘कुल मीनों का सरदार जैता बूंदी में रहता था जिसको दगा से देवसिंह ने मार डाला। उसके खानदान के लोगों को भी जो शराब के नशे में गाफिल थे कत्ल करके देवसिंह ने बूंदी पर अपना कब्जा कर लिया। उस वक्त से बूंदी में हाड़ाओं का राज चला आता हैं।’
  • वंशभास्कर में भी देवसिंह द्वारा जैता मीणा से बूंदी लेने का प्रसंग आया है।
  • राव देवा के वंशज राव बरसिंह ने मेवाड़, मालवा और गुजरात की ओर से संभावित आक्रमणों से सुरक्षा के लिए बूंदी के पर्वतशिखर पर एक विशाल दुर्ग का निर्माण करवाया जो तारागढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित होने के कारण धरती से आकाश के तारे के समान दिखलाई पड़ने के कारण इसका नाम तारागढ़ पड़ा हो।
  • इसका स्थापत्य कछवाहा राजवंश की पूर्व राजधानी आम्बेर से मिलता जुलता है।
  • लगभग 1426 फीट ऊंचे पर्वतशिखर पर बने यह दुर्ग पांच मील के क्षेत्र में फैला है। तारागढ़ की सुदृढ़ प्राचीर में बनी विशालकाय भीमबुर्ज या चौबुर्जे से जब आक्रमणकारी पर गोले बरसते होंगे तो दुश्मन के तारागढ़ लेने के मनसूबे ठंडे पड़ जाते होंगे।
  • पर्वतीय ढलान पर बने बूंदी के भव्य राजमहल अपने अनूठे शिल्प और सौन्दर्य के कारण अद्वितीय हैं। इतिहासकार कर्नल टॉड बून्दी के राजमहलों के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया। उसने राजस्थान के सभी रजवाड़ों के राजप्रसादों में बूंदी के राजमहलों को सर्वश्रेष्ठ कहा है।
  • अपने निर्माताओं के नाम से प्रसिद्ध इन महलों मे छत्र-महल, अनिरुद्ध महल, रतन महल, बादल महल और फूल महल स्थापत्य कला के अत्यंत उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बूंदी के इन राजमहलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके भीतर अनेक दुर्लभ एवं जीवन्त भित्तिचित्रों के रूप में कला का एक अनमोल खजाना विद्यमान है।
  • विशेषकर महाराव उम्मेदसिंह के शासनकाल में निर्मित चित्रशाला (रंगविलास) बूंदी चित्रशैली का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है। देश-विदेश के संग्रहालयों में सुरक्षित बूंदी शैली के चित्रों में शिकार, युद्ध, राग-रागिनियों, बारहमासा, प्रकृतिचित्रण, नारी सौन्दर्य तथा अन्यान्य धार्मिक धार्मिक और लौकिक विषयों से सम्बन्धित चित्रों का बाहुल्य है, जो बूंदी के हाड़ा शासकों के कलाप्रेम का उजागर करती है।
  • अन्य भवनों में जीवरखा महल, दीवान ए आम, सिलहखाना, नौबतखाना, दूधा महल, अश्वशाला आदि उल्लेखनीय हे।
  • हाथीपोल, गणेशपोल तथा हजारीपोल दुर्ग के प्रमुख द्वार हैं। इनमें हाथीपोल के दोनों ओर हाथियों की दो सजीव पाषाण प्रतिमाएं लगी है जिन्हें महाराव रतनसिंह ने वहां स्थापित करवाया था। महाराव बुद्धसिंह ने बूंदी नगर के चारों ओर प्राचीर का निर्माण करवाया।
  • इसके अलावा चौरासी खम्भों की छतरी, शिकार बुर्ज तथा फूलसागर, जैतसागर और नवलसागर सरोवर बूंदी के वैभव में चार चांद लगाती हैं।
  • मेवाड़ के महाराणा लाखा के अथक प्रयासों के बावजूद भी बूंदी पर अधिकार न कर पाये तो उन्होंने मिट्टी का नकली दुर्ग बनवा उसे ध्वस्त कर अपने मन की आग बुझाई। परंतु इस नकली दुर्ग के लिए भी मानधनी कुम्भा हाड़ा ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। 
  • दुर्ग में बना विशाल जलाशय कभी गढ़ में पानी उपलब्ध कराता किले के भीतर कई आकर्षक स्मारक हैं जिनमें भीम बुर्ज प्रमुख है। भीम बुर्ज के निक बनी हुई छतरी का निर्माण भाई देवा ने करवाया था और यह अपनी शिल्प कला के लिए जानी जाती है। आज यह दुर्ग बूंदी का प्रमुख आकर्षक है।
  • चित्रशाला
    यह चित्रशाला मनमोहक मण्डप और लघु भित्ति चित्रों की दीर्घा महल से अलंकृत हैं रागमाला और रासलीला, राधाकृष्ण के परिष्कृत रंगीन दृश्य दीवार पर अंकित है। आज भी बूंदी के भिति चित्र विश्व प्रसिद्ध है व बूंदी की यात्रा चित्रशाला देखे बिना पूरी  नहीं मानी जाती है।
    बूँदी अपनी विशिष्ट चित्रकला शैली के लिए विख्यात है, जो इस अंचल में मध्यकाल में विकसित हुई। बूँदी के विषयों में शिकार, सवारी, रामलीला, स्नानरत नायिका, विचरण करते हाथी, शेर, हिरण, गगनचारी पक्षी, पेड़ों पर फुदकते शाखामृग आदि रहे हैं।
    श्रावण-भादों में नाचते हुए मोर बूँदी के चित्रांकन परम्परा में बहुत सुन्दर बन पड़े है। यहाँ के चित्रों में नारी पात्र बहुत लुभावने प्रतीत होते हैं। 
    नारी चित्रण में तीखी नाक, बादाम-सी आँखें, पतली कमर, छोटे व गोल चेहरे आदि मुख्य विशिष्टताएँ हैं। स्त्रियाँ लाल-पीले वस्त्र पहने अधिक दिखायी गयी हैं। बूँदी शैली की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता पृष्ठ भूमि के भू-दृश्य हैं। 
    चित्रों में कदली, आम व पीपल के वृक्षों के साथ-साथ फूल-पत्तियों और बेलों को चित्रित किया गया है। चित्र के ऊपर वृक्षावली बनाना एवं नीचे पानी, कमल, बत्तख़ें आदि चित्रित करना बूँदी चित्रकला की विशेषता रही है।
    मुग़लों की अधीनता में आने के बाद यहाँ की चित्रकला में नया मोड़ आया। यहाँ की चित्रकला पर उत्तरोत्तर मुग़ल प्रभाव बढ़ने लगा। राव रत्नसिंह (1631- 1658 ई.) ने कई चित्रकारों को दरबार में आश्रय दिया। शासकों के सहयोग एवं समर्थन तथा अनुकूल परिस्थितियों और नगर के भौगोलिक परिवेश की वजह से सत्रहवीं शताब्दी में बूँदी ने चित्रकला के क्षेत्र में काफ़ी प्रगति की। चित्रों में बाग, फ़व्वारे, फूलों की कतारें, तारों भरी रातें आदि का समावेश मुग़ल प्रभाव से होने लगा और साथ ही स्थानीय शैली भी विकसित होती रही। चित्रों में पेड़ पौधें, बतख तथा मयूरों का अंकन बूँदी शैली के अनुकूल है। सन् 1692 ई. के एक चित्र बसंतरागिनी में बूँदी शैली और भी समृद्ध दिखायी देती है। कालांतर में बूँदी शैली समृद्धि की ऊँचाइयों को छूने लगी।

  • जैतसागर झील : यह सुरम्य झील बूंदी में तारागढ़ किले के नजदीक है, जो शुक्ल बावड़ी दरवाजे के बाहर स्थित चारों ओर पहाड़ियों से घिरी हुई है। इसे जैता मीणा ने बनवाया था। जल संरक्षण राजस्थान की परंपरा में समाहित है। यहां जल स्रोत धार्मिक आस्था से बंधे हैं।
    इसका जीर्णोद्धार राव राजा सुरजन सिंह की माता रानी जयवंती ने करवाया था। इसके बाद इसका पुनरुद्धार राव राजा विष्णु सिंह के कारीगर सुखराम ने कराया और इसके निकट ग्रीष्म ऋतु में शाही परिवार के रहने के लिए 'सुखमहल' नामक विश्रामगाह भी बनवाया, जिसमें विश्वविख्यात लेखक रुड्यार्ड किपलिंग अपने भारत प्रवास के दौरान ठहरे थे। 
    इसे बड़ा तालाब भी कहते हैं। यह झील 4455 हैक्टेयर भूमि में फैली है। 1995 तक यह झील ताजा पानी का स्रोत थी। मानसून और सर्दियों में यहां कमल खिलते हैं। यहां का सौंदर्य देखते ही बनता है। इस झील में लगे फव्वारे के चलने पर झील का झिलमिलाता पानी अत्यंत आकर्षक व मनोहारी लगता है।
    नवल सागर
    नवल सागर की चोकोर कृत्रिम झील किले से दिखाई जाती है। झील में कई छोटे टापू भी बने हुए है। इस झील में अना आयों के जल देवता रुण का मन्दिर है, जो लगभग आधा जलमग्न है। इस झील में शहर व उसके महलों का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है जो बूंदी को अलौकिक आकर्षण प्रदान करता है।

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