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Thursday, January 11, 2018

राजस्थान में लोक देवता Rajasthan ke lok Devta


  • मारवाड़ के पंच पीर- रामदेव जी, गोगा जी, पाबु जी,हरभू जी, मेहा जी
 गोगा जी - सांपों के देवता, जाहरपीर 
  • जन्म स्थान - वि. सं. 1003 गोगाजी का जन्म ददरेवा (चुरू) में।
  • चौहान वंशीय जेवरसिँह और बाछल इनके पिता-माता थे। केलमदे से विवाह हुआ
  • समाधि - गोगामेड़ी, नोहर तहसील (हनुमानगढ)
  • वे एक वीर योद्धा भी थे जिसकी महमूद गजनवी ने तारीफ में कहा फड़ यह तो 'जाहरपीर' अर्थात साक्षात् देवता है। किसान खेत में बुआई करने से पहले गोगाजी के नाम की राखी 'गोगा राखड़ी' हल और हाली, दोनों को बांधते है। गोगाजी की पूजा भाला लिए योद्धा के रूप में होती हैं।
  • प्रमुख स्थल:- शीर्षमेडी ( ददेरवा), धुरमेडी - (गोगामेडी- नोहर, हनुमानगढ़) में।
  • गोगामेंडी की बनावट मक़बरेनुमा है। गोगाजी की ओल्डी सांचोर (जालौर) में है। इनका मेला भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) को भरता है। इस मेले के साथ-साथ राज्य स्तरीय पशु मेला भी आयोजित होता है। यह पशु मेला राज्य का सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाला पशु मेला है
  • इनके थान खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते है, जहाँ सर्प की आकृति में पूजा होती है। गोरखनाथ जी इनके गुरू थे। घोडे़ का रंग नीला है।
  • गोगाजी हिन्दू तथा मुसलमान दोनों धर्मो में समान रूप से लोकप्रिय थे। धुरमेडी के मुख्य द्वार पर "बिस्मिल्लाह" अंकित है। इनके लोकगाथा गीतों में डेरू नामक वाद्य यंत्र बजाया जाता है।
 रामदेव जी-

  • रामदेव जी हिन्दू (कृष्ण के अवतार) तथा मुसलमान (रामसापीर) दोनों में ही समान रूप से लोकप्रिय है।

  • जन्म- उंडूकासमेर, शिव तहसील (बाड़मेर) में हुआ था। बाबा रामदेव जी का जन्म भाद्रशुक्ल दूज (बाबेरी बीज) को हुआ। रामदेव जी के पिता अजमल जी तवंर वंशीय राजपूत थे। माता का नाम मैणादे था। इनका विवाह अमरकोट के सोढ़ा राजपूत दलैसिंह की पुत्री नेतलदे से हुआ।

  • रामदेवजी एकमात्र लोक देवता थे, जो एक कवि भी थे। इनकी प्रमुख रचना " चौबीस बाणियां" कहलाती है। रामदेव जी का प्रतीक चिन्ह "पगल्ये" है। इनके लोकगाथा गीत ब्यावले कहलाते हैं। रामदेव जी का गीत सबसे लम्बा लोक गीत है। इनके मेघवाल भक्त "रिखिया " कहलाते हैं।
  • प्रमुख स्थल-
  • रामदेवरा (रूणीचा), पोकरण तहसील (जैसलमेर) रामदेवजी का मेला भाद्रपद शुक्ल दूज से भाद्र शुक्ल एकादशी तक भरता है। मेले का प्रमुख आकर्षण " तरहताली नृत्य" होता हैं। तेरहताली नृत्य कामड़ सम्प्रदाय की महिलाओं द्वारा किया जाता है। मांगी बाई (उदयपुर) तेरहताली नृत्य की प्रसिद्ध नृत्यागना है। तेरहताली नृत्य व्यावसासिक श्रेणी का नृत्य है। "बालनाथ" जी इनके गुरू थे। इनकी ध्वजा, नेजा कहताली हैं। नेजा सफेद या पांच रंगों का होता हैं। इनके घोडे़ का नाम लीला था। इनकी फड़ का वाचन मेघवाल जाति या कामड़ पंथ के लोग करते है।
  • सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़) व बिरांठिया (अजमेर) में और छोटा रामदेवरा गुजरात में भी इनके मंदिर है। इनके यात्री 'जातरू' कहलाते है। जातिगत छुआछूत व भेदभाव को मिटाने के लिए रामदेव जी ने "जम्मा जागरण" अभियान चलाया। इनके चमत्कारों को 'पर्चा' कहते है तथा भजनों को 'ब्यावले' कहलाते हैं।
  • डाली बाई रामदेवजी की भक्त थी और मेघवाल जाति की थी।

  • 3. हडबूजी
  • हडबू जी का जन्म भूण्डोल (नागौर) में हुआ वे मारवाड़ के राव जोधा के समकालीन थे। सांखला राजपूत परिवार से जुडे हुए थे। रामदेवी जी के मौसेरे भाई थे। बालीनाथजी से दीक्षा लेकर योगी बने। सांखला राजपूतों के आराध्य देव है।
  • इनका मंदिर बेंगटी ग्राम (फलोदी, जोधपुर) में मुख्य पूजा स्थल है। हडबू जी शकुन शास्त्र के ज्ञाता थे।इनकी गाड़ी की पूजा होती है।

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