Thursday, December 21, 2017

मुगल साम्राज्य

हुमायूं (1530-1556)

  • 30 दिसम्बर 1530 ई. को शासक बना।
  • कामरान को काबुल एवं कन्धार, अस्करी को सम्भल तथा हिन्दाल को अलवर की जागीर दी।
  • चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा को बदख्शां की जागरी दी।
  • प्रारम्भ में बाबर के प्रमुख मंत्री निजामुद्दीन अली खलीफा हुमायूं को अयोग्य समझकर बाबर के बहनोई मेहदी ख्वाजा को गद्दी पर बैठाना चाहता थ। किन्तु बाद में अपना जीवन खतरे में जानकर उसने हुमायूं का समर्थन कर दिया।
  • हुमायूं ने 1531 में कालिन्जर के शासक प्रताप रूद्र देव पर अपना पहला आक्रमण किया, किंतु असफल रहा।
  • हुमायूं के राजत्व काल में उसका अफगानों से पहला मुकाबला 1532 ई. में दोहरिया नामक स्थान पर हुआ। अफगानों का नेतृत्व महमूद लोदी ने किया परन्तु अफगानों की पराजय हुई।
  • 1532 में जब हुमायूं ने पहली बार चुनार का घेरा डाला उस समय यह किला अफगान नायक शेरखां के अधीन था।
  • शेरखां ने हुमायूं की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने लड़के कुतुबखां के साथ एक अफगान सैनिक टुकड़ी मुगलों की सेवा में भेज दी।
  • 1532 में बहादुर शाह ने रायसीन के महत्त्वपूर्ण किले को जीत लिया एवं 1535 ई. में मेवाड़ को सन्धि के लिए विवश किया।
  • बहादुरशाह ने टर्की के प्रसिद्ध तोपची रूमी खां की सहायता से एक अच्छा तोपखाना तैयार कर लिया था।
  • हुमायूं ने 1535-36 ई. में बहादुर शाह पर आक्रमण कर दिया। हुमायूं ने माण्डू और चम्पानेर के किलेें जीत लिय।
  • हुमायूं ने 1538 में चुनारगढ़ का दूसरा घेरा डाला। 15 अगस्त 1538 में गौड के स्थान पर जन्नताबाद नाम रखा।
  • 29 जून, 1539 में बक्सर के निकट चौसा का युद्ध हुआ। इस विजय के फलस्वरूप शेरखां ने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाने तथा सिक्का ढलवाने का आदेश दिया।
  • 17 मई 1540 ई. में कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में हुमायूं पुनः परास्त हो गया।
  • हुमायूं ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरु मीर अली की पुत्री हमीदाबानो बेगम से 19 अगस्त 1541 में विवाह किया।

  • हुमायूं द्वारा पुनः राज्य प्राप्ति

  • -15 मई 1555 ई. में मुगलों एवं अफगान सरदार नसीब खां एवं तातार खां के नेतृत्व में अफगानों में मच्छीवारा नामक स्थान पर युद्ध हुआ। फलस्वरूप सम्पूर्ण पंजाब पर मुगलों का अधिकार हो गया।

  • - 22 जून 1555 ई. को मुगल और अफगानों के बीच सरहिन्द नामक स्थान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में अफगान सेना का नेतृत्व सिकन्दर सूर तथा मुगल सेना का बैरम खां ने किया।
  • 23 जुलाई 1555 ई. को पुनः सिंहासनारूढ़ हुआ।
  • हुमायूं दिल्ली में दीन पनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सिढ़ियों से उतर रहा था, वह गिरकर मर गया।
  • हुमायूं को अबुल फजल ने इन्सान-ए-कामिल कहकर सम्बोधित किया।

अकबर (1556-1605 ई.)


  • जन्मः 15 अक्टूबर 1542 ई. में।
  • अकबर ने अपने बाल्यकाल में ही गजनी और लाहौर के सूबेदार के रूप में कार्य किया था।
  • हुमायूं की मृत्यु के अवसर पर अकबर पंजाब में सिकन्दर सूर से युद्ध कर रहा था।

अकबर का राज्याभिषेक बैरम खां की देखरेख में पंजाब के गुरूदासपुर ज़िले के कलालौर नामक स्थान पर 14 फरवरी 1556 ई. को मिर्जा अबुल कासिम ने किया था।
1556 से 1560 ई. तक अकबर बैरम खां के संरक्षण में रहा।
अकबर के लिए सर्वप्रथम संकट मुहम्मद आदिल शाह सूर ने उपस्थित किया था।
1556 ई. में अकबर ने बैरम खां को अपना वकील (वजीर) नियुक्त कर उसे खां-ए-खाना की उपाधि प्रदान की थी।
पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवम्बर, 1556) वास्तविक रूप से अकबर के वकील एवं संरक्षक बैरम खां और मोहम्मद आदिलशाह सूर के वजीर एवं सेनापति हेमू- जिसने दिल्ली पर अधिकार कर अपने को स्वतंत्र शासक घोषित कर विक्रमादित्य (14वां) की उपाधि धारण की थी, के बीच हुआ था।
बैरम खां व अकबर के बीच युद्ध तिलवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था जिसमें बैरम खां की पराजय हुई।अकबर के शासन काल में (1560-1562ई.) के समय को उसकी धाय मां माहम अनगा, उसके पुत्र आधम खां और पुत्री जीजी अनगा, मुल्लामीर मुहम्मद, साहाबुद्दीन द्वारा शासन कार्य में सर्वेसर्वा होने के कारण इतिहासकारों ने ‘पर्दाशासन - पेटी कोट सरकार’ संज्ञा दी। जब आधम खां ने अकबर के प्रधानमंत्री शम्सुद्दीन आतग खां की हत्या कर दी तब अकबर ने आधम खां को अपने महल से नीचे फेंक दिया और इस तरह पर्दा शासन का अन्त हो गया।


बैरम खां


पानीपत के द्वितीय युद्ध के बाद उसका शासन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया। अपने चार वर्षों के नियंत्रण के बाद उसके पतन में मुख्य योगदान ‘अतका खेल’ का था।


अकबर ने बैरम खां के सामने तीन प्रस्ताव रखे -


राज दरबार में सम्राट के गुप्त मामलों का सलाहकार

काल्पी एवं चन्देरी की सूबेदारी

मक्का की तीर्थ यात्रा


बैरम खां ने तीर्थ यात्रा पर जाने का निश्चय किया जाते समय पाटन नामक स्थान पर मुबारक खां नामक एक अफगान युवक ने उसकी हत्या कर दी। अकबर ने बैरम खां की विधवा सलीमा बेगम से निकाह कर लिया और चार वर्षीय पुत्र अब्दुल रहीम को संरक्षण प्रदान किया। 1584 में अकबर ने उसे खानाखाना की उपाधि प्रदान की।

बैरम खां के पतन के बाद राज परिवार के सदस्यों का ही शासन पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण हो गया इसलिए इसे पर्दा शासन कहा जाता है।


- अकबर ने 1562 ई. में दास प्रथा, 1563 ई. में तीर्थ यात्राकर तथा 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया था।


साम्राज्य विस्तार


- सबसे पहला आक्रमण 1561 ई. में मालवा के शासक बाज बहादुर के ऊपर किया।

बाज बहादुर और रूपमती की समाधि उज्जैन में हैं।

- 1561 ई. में ही अकबर ने चुनार का किला भी जीता था।

- 1564 ई. में अकबर ने गोण्डवाना के गढ़कटंगा राज्य को जीता जिसकी राजधानी जबलपुर के पास स्थित चौरागढ़ थ्ी और इसकी शासिका महोबा की चंदेल राजकुमारी दुर्गावती थी। गढ़कटंगा राज्य की स्थापना ‘अमनदास’ ने की।

वीर नारायण गोंडवाना शासक

- मेवाड़ 1568 ई. में आक्रमण , अकबर स्वयं गया।

- 1572 ई. में अकबर द्वारा गुजरात पर आक्रमण किया जिसका कारण- इसकी समृद्धि एवं विश्व व्यापार का प्रमुखतम केन्द्र स्थल होना था।

- स्मिथ महोदय ने 1573 ई. में गुजरात के द्वितीय अभियान को ‘ऐतिहासिक द्रुतगामी आक्रमण’ कहा है। इस उपलक्ष में राजधानी फेतहपुर सीकरी में एक बुलन्द दरवाजा बनवाया।

- 1576 ई. में अकबर ने दाऊद खां को पराजित कर उत्तर भारत से अन्तिम अफगान शासन का अन्त कर दिया।

टकबर ने 1581 ई. में काबुल पर अधिकार करके अपनी सौतेली बहन एवं काबुल के शासक हाकिम मिर्जा की बहन बख्तुन्निसा को काबुल का गर्वनर बना दिया।

कन्धार प्रान्त भी सर्वप्रथम अकबर के समय 1595 ई. में मुगल आधिपत्य में आया था।


दक्षिण विजय


अकबर ने दक्षिण के राज्यों खानदेश, अहमदनगर एवं असीरगढ़ को जीता था।

 खानदेश दक्षिण का प्रवेशद्वार कहलाता था।

अकबर ने 1600 ई. में अहमदनगर पर अधिकार कर लिया। अकबर ने अहमदनगर के बहादुरशाह (चांदबीबी संरक्षिका) से सन्धि के फलस्वरूप बरार का प्रदेश तथा बहुत सी भेंट प्राप्त की। इसी युद्ध के दौरान मुगल सर्वप्रथम मराठों के सम्पर्क में आये।

1601 ई. में अकबर ने अपने अन्तिम आक्रमण में असीरगढ़ के किले को जीता, कहा जाता है कि अकबर ने असीरगढ़ का किला ‘सोने की कुंजियों’ से खोला था।


विद्रोह


1564 में उजबेकों ने विद्रोह कर दिया।

1586 में अफगान बलूचियों ने विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह के दौरान बीरबल की मृत्यु हुई थी।

1599 में शाहजादा सलीम ने पुर्तगालियों के साथ षड्यंत्र कर विद्रोह कर दिया तथा इलाहाबाद में अपने को स्वतंत्र बादशाह घोषित कर दिया।

सलीम के ही इशारे पर ओरछा के बुन्देला सरदार वीरसिंह देव ने अबुल फजल की हत्या कर दी।

25 अक्टूबर 1605 ई. में पेचिश से अकबर की मृत्यु हो गई।

अकबर ने गुजरात को जीतने के बाद राजा टोडरमल को लगान व्यवस्था का उत्तरदायित्व सौंप दिया।

1576 ई. में हल्दीघाटी के युद्ध में अफगान सरदार हाकिम खां राणा प्रताप की ओर से लड़ा था।

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा ने ‘चांवड’ को अपनी राजधानी बनाया तथा अकबर के खिलाफ ‘गुरिल्ला युद्ध’ जारी रखा।


अकबर की धार्मिक नीति


फतेहपुर सीकरी में ‘इबादतखाना’ (प्रार्थना-भवन) की स्थापना 1575 ई. में करवाया।

1578 ई. में सभी धर्मों के विद्वानों को आमन्त्रित करने लगा अर्थात् धर्म संसद बना दिया।

अकबर समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए 1579 ई. में ‘महजरनामा’ या एक घोषणा जारी करवाया।

महजर को स्मिथ और बूल्जले हेग ने अचूक आज्ञापत्र कहा।

महजर जारी होने के बाद अकबर ने ‘सुल्तान-ए-आदिल’ या इमाम-ए-आदिल (न्यायप्रिय शासक) की उपाधि धारण की। इस दस्तावेज में उसे ‘अमीर-उल-मोमनीन’ कहा गया।

महजर का प्रारूप शेख मुबारक ने तैयार किया था। प्रेरणा मुबारक एवं उसके दोनों पुत्रों अबुल फजल व फैजी द्वारा दी गई थी।

1582 ई. में ‘दीन-ए-इलाही’ या तौहीद-ए-इलाही (दैवी एकेश्वरवाद’ नामक नया धर्म प्रवर्तित किया।

दीन-ए-इलाही का प्रधान पुरोहित अबुल फजल था। हिन्दुओं में केवल महेशदास (बीरबल) ने ही इसे स्वीकार किया।

दीन-ए-इलाही धर्म में दीक्षित शिष्य को चार चरणों अर्थात् चहारगाना-ए-इख्लास को पूरा करना होता था। ये चार चरण थे- जमीन, सम्पत्ति, सम्मान, धर्म 1583 में नया कैलेन्डर इलाही संवत् को जारी किया।

सूफी सर्वेश्वरवाद से सम्बन्धित दो क्लासिकी ग्रंथ - जलालुद्दीन रूमी की ‘मसनवी’ तथा हाफिज का ‘दीवान’ अकबर की दो मनपसन्द पुस्तकें थी।

1583 ई. से पहले अकबर की मुद्राओं पर ‘कलमा’ और खलीफाओं का विवरण अंकित होता था किन्तु 1583 ई. के बाद उन पर सूर्य और चन्द्रमा की महिमा का बखान करने वाले पद्य अंकित किया जाने लगा।

इबादतखाने में आमंत्रित धर्माचार्य

हिन्दू धर्म - देवी एवं पुरूषोत्तम

जैन धर्म - हरिविजय सूरी ‘जगत्गुरू’, जिनचन्द्र सूरि ‘युग प्रधान’ विजयसेन सूरि ‘काला सरस्वती’ तथा शान्ति चन्द्र इत्यादि।

पारसी - दस्तूर मेहरजी राणा

ईसाई - एकाबीवा और मोंसेरात


अकबर ने वल्लभाचार्य के पुत्र बिट्ठलनाथ को ‘गोकुल एवं जैतपुरा’ की जागीर दी थी।


अकबर ने ‘झरोखा दर्शन, तुलादान तथा पायबोस’ जैसी पारसी परम्पराओं (दरबार में अग्निको आरम्भ की।

अकबर ने सिक्खों के तीसरे गुरू अमरदास से भेंट की तथा उसकी पुत्री के नाम कई गांव प्रदान किये।

अकबर ने सिखगुरु रामदास को 500 बीघा जमीन 1577 ई. में प्रदान की। जिसमें एक प्राकृतिक तालाब भी था। यही कालान्तर में अमृतसर नगर बसा और स्वर्ण मंदिर का निर्माण किया।

फतेहपुर सीकरी निर्माण का खाका बहाउद्दीन ने तैयार किया। अकबर के दरबार में ईसाइयों का जेस्सुइट मिशन तीन बार आया था -

1580 में फतेहपुर में फादर एकाबीवा

अकबर ने सतीप्रथा को रोकने का प्रयास किया, विधवा विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की। शराब की बिक्री पर रोक लगाया तथा लड़के-लड़की का विवाह 16 और 14 वर्ष निर्धारित की।


जहांगीर 1605-1627 ई.


जन्मः 30 अगस्त, 1569 ई.

शिक्षक अब्दुर्रहीम खानखाना थे।

3 नवम्बर 1605 ई. को आगरा किले में राज्याभिषेक हुआ। जहांगीर की 12 घोषणाओं को ‘आइने-जहांगीरी’ कहा जाता है। जहांगीर की बारह घोषणाओं में एक ‘ऐम्मा’ भूमि का प्रमाणीकरण था। जो ‘वाक्याते-जहांगीरी’ में प्रार्थना एवं प्रशंसा के लिए दी गई भूमि के रूप में वर्णित है।

जहांगीर को गद्दी पर बैठते ही सर्वप्रथम 1606 ई. में खुसरो का विद्रोह का सामना करना पड़ा था।

खुसरो को सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव का आशीर्वाद प्राप्त था। इसके अतिरिक्त उसे मानसिंह तथा खाने आजम (अजीज कोका) का परोक्ष रूप से समर्थन था।

गुरु अर्जुन देव की समाधि लाहौर दुर्ग के ठीक बाहर स्थित है।

खुसरो और जहांगीर के बीच युद्ध जालन्धर के निकट भेरावल नामक स्थान पर हुआ। 1622 ई. में शाहजहां ने हत्या करवा दी।


साम्राज्य विस्तार

1605 में मेवाड़ पर आक्रमण के लिए शाहजादा परवेज को भेजा
1608 में महावत खां को
1609 में अब्दुल्ला खां को
1613 में खुर्रम को भेजा। फलस्वरूप 1615 ई. में राणा अमरसिंह एवं मुगलों के बीच संधि हुई।

दक्षिण विजय -


  • मलिक अम्बर एक अबीसीनियाई दास था। जिसे कासिम ख्वाजा नामक व्यक्ति ने बगदाद से खरीदा था और बाद में अहमदनगर के शासक मुर्तजा निजामशाह के योग्य मंत्री मीरक दबीर के हाथों बेच दिया था।
  • 1617 ई. में खुर्रम को अहमदनगर अभियान पर भेजा और स्वयं माण्डू पहुंच गया। किन्तु बीजापुर के शासक की मध्यस्थता के कारण अहमदनगर और मुगलों में सन्धि हो गई।
  • जहांगीर ने सन्धि के फलस्वरूप खुर्रम को ‘शाहजहां’ की उपाधि दी तथा बीजापुर के शासक को ‘फर्जन्द’ (पुत्र) की उपाधि दी।
  • मलिक अम्बर ने टोडरमल की भू-राजस्व प्रणाली को अपनाया, भूमि की नाप करवायी तथा पैदावार का 1/3 भाग लगान के रूप में वसूल किया।
  • दक्षिण भारत में लूटमार वाली लड़ाई केा वर्गी-गिरी’ कहा
  • मलिक अम्बर ने अबीसिनिया के अरबों और जंजीरा के सीदियों की सहायता से एक शक्तिशाली नौ-सेना का स्थापना की। 1620 ई. में कांगड़ा के दुर्ग पर अधिकार किया।
  • जहांगीर के शासनकाल में 1622 में फारस के शाह ने कन्धार को मुगलों से छीन लिया। 1623 ई. में शाहजहां के विद्रोह को दबाने का मुख्य श्रेय ‘महावत खां’ को था।
  • 28 अक्टूबर 1627 को जहांगीर की मृत्यु हो गई। लाहौर के निकट शहादरा नामक स्थान पर रावी नदी के किनारे दफनाया गया।

धार्मिक नीति

  • 1612 ई. में पहली बार रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया दीवाली के दिन जुआ खेलने की अनुमति
  • श्रीकांत को हिन्दू जज नियुक्त किया।


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