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Saturday, December 23, 2017

राष्ट्र संघ

लीग ऑफ नेशन्स


  • पेरिस शांति सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन शांति की स्थापना के लिए 14 सूत्रीय सिद्धांत प्रस्तुत किये। उनके प्रयासों से ‘लीग ऑफ नेशन्स’ नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना हुई। 

  • पेरिस शांति सम्मेलन की सहमति के आधार पर 10 जनवरी, 1920 को जिनेवा में लीग ऑफ नेशन्स की स्थापना की गई। आरम्भ में इसमें 42 राष्ट्र थे किन्तु धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 60 हो गयी।

‘लीग ऑफ नेशन्स’ के निम्नलिखित उद्देश्य थे-


1. अन्तर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा व सद्भावना के लिए सकारात्मक प्रयास करना।

2. भावी युद्धों को रोकने के लिए विश्व स्तर पर सैनिक कार्रवाई का मुखर विरोध करना।

3. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन देना।

4. विभिन्न राष्ट्रों के परस्पर विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना।

5. विश्व में निःशस्त्रीकरण के लिए प्रयास करना।

6. विश्व में मजदूरों की दशा सुधारने का सकारात्मक प्रयास करना।

7. दास-व्यापार को समूल समाप्त करना।

8. जनकल्याणकारी कार्य को करना, स्त्रियों एवं बच्चों के क्रय-विक्रय पर रोक तथा जनसामान्य की दशा में सुधार करने का प्रयास करना।

लीग ऑफ नेशन्स की असफलताएं-



  • ‘लीग ऑफ नेशन्स’ लगभग दो दशक तक अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति में सकारात्मक सहयोगी रहा किन्तु संसार के शक्तिशाली देशों की स्वार्थप्रियता व अनुचित हस्तक्षेप के कारण 1931 ई. में जापान को मंचूरिया पर, 1936 ई. में इटली को एबीसिनिया पर, 1938-39 ई. में जर्मनी (हिटलर) को ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया तथा मेमल पर अधिकार कर लेने से रोक न सका और अन्त में 1 सितम्बर, 1939 ई. को हिटलर द्वारा पोलैण्ड पर आक्रमण कर देने के परिणामस्वरूप ‘लीग ऑफ नेशन्स’ का सिद्धांततः अन्त हो गया।

लीग ऑफ नेशन्स की असफलता के कारण


  • प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति स्थापना के लिए जिस संगठन की परिकल्पना की गयी, वह यथार्थ में ‘लीग ऑफ नेशन्स’ के रूप में अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा। इसकी असफलता के निम्नलिखित कारण थे-

1. विश्व का प्रभावशाली राष्ट्र एवं इस संगठन का जन्मदाता अमेरिका इसका सदस्य नहीं बन सका।

2. लीग ऑफ नेशन्स के सदस्य देशों ने इसके उद्देश्यों के आधार पर कार्य न करके अपने स्वार्थों को ही ध्यान में रखा।

3. लीग के पास सैनिक संगठन का अभाव था। सैनिक शक्ति के अभाव में यह संस्था सफन न हो सकी।

4. इनका संगठनात्मक ढांचा दोषपूर्ण था। आरम्भ में जर्मनी और रूस जैसे महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों को इसकी सदस्यता से दूर रखा गया। इंग्लैण्ड और फ्रांस इसके शक्तिशाली सदस्य थे और ये दोनों हमेशा अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते थे।

5. इस संगठन के पास कोई प्रभावी निषेधात्मक शक्ति नहीं थी और न ही कोइ्र अपनी सेना, फलतः यह अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा।

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