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Sunday, November 26, 2017

‘धन के निष्कासन’ सिद्धांत की व्याख्या कीजिये? Expulsion of money


19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रादुर्भूत इस प्रक्रिया का अर्थ था, भारत से सम्पत्ति का ब्रिटेन में भेजना, जो राष्ट्रीय धन का एक हिस्सा था। दूसरे शब्दों में, कुल वार्षिक उत्पादन ब्रिटेन को निर्यात किया जा रहा था, जिसके बदले में भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं प्राप्त हो रहा था। दादाभाई नौरोजी द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत के अनुसार, भारत की अत्यधिक निर्धनता इंग्लैण्ड में भारतीय सम्पत्ति के पलायन का परिणाम थी।

अंग्रेजों द्वारा भारत के शोषण के तीन चरणों - वाणिज्यिक (1757-1813), औद्योगिक एवं पूंजीवादी शोषण (1813-1858) तथा वित्तीय साम्राज्यवाद (1858 के बाद) ने भारत को एक कृषि उपनिवेश में परिणत कर दिया। अब बंगाल में सैन्य विजय से प्राप्त लाभांश को बंगाल से ही माल खरीदकर निर्यात किया जाने लगा था।

भारतीय निर्यात के भावी खरीददार भारत सचिव से काउंसिल बिल खरीदते थे, जिसके बदले पाउंड दिया जाता था। फिर इन बिल को भारत सरकार के राजस्व की राशि से रुपयों में बदल दिया जाता था और यह रुपया निर्यात के लिए भारतीय माल खरीदने के काम आता था। इस प्रकार भारत में रहने वाले अंग्रेज अधिकारी और व्यापारी रुपयों में मिलने वाले अपने लाभांशों के बदले पाउंड बिल खरीदते थे। यह कारोबार अंग्रेजों के स्वामित्व वाले विनिमय बैंकों द्वारा किया जाता था। इस प्रकार घरेलू मदों तथा भेजने के लिए निजी धन दोनों की व्यवस्था भारतीय निर्यात द्वारा होती थी तथा धन सम्पत्ति का दोहन होता था।

राष्ट्रवादियों के अनुसार निकासी का अभिप्राय भारत से आयातों की अपेक्षा निर्यातों की अधिकता अथवा निर्यातों का एकतरफा होना था। 1857 में नौरोजी द्वारा संगणित निकासी की संगठित राशि 80 लाख पाउंड थी।
भारत से धन की निकासी के तीन प्रमुख स्रोत थे। सर्वप्रथम, असैनिक सेवा, सेना तथा रेलवे में नियुक्त ब्रिटिश कर्मचारियों, ब्रिटिश वकीलों तथा डॉक्टरों आदि द्वारा अपनी बचतों, आय तथा वेतन के एक बड़े भाग इंग्लैण्ड में भेजना था। निकासी का दूसरा स्रोत गृह प्रभार था, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश भारतीय अधिकारियों एवं सैन्य अधिकारियों की पेंशन, इंग्लैण्ड में खरीदी जाने वाली सैन्य एवं अन्य सामग्रीख् सैन्य प्रशिक्षण, परिवहन एवं भारत से बाहर होने वाले अभियानों का व्यय, रेलमार्गों का प्रत्याभूत ब्याज आदि शामिल थे। तीसरा और अंतिम प्रमुख स्रोत भारत में व्यापार और उद्योग में निवेशित निजी विदेशी पूंजी पर होने वाले लाभ थे।

इस प्रकार धन का निष्कासन ने भारत के अंदर पूंजी के संग्रह में बाधा पहुंचाकर, आंतरिक पूंजी को पंगु बना दिया तथा स्वदेशी प्रतियोगिता की संभावना को समाप्त कर विदेशी पूंजीपतियों को भारत में आकर एकाधिकार जमाने तथा संसाधनों का स्वेच्छापूर्वक दोहन करने की सुविधा प्रदान की। वस्तुतः यह देश में निवेशित विदेशी पूंजी के संग्रह का एक प्रधान स्रोत था।

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