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Tuesday, November 7, 2017

स्वीकारते सब हैं ... बदलाव कोई नहीं चाहता


जब शहर के चौराहे पर एक बुजुर्ग खड़ा होता है तो वह खुद को मानव की बस्ती का संस्कारवान व्यक्ति नहीं मानता है, क्योंकि उस चौराहे से वह हर व्यक्ति को सिर्फ भागते देखता है। वह वह सब कुछ देखता है जिन्हें हम कभी पीछे छोड़ आये थे। किंतु आज पहले से ज्यादा मजबूती से वे कुरीतियां उठ खड़ी हुई है। इन कुरीतियों को वह नये रूप में देख रहा था और अफसोस कर रहा था। 
दो जुवां दिलों को वह मिलते देख रहा था तो कुछ पल बाद ही एक दूसरे पर आरोपों की बरसात करते भी देखा। उसने उम्र के इस पड़ाव पर आते-आते प्यार करने वालों को बहकते देखा है। वह कहता है जो प्यार करता है वही प्यार को दोष देता है और जो प्यार नहीं करता या सफल नहीं हुआ वह समाज को दोष देता है।
क्या उम्र थी उन दोनों की उस चौराहे पर उस व्यक्ति के सामने प्यार की बातें कर रहें थे। उस बुजुर्ग को उस चौराहे से सब कुछ साफ नजर आ रहा था वह लड़का कैसा है और वो लड़की कैसी है। कुछ उम्र में परिपक्व थे तो कुछ फिल्मों की दुनिया को हकीकत मान नया अध्याय लिखने को उतावले थे। उस सूरज के उजाले में वह बुजुर्ग खोती संस्कृति को कोसने के सिवाय और कुछ न कर सका। 
माना वह रूढ़िवादी हो सकता है किंतु उसके बुदबुदाने में कोई सच भी छुपा था जो सिर्फ उसे नजर आ रहा था। लोग उसके बड़बड़ाने पर ठहाके लगा रहे थे। कुछ मौन होकर उसके बहकने को समझ रहे थे। सभ्यता खोने का दर्द किसे नहीं होता यदि स्वप्नों का एक भवन बनाकर फिर यदि उसे चोट पहुंचाये तो क्या उसका मालिक विरोध नहीं करेगा। 
सच है वे अभी नादान थे उस व्यक्ति की निगाहों में ही नहीं अन्य कई लोगों की निगाहों में पर कौन विरोध करता उनके पहनावे उनके बात करने के लहजे सब कुछ काम को रिझाने की कोशिश मात्र था। शायद यह मोबाइल की करामात थी कि वे पहले से ही से प्यार की अंधी वासनाओं में बह रहे थे। बस उन्हें तो एक आश्रय चाहिए था जो उनकी अंधे प्यार की वासनाओं को शांत कर सके। यह सब वह बुजुर्ग व्यक्ति पहले ही भांप गया था क्योंकि उनकी बातें बड़ों जैसी थी कामुक और नशीली। सच मैं भी बहक गया था पर कुछ संस्कार थे जिन्दा, जिन्होंने मुझे बांधे रखे। पर आज का युवा इन सब बातों को इग्नोर कर बेखौफ होकर दौड़ रहे हैं। 
उसने एक व्यक्ति से प्रश्न किया सरकार ने बालविवाह पर रोक लगाकर तो अच्छा किया पर अपराध पर इस एकांगी प्रयास से अपराध को बढ़ावा मिला है। वह व्यक्ति जब उस बुजुर्ग के प्रश्न से संतुष्ट नहीं हुआ तो उसने पूछा कि बालविवाह पर रोक से अपराध का क्या सम्बन्ध है अंकलजी। बेटा सम्बन्ध है जब मैं उस गली से पैदल गुजरा तो कुछ भवरें कलियों पर मंडरा रहे थे। अभी उनका यौवन उभर रहा था कि कुछ अवारा भवरें अपनी मनमानी पर उतर आये। कुछ ने इशारें में ही हामी भर दी तो कुछ नियत में खोट कह कर चली गई। इन भवरों-कलियों का क्या जो सरेआम प्यार का इजहार तो करते हैं। फिर अपराध भी यही से शुरू होते हैं। अरे भई लड़की सोलह साल की अपने पूर्ण यौवन में आ जाती है। यदि ऐसे समय में विवाह न करें तो वह क्या करेगी। 
ये मेरी ओर तर्क नहीं है मैं तो इस गली के लोगों के विचार भी सुनते आया हूं वे भी बड़े परेशान हैं आधुनिकता के लहजे से खुद को ठगा महसूस करते हैं। पर कहे किससे कितनों को अपराध करते देखा है। अरे ये तो जानवरों की संस्कृति हो गई आज तेरे संग कल किसी ओर के संग। अजी देख लिया तो आमने-सामने होकर मारकाट करते हैं और यदि मालूम नहीं तो हमारा प्यार एक-दूजे के लिए अमर। यहां दोषी कोई भी हो सकता है लड़का या लड़की। किस्से दोनों के ही सुने हैं। दोष किसे दे साब जब लड़के की कहानी सुनते हैं तो लड़का सही नज़र आता है और जब लड़की की कहानी सुनते हैं तो लड़की सयानी नज़र आती है। ये प्यार का बाज़ार है। हमें पता नहीं कौन सही कौन गलत है। पर वे दोनों कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं करेंगे। बस यहीं से अपराध प्रारम्भ होता है और प्यार करने वालों के लिए जंजीरें यहीं से बंधना प्रारम्भ हो जाती है।
उस बुजुर्ग की बातों को मैंने कई बार हकीकत होते देखा है। उन गलियों में दोपहर को ऐसा जवां दिल एकांत की तलाश में भटकते देखें हैं। छात्र जीवन में अधिकतर युवा सिर्फ अपनी हवस को शांत करने के लिए आक्रमक व्यवहार अपनाते हैं और अपराध का बढ़ाने में खुद को शामिल कर अपने आप को बढ़ ही ताकतवर समझते हैं।
उस बुजुर्ग की बातों को स्वीकारते सब हैं पर उस पर अमल करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। .......

स्वीकरते सब हैं पर
ऐसा साहस कहां
विरोध करें उनका
न हस्ती है उनकी
न बस्ती है उनकी
वे बुनियाद हैं अपराध की
उसमें अपना स्वार्थ है छुपा
बस यहीं एक ख्वाहिश है जीवन की


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