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Sunday, November 26, 2017

मुद्रा

मुद्रा का विकास

आखेट युग में मुद्रा-


  • मनुष्य की आवश्यकता भोजन तक सीमित
  • अतः मनुष्य जंगली पशुओं का शिकार कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति किया करते थे।
  • खाले, चमड़ा ही मुद्रा के रूप में प्रयोग।

पशुपालन के युग में मुद्रा-


  • पशु विनिमय का माध्यम बना।

कृषि युग में मुद्रा-

  • वस्तुएं विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग।
  • यूरोप में बादाम, स्विटजरलैण्ड में अण्ड़े, मैक्सिको में नमक, मेरीलैण्ड में मक्का, सुमात्रा में नमक आदि वस्तुएं विनिमय का माध्यम रही।

औद्योगिक युग में मुद्रा-

  • धातुओं का मुद्रा के रूप में चलन
  • जपान में लौहे की, रोम में तांबे की , यूनान में सीसे की मुद्रा, मैक्सिको में रांगा की मुद्राएं प्रयोग।
  • विश्व के प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में सोने, चांदी की मुद्राओं का वर्णन मिलता है, जिनमें निष्क, शतमान, हिरण्यपिण्ड प्रमुख थी।

आधुनिक युग में पत्र एवं साख मुद्रा-

  • वर्तमान युग में मुद्रा तथा साख मुद्रा का प्रचलन।

आरम्भिक अवस्था में पत्र मुद्रा प्रतिनिधि पत्र

  • मुद्रा के रूप में चलन में रही, जिसका निर्गमन विभिन्न बैंकों के माध्यम से होता था।
  • परन्तु मुद्रा की असीमित पूर्ति के भय से अब यह कार्य केन्द्रीय बैंक सरकार के माध्यम से करती है।
  • विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों में पत्र मुद्रा का स्थान अब साख मुद्रा (चैक, हुण्डी, ड्राफ्ट) ने ले लिया है।


पढ़ें निम्न उपयोगी पोस्ट -

National Income/ GDP


मुद्रा की परिभाषा

  • अंग्रेजी भाषा का शब्द Money लैटिन भाषा के शब्द मोनेटा Moneta से बना।
  • पहली टकसाल रोम में देवी जूनो के मन्दिर में खुली थी। इसे मोनेटा नाम से पुकारते।
  • रोमन सिक्के मोनेटा देवी का शीश, दूसरी ओर मोनेटा नाम अंकित होता था।
  • लैटिन भाषा में मुद्रा शब्द के लिए पेक्यूनिया शब्द, जो पैकस शब्द से बना जिसका अर्थ पशुधन होता है।
  • राबर्टसन - ऐसी वस्तु जो वस्तुओं के लिए भुगतान में स्वीकार की जाए व अन्य प्रकार के व्यावसायिक लेन-देनों के निपटारे में प्रयुक्त हो।
  • मुद्रा वह हैं जो मुद्रा का कार्य करें।
  • प्रो. जे.बी. से ‘मुद्रा सर्वमान्य पदार्थ होती है।’
  • प्रो. एली ‘कोई भी वह वस्तु जो राज्य द्वारा मुद्रा घोषित कर दी जाती है, मुद्रा कहलाती है।’
  • सर्वमान्य- मुद्रा वह पदार्थ है जिसे जनसामान्य द्वारा लेन-देन के रूप में स्वीकार किया जाता है तथा जिसे सरकारी मान्यता प्राप्त होती है।
मुद्रा के कार्य -
  • मुद्रा की प्रकृति के अनुसार मुद्रा के चार कार्य निर्धारित किये जा सकते हैं।
  • जिसमें विनिमय का माध्यम, मूल्य का मापन, संचय का साधन तथा स्थगित भुगतानों का आधार प्रमुख है।

अ. प्रमुख कार्य अथवा प्राथमिक कार्य-

विनिमय का साधन

  • वस्तु विनिमय प्रणाली के दोहरे संयोग के अभाव की कठिनाई को दूर करके विनिमय प्रणाली को सरल तथा सुगम बनाया है।

मूल्य का मापन

ब. सहायक अथवा गौण कार्य-

  • भावी भुगतान का आधार
  • स्ंचय का साधन 
  • क्रय शक्ति का हस्तान्तरण

आकस्मिक कार्य-

  • साख मुद्रा का आधार - चैक, हुण्डी

सामाजिक आय का वितरण- 

  • उत्पादन में उत्पत्ति के साधनों श्रम, पूंजी, भूमि, साहस आदि को उसकी सीमान्त उत्पादकता के अनुसार प्रतिफल मिलना चाहिए।

सम्पत्ति की तरलता-

द. अन्य कार्य-

  • निर्णय का वाहक -
  • मुद्रा में संग्रह शक्ति एवं सर्वग्राह्यता गुण है।
  • इस कारण मनुष्य इसको संचित कर अपनी आवश्यकतानुसार एवं इच्छानुसार व्यय करके न केवल वस्तुओं को खरीद सकता है बल्कि लाभ का स्तर बढ़ा सकता है।

मुद्रा का महत्व- 

दो दृष्टिकोण

परम्परावादी दृष्टिकोण

  • अर्थशास्त्री: एड़म स्मिथ, जॉन स्टुअर्ट मिल
  • ये मानते हैं कि मुद्रा महत्त्वहीन है, अनुत्पादक है। यह विनिमय की एक नई पद्धति मात्र है।

आधुनिक दृष्टिकोण

  • मुद्रा अर्थव्यवस्था की समस्त सामाजिक, आर्थिक क्रियाओं का नियमन करती है।
  • मार्शल -‘मुद्रा वह धुरी है, जिस पर अर्थ विज्ञान चक्कर लगाता है।’
  • प्रो. रॉबर्टसन -‘मुद्रा एक सामाजिक बुराई है यह समस्त बुराइयों की जड़ है।
  • मुद्रा मानव के लिए वरदानों का स्रोत है परन्तु अनियंत्रण की स्थिति में यह अभिशाप है।

मुद्रा के गुण/महत्व-

आर्थिक क्षेत्र में

  • उपभोग के क्षेत्र में
  • उत्पादन के 
  • विनिमय 
  • श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण 
  • मुद्रा पूंजी की गतिशीलता में वृद्धि करती है।
  • अर्थशास्त्र की धुरी 
  • राजस्व 

सामाजिक क्षेत्र में 

  • सामाजिक स्वतंत्रता में वृद्धि
  • सामाजिक प्रतिष्ठादायक
  • सामाजिक कल्याण का मापक 
  • राष्ट्रीय एकता
  • राजनैतिक एकता
  • अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में
मुद्रा के दोष अथवा सीमाएं
  • रॉबर्टसन - ‘मुद्रा एक अच्छा सेवक है किन्तु बुरा स्वामी है।’
मुद्रा के आर्थिक दोष 
  • आर्थिक जीवन में अनिश्चितता 
  • साधनों का केन्द्रीयकरण, असमानता
  • ऋणी अर्थव्यवस्था 
  • शोषण में वृद्धि
  • धन संग्रह का उचित माध्यम नहीं

सामाजिक दोष 

  • सामाजिक वर्ग भेद
  • चारित्रिक एवं नैतिक पतन
  • भौतिकवाद तथा द्वेषी प्रवृत्ति
  • प्रतिष्ठा का आधार मुद्रा न कि ज्ञान

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