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Saturday, October 7, 2017

पृथ्वी की गतियां

कॉपरनिकस ने पृथ्वी का आकार गेंद के समान तथा न्यूटन ने नारंगी के समान बताया।
पृथ्वी का अपना विशिष्ट आकार है जिसे पृथ्व्याकार (Geoid जियॉड) कहा जाता है।
पृथ्वी की आकृति लध्वक्ष गोलार्द्ध Oblate है।
पृथ्वी का ध्रुवीय व्यास 12714 किमी और विषुवतीय व्यास 12757 किमी है
इन दोनों का अन्तर 43 किमी है।
पृथ्वी की विषुवतीय परिधि 40075 किमी और ध्रुवीय परिधि 40008 किमी है।

पृथ्वी की दो गतियां होती है- 

अ. घूर्णन/परिभ्रमण 
ब. परिक्रमण

घूर्णन गति Rotation -


  • पृथ्वी अपने अक्ष पर (धुरी Axis) पश्चिम से पूर्व की ओर 1610 किमी/ घण्टे की गति से 23 घण्टे 56 मिनट 5 सैकेण्ड में एक चक्कर लगाती है।

घूर्णन गति के प्रभाव


  • दिन व रात का बनना
  • ज्वार-भाटा की उत्पत्ति



परिक्रमण गति Rovolution -


  • पृथ्वी 107160 किमी/घण्टे की गति से सूर्य के चारो ओर एक चक्कर 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट व 46 सैकेण्ड में पूरा करती है।

प्रभाव


  • दिन रात की लम्बाई में परिवर्तन
  • ऋतु परिवर्तन
  • पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° झुकी हुई है।
  • पृथ्वी अपने कक्ष के साथ 66.5 डिग्री का कोण बनाती है।
  • पृथ्वी के इस झुकाव के कारण पृथ्वी के संदर्भ में सूर्य की स्थिति में परिवर्तन देखा जाता है।

अक्षांश और देशान्तर





अक्षांश रेखाएं-


  • ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खिंची गई काल्पनिक रेखाएं
  • 66.5 डिग्री उत्तरी अक्षांश - आर्कटिक वृत्त
  • 66.5 दक्षिणी अक्षांश - अंटार्कटिक वृत्त
  • कुल अक्षांश - 181
  • कुल अक्षांश रेखाएं - 179
  • दो अक्षांशों के मध्य की दूरी - 111 किमी
  • दो अक्षांशों के मध्य का क्षेत्र कटिबन्ध कहलाता है।
  • विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं की लम्बाई कम होती जाती है।



देशान्तर रेखाएं-

  • ग्लोब पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई काल्पनिक रेखाएं
  • कुल देशान्तर रेखाएं- 360
  • दो देशान्तरों के मध्य का क्षेत्र गोरे कहलाता है।
  • ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर जाने पर दो देशान्तरों के मध्य की दूरी बढ़ती जाती है।
  • यह दूरी विषुवत रेखा पर सर्वाधिक होती है 111.32 किमी


  • एक देशान्तर से दूसरे देशान्तर पर जाने में सूर्य को 4 मिनट का समय लगता है।

0 डिग्री देशान्तर - 

  • प्रधान माध्य रेखा/ प्रधान याम्योत्तर/ ग्रीनविच रेखा/ अन्तर्राष्ट्रीय समय रेखा कहलाती है।


  • भारत का मानक समय ग्रीनविच समय से 5 घण्टे 30 मिनट आगे है।


  • अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180 डिग्री देशान्तर
  • इस रेखा के बांयी से दांयी ओर जाने पर एक दिन कम हो जाता है तथा दांयी से बांयी ओर जाने पर एक दिन बढ़ जाता है।
पृथ्वी और सौरमंडल से सम्बंधित शब्दावली -

  • दैनिक गति- पृथ्वी द्वारा अपनी धुरी पर लगाया गया एक चक्कर जो एक दिन होता है।
  • वार्षिक गति- पृथ्वी द्वारा अपनी कक्षा में सूर्य की ओर लगाया गया एक चक्कर जिसमे उसे 365¼ दिन लगते हैं।
  • नक्षत्र दिवस- एक मध्यान्ह रेखा के ऊपर किसी निश्चित रेखा के उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच की अवधि।
  • सौर दिवस- किसी  निश्चितमध्यान्ह रेखा के ऊपरमध्यान्ह सूर्य के उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच की अवधि।
  • उपसौर- पृथ्वी द्वारा अपनी अंडाकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा अवधि के क्रम में सूर्य से सबसे अधिक दूरी की स्थिति जो 4 जुलाई को होती है।
  • कर्क संक्रांति- पृथ्वी द्वारा सूर्य के क्रम में 22 दिसम्बर की स्थिति जब सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है।
  • विषुव- 21 मार्च और 23 सितम्बर की स्थितियां जब सूर्य भूमध्य रेखा पर लम्बवत चमकता है, जिसके कारण दोनों गोलार्द्धों में सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। 21 मार्च वाली स्थिति को बसंत विषुव और 23 सितम्बर वाली स्थिति को शरद विषुव की अवस्था कहा जाता है।
  • सिजगी- सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति।
  • वियुति- सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा की स्थिति, जिसके कारण चन्द्र ग्रहण होता है।
  • युति- सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा की स्थिति, जिसके कारण सूर्य ग्रहण होता है।
  • पृथ्वी के घूर्णन के कारण पृथ्वी का प्रत्येक भाग बारी-बारी से सूर्य के सम्मुख आता रहता है, अतः सूर्य के सम्मुख वाले भाग में दिन और पीछे वाले भाग में रात्रि होती है, इस प्रकार दिन-रात का क्रम पृथ्वी की घूर्णन गति का परिणाम है।
  • इस प्रकार पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण  24 घंटे की अवधि वाला दिन अस्तित्व में आता है।
  • घूर्णन के अक्ष के अधर पर ही अक्षांश एवं देशांतर का निर्धारण किया जाता है।
  • इस कारण पृथ्वी पर भौतिक और जैविक दोनों क्रिया प्रभावित होती है।
  • कोरिऑलिस बल की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण उत्तरी गोलार्द्ध में जल एवं पवनें अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बायीं ओर मुड़ जाते हैं।
  • महासागरों में ज्वार-भाटा आता है।

परिक्रमा

  • पृथ्वी किम परिक्रमा का मार्ग अंडाकार है। अतः पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी वर्ष भर एक सी नहीं रहती।
  • 3 जनवरी में यह सूर्य के सबसे निकट होती है। इस समय पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी 14.7 करोड़ किमी. होती है। पृथ्वी की इस स्थिति को उपसौर  कहते हैं। 
  • 4 जुलाई में पृथ्वी सूर्य से अपेक्षाकृत अधिक दूर होती है। 
  • इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी 15.2 करोड़ किमी. रहती है। अतः पृथ्वी की यह स्थिति अपसौर कहलाती है। अपसौर Apehelion की स्थिति 4 जुलाई को होती है। पृथ्वी की परिक्रमण गति के निम्न प्रभाव देखे जा सकते हैं-
  • सूर्य की किरणों का सीधा और तिरछा चमकना
  • वर्ष की अवधि का निर्धारण
  • कर्क और मकर रेखाओं का निर्धारण
  • ध्रुवों पर 6-6 माह के दिन और रात
  • धरातल पर ताप वितरण में भिन्नता
  • जलवायु कतिबंधों का निर्धारण
  • दिन-रात का छोटा बड़ा होना
  • ऋतु परिवर्तन
  • भूमध्य रेखा पर ही सदैव दिन-रात बराबर होते हैं, क्योंकि भूमध्य रेखा को प्रकाश-वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है, परन्तु चूँकि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° झुकी होती है और सदा एक ओर ही झुकी रहती है, इसलिए भूमध्य रेखा के अतिरिक्त उत्तरी व दक्षिणी गोलार्द्ध की सभी अक्षांश रेखाओं को प्रकाश वृत्त दो बराबर भागों में बांटकर भिन्न-भिन्न ऋतुओं में असमान रूप से विभक्त करता है। 
  • परिणामस्वरूप भूमध्यरेखा के अतिरिक्त शेष भागों में दिन-रात की अवधि समान नहीं होती है।

उपर्युक्त विवरण के अधर पर दिन रात के छोटे बड़े होने के संक्षेप में निम्न कारण है-

  • पृथ्वी की वार्षिक गति का होना।
  • पृथ्वी का अक्ष का तल सदा 66½° झुके होना।
  • पृथ्वी के अक्ष का सदा एक ही ओर झुके रहना।
  • पृथ्वी के परिक्रमण में 4 मुख्य अवस्थाएं आती हैं तथा इन चारों अवस्थाओं में ऋतु परिवर्तन होता है।
  • पृथ्वी का अक्ष इसके कक्षा तल पर बने लम्ब से 23½° का कों बनाता है।
  • जब सूर्य कर्क रेखा से लम्बवत चमकता है। इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की सबसे अधिक ऊंचाई होती है, जिससे यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु होती है, यह स्थिति 21 जून को घटित है तथा इस स्थिति को कर्क संक्रांति या ग्रीष्म अयनांत कहते हैं।
  • 22 दिसम्बर की स्थिति में दक्षिणी ध्रुव सूर्य के सम्मुख होता है और सूर्य मकर रेखा पर चमकता है, जिससे यहाँ ग्रीष्म ऋतु होती है। इस स्थिति को मकर संक्रांति या शीत अयनांत कहा जाता है। इस समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में तिरछा चमकता है, जिससे दिन छोटे व रातें बड़ी होती हैं और गर्मी कम होने से जाड़े की ऋतु होती है।
  • 21 मार्च और 23 सितम्बर की स्थितियों में सूर्य भूमध्य रेखा पर चमकता है। इस समय समस्त अक्षांश रेखाओं का आधा भाग प्रकाश में रहता है, जिससे सर्वत्र दिन रात बराबर होते हैं। 
  • दोनों गोलार्द्धों में दिन रात और ऋतु की समानता रहने से इन दोनों स्थितियों को विषुव अथवा समरात दिन कहा जाता है। 21 मार्च वाली वसंत स्थिति को शरद विषुव अवस्था कहा जाता है।

इस प्रकार ऋतु परिवर्तन के भिन्न कारण हैं-
  • पृथ्वी के अक्ष का झुकाव
  • पृथ्वी के अक्ष का सदैव एक ही ओर झुके रहना
  • पृथ्वी की परिक्रमण या वार्षिक गति होना
  • इन तीनों के परिणामस्वरूप दिन-रात का छोटा बड़ा होते रहना
सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति सिजगी कहलाती है, जो 2 तरह से होती है-

  • सूर्य – चंद्रमा – पृथ्वी = युति
  • सूर्य – पृथ्वी – चंद्रमा = वियुति

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