Sunday, October 22, 2017

सविनय अवज्ञा आन्दोलन

सविनय अवज्ञा आंदोलन


  • सविनय अवज्ञा का तात्पर्य अंग्रेजी शासन के कानूनों की शान्तिपूर्ण ढंग से अवहेलना करना। 
  • महात्मा गांधी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कार्यक्रम की घोषणा करने का अधिकार 1 फरवरी 1930 ई. की कांग्रेस कार्यकारिणी से मिल चुका था।
  • 14-16 फरवरी 1930 ई. तक कांग्रेस कार्यकारिणी की एक बैठक में एक प्रस्ताव पारित करके गांधीजी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए गए।
  • गांधीजी ने अपने पत्र यंग इण्डिया के माध्यम से वायसरा लार्ड इरविन एवं ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड के सम्मुख 31 जनवरी 1930 ई. को 11 सूत्री मांगे रखी जो निम्नलिखित प्रकार की है- 

1. पूर्ण नशाबन्दी (मद्यनिषेध) लागू किया जाय।
2. मुद्रा विनियम में एक रुपया एक शिलिंग चार पेंस के बराबर माना जाए।
3. मालगुजारी (भू-राजस्व) 1/2 किया जाए, उसे विधानमण्डल के अधीन रखा जाए।
4. नमक कर समाप्त किया जाए।
5. सैनिक व्यय में 50 प्रतिशत की कमी की जाए।
6. बड़े-बड़े अधिकारियों के वेतन कम से कम आधे हो।
7. विदेशी कपड़ों पर विशेष आयात कर लगाया जाए।
8. तटकर विधेयक लाया जाए।
9. हत्या या हत्या की चेष्टा में दण्डित व्यक्तियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बन्दियों को रिहा कर दिया जाए एवं सभी मुकदमें वापस ले लिए जाये।
10. गुप्तचर विभाग को समाप्त किया जाए और 
11. भारतीयों को आत्मरक्षा के लिए हथियान रखने का अधिकार प्रदान किया जाए।

  • वायसराय इरविन ‘मुझे दुःख है कि गांधीजी वह रास्ता अपना रहे हैं जिसमें कानून और सार्वजनिक शान्ति भंग होना आवश्यक है।’
  • गांधीजी ने प्रत्युत्तर में कहा ‘मैंने घुटने टेककर रोटी मांगी थी परन्तु मुझे उसके स्थान पर पत्थर मिला। ब्रिटिश राष्ट्र केवल शक्ति के सामने झुकता है। इसलिए वायसराय के पत्र से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। भारत के भाग्य में तो जेल खानों की शान्ति ही एकमात्र शान्ति है। सम्पूर्ण भारत एक जेनखाना है। मैं उन ब्रिटिश कानूनों का अर्थ समझता हूं और मैं उस शोकमय शान्ति को भंग करना चाहता हूं जो राष्ट्र के दिल को कष्ट दे रही हैं।’

दाण्डी मार्च


  • 12 मार्च 1930 - 6 अप्रैल 1930 ई. यानि 24 दिन।
  • महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 ई. को अपने आश्रम (अहमदाबाद) से अपना ऐतिहासिक दाण्डी (नौसारी ज़िला) से मार्च प्रारम्भ किया।
  • गांधीजी ‘ब्रिटिश साम्राज्य एक अभिशाप है, मैं इसे समाप्त करके रहूंगा।’

200 मील लम्बी दूरी पैदल चलकर 24 दिनों में पूरी की गई। 358 किमी.
5 अप्रैल को गांधीजी अपने कार्यकर्त्ताओं के साथ डाण्डी पहुंचे। 6 अप्रैल को डाण्डी समुद्र तट पर गांधीजी ने स्वयं अपने हाथ से नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ दिया। इस प्रकार नमक कानून तोड़कर गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का श्रीगेणश किया।


सविनय अवज्ञा आन्दोलन का कार्यक्रम 

1. नमक कानून का उल्लंघन कर स्वयं द्वारा नमक बनाया जाए।
2. सरकारी सेवाओं, अदालतों, शिक्षा केन्द्रों एवं उपाधियों का बहिष्कार किया जाए।
3. महिलाएं स्वयं शराब, अफीम एवं विदेशी कपउे़ की दुकानों पर जाकर धरना दे।
4. समस्त विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए उन्हें जला दिया जाए।
5. कर अदायगी को रोका जाए।
4 मई को गांधीजी को गिरफ्तारी के बाद कर बन्दी को भी आन्दोलन के कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिय गया।


आन्दोलन की प्रगति

तमिलनाडृ में गांधीवादी राजनेता सी. राजगोपालाचारी ने निरुचेनगोड आश्रम से त्रिचुरापल्ली के वेदारण्यम् तक नमक यात्रा की।
मालाबार में नमक सत्याग्रह की शुरुआत वायकोम सत्याग्रह के नेता के. केलप्पड ने कालीकट से पेन्नार तक नमक यात्रा की।
असम के लोगों ने सिलहट से नोआखली तक की यात्रा की। इन सभी ने नमक कानून तोड़ा।
उड़ीसा में नमक सत्याग्रह गोपचन्द्र बन्धु चौधरी के नेतृत्व में बालासोर, कटक और पुरी में नमक आन्दोलन चलाया गया।
उत्तर-पश्चिम प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खां जिन्हें सीमांत गांधी भी कहा जाता है, के नेतृत्व में खुदाई खिदमतगार संगठन के सदस्यों ने सरकार का विरोध किया।
उन्होंने पठानों की क्षेत्रीय राष्ट्रवादिता के लिए तथा उपनिवेशवाद और हस्तशिल्प के कारीगरों को गरीब बनाने के विरूद्ध आवाज उठाई।
लाल कुर्ती दल के गफ्फार खां को ‘फख्रे अफगान’ की उपाधि दी गई।
इन्होंने पश्तो भाषा में ‘पख्तून’ नामक एक पत्रिका निकाली जो बाद में ‘दशरोजा’ नाम से प्रकाशित हुई।
गफ्फार खां को बादशाह खान भी कहा जाता है।
पेशावर में गढ़वाल राइफल के सैनिकों ने अपने साथी चन्द्रसिंह गढ़वाली के अनुरोध पर सविनय अवज्ञा आन्दोलनकारियों की भीड़ पर गोली चलाने के आदेश का विरोध किया।
25 अप्रैल से 4 मई तक पेशावर पर जनता का शासन रहा, पेशावर पर पुनः कब्जा करने के लिए सरकार को हवाई हमले का सहारा लेना पड़ा।
गफ्फार खां ने 1946-47 ई. में पख्तूनिस्तान की मांग को लेकर सक्रिय आन्दोलन किया।


पूर्वोत्तर क्षेत्र

भारत के पूर्वोत्त्र क्षेत्र मणिपुर में भी सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने जोर पकड़ा।
नगाओं ने मदोनांग के नेतृत्व में आन्दोलन किया। इस आन्दोलन को जियालरंग आन्दोलन भी कहा जाता है। मदोनांग पर हत्या का आरोप लगाकर फांसी दे दी।
इसके बाद उसकी बहन ‘गैडिनल्यू’ ने नागा विद्रोह की कमान संभाली। इसे गिरफ्तार कर आजीवन कारावास की सजा दी।
जवाहर लाल नेहरू ने ‘गैडिनल्यू’ को ‘रानी की उपाधि दी तथा कहा ‘एक दिन ऐसा आएगा जब भारत इन्हें स्नेहपूर्ण स्मरण करेगा।’
जून 1930 को कांग्रेस और उससे सम्बद्ध संगठनों को गैर-कानूनी घोषित करते हुए पं. जवाहर लाल एवं महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया।
गांधीजी के गिरफ्तारी के विरोध में मुम्बई की सड़कों पर लगभग 50 हजार मिल मजदूरों ने उग्र प्रदर्शन किया।
सरकार के दमन चक्र का सबसे भयानक रूप सरोजनी नायडू, इमाम साहब और मणिलाल के नेतृत्व में लगभग 25 हज़ार स्वयं सेवकों को धरासणा नामक कारखानें पर धावा बोलने से पूर्व लोहे की मंूठ वाली लाठियों से पीटा गया।
अमेरिका के ‘New Freeman’ अखबार में पत्रकार मिलर ने लिखा कि ‘संवाददाता के रूप में मैं पिछले 18 वर्ष से असंख्य नागरिक विद्रोह देखें दंगे, गली कूचों में मारकाट एवं विदोह देखे लेकिन धरासणा जैसा भयानक दृश्य मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा।’
इस आंदोलन के समय कर न अदायगी का आंदोलन मुख्य रूप से बिहार में चलाया गया।
बिहार मं ‘चौकीदार कर न अदा करने’ का आंदोलन चलाया जो मुंगेर, सारण तथा भागलपुर के ज़िलों में काफी सफल रहा।
मुंगेर के ‘बरही’ नामक स्थान पर सरकार का शासन समाप्त हो गया।
गुजरात के खेड़ा, सूरत तथा बारदोली तहसील में कर न अदायगी का आंदोलन चलाया गया।
असम में छात्रों ने कनिंघम सरकुलर के विरोध में आंदोलन किया, इसके तहत छात्रों को अपने अभिभावकों से सद्व्यवहार का प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता था।

आंदोलन के समय बच्चों ने वानर सेना तथा लड़कियों ने ‘माजेरी सेना’ का गठन किया।

गांधीजी की दाण्डी मार्च यात्रा के बारे में सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा, महात्मा जी के दाण्डी मार्च की तुलना इल्वा से लौटने पर नेपोलियन के पेरिस मार्च और राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लए मुसोलिनी के रोम मार्च से की जा सकती है।
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय ही उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के कबायलियों ने गांधीजी को ‘मलंग बाबा’ कहा।
बेलिस फोर्ड ‘सन् 1930 ई. की शरद् ऋतु तक विदेशी वस्त्रों का आयात पूर्व वर्ष के इन्हीं महीनों की आयात की तुलना में तिहाई या चौथाई के बीच रह गया था। बम्बई में अंग्रेज व्यापारियों की 16 मिलें बंद हो गई और 32 हज़ार मजदूर बेकार हो गये। इसके विपरीत, भारतीय व्यापारियों की मिलें दुगुनी गति से कार्य कर रही थी।’
सविनय अवज्ञा आन्दोलन की मुख्य विशेषता थी- बड़े पैमाने पर पहली बार किसी आंदोलन में महिलाओं की मुख्य सहभागिता।

5 मई 1930 को गांधीजी गिरफ्तार 

स्त्रियों ने शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानो पर धरना दिया। साथ ही गिरफ्तार होकर जेल गई।
सरकार की पहल पर एक अंग्रेज पत्रकार मि. सोलोकोम्ब, डॉ. जयकर और तेजबहादुर सप्रू ने गांधीजी से जेल में मिलकर समझौते के प्रयास किए।


गांधी-इरविन समझौता 

इसे दिल्ली पैक्ट (5 मार्च 1931 ई.) भी कहते है।
गांधीजी और वायसराय इरविन के बीच बातचीत के बाद 5 मार्च, 1931 ई. को दिल्ली में एक समझौता हुआ। इसे गांधी-इरविन समझौता भी कहते हैं।

इस समझौते के अनुसार लॉर्ड इरविन ने सरकार की ओर से निम्नलिखित आश्वासन दिए-

1. उन राजनीतिक बन्दियों के अतिरिक्त जिन पर हिंसा का आरोप है, शेष को मुक्त कर दिया जाएगा।
2. आन्दोलन अवधि में जब्त की गई सम्पत्ति उनके स्वामियों को वापस कर दी जाएगी।
3. सभी अध्यादेश और चालू मुकदमें वापस ले लिये जाएंगे।
4. भारत के लोग समुद्र के किनारे नमक बना सकते हैं।
5. भारतीय शराब व विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर शान्तिपूर्वक धरना भी दे सकते हैं।

इस समझौते में महात्मा गांधी द्वारा कांग्रेस की ओर से लॉर्ड इरविन को निम्न बातों का आश्वासन दिया गया-

1. सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित कर दिया जाएगा।
2. कांग्रेस निकट भविष्य में लन्दन में होने वाले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।
3. कांग्रेस ब्रिटिश सामान के बहिष्कार का राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग नहीं करेगी।
4. कांग्रेस अपनी इस मांग को त्याग देगी कि आन्दोलन अवधि में पुलिस द्वारा जो अत्याचार किए गए है, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
5. कांग्रेस द्वारा यह समझौता स्वीकार न करने पर सरकार शान्ति व व्यवस्था के लिए आवश्यक कार्यवाही करने हेतु स्वतंत्र होगी।
गांधी-इरविन समझौते को 26-29 मार्च 1931 तक चले करांची कांग्रेस अधिवेशन में अनुमोदन कर दिया गया।
गांधीजी ने पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य को बिना ध्यान मं रखें ही समझौता कर लिया। पं. जवाहरलाल नेहरू, बोस आदि ने कहा कि गांधीजी ने अनजाने में भारत को बेच दिया है।
युवा कांग्रेसी इस समझौते से इसलिए असंतुष्ट थे क्योंकि गांधीजी तीन क्रांतिकारियों भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को फांसी के फंदे से नहीं बचा सके। 
कांग्रेस का विशेष अधिवेशन मार्च 1931 ई. में सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में कराची में हुआ इस अधिवेशन में युवाओं ने गांधीजी को काले झण्डे दिखाये।
कराची अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ के साथ गांधी इरविन समझौते को स्वीकार कर लिय गया।
यही ‘मौलिक अधिकार और कर्त्तव्य’ शीर्षक प्रस्ताव भी स्वीकार किया गया।
इसी समय गांधीजी ने कहा था कि ‘गांधी मर सकते हैं, परन्तु गांधीवाद नहीं।’
इसी अधिवेशन में राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम से सम्बद्ध प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया गया।
कांग्रेस ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी को कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्राधिकृत किया।

द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्थगन

गांधीजी ने सन् 1932 ई. के अन्त तक राजनीतिक बन्दियों की सख्य 2 लाख 20 हज़ार तक पहुंची।
8 मई 1933 ई. को महात्मा गांधी ने आन्दोलन 11 सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।
14 जुलाई, 1933 ई. को जन आन्दोलन रोककर व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू।
पूना समझौंते के बाद गांधीजी की रूचि अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन के प्रति अधिक हो गई, इसी समय उन्होंने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की।

7 अप्रैल 1934 ई. को गांधीजी ने द्वितीय सविनय अवज्ञा आन्दोलन को समाप्त कर दिया।



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