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Tuesday, August 1, 2017

मूसी महारानी की छतरी

मूसी महारानी की छतरी
बाला दुर्ग के नीचे और शहर महल के पीछे सागर के दक्षिणी किनारे पर बनी यह अनूठी छतरी राजपूत स्थापत्य कला का एक अनूठा उदाहरण है। एक विशाल चबूतरे पर मूसी महारानी और तत्कालीन महाराजा बख्तावर सिंह की स्मृत्ति में बनी संगमरमर के 80 खम्भों पर टिकी यह कलात्मक छतरी दर्षकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है। इस दुमंजिला भवन का निर्माण विनय सिंह ने महाराजा बख्तावर सिंह और उनकी रानी मूसी के सम्मान में ईसा पश्चात वर्ष 1815 में करवाया था। लाल बालूपत्थर से बनी हाथी के आकार की संरचनाएं और रामायाण व महाभारत के भित्ति चित्र इसकी और ध्यान आकर्षित करती है। ऊपरी मंजिल में संगमरमर से बनी हुई असामान्य गोल छत, शानदार पट्टी और मेहराब हैं। स्मारक की आंतरिक संरचना में शानदार नक्काषी है और दीवारों पर चित्र है।
84 खम्बों की छतरी-
बूंदी शासक शत्रुसाल का स्मारक (1631 ई.)
बूंदी के देवपुरा के पास रावराजा अनिरुद्ध सिंह के भाई देवा की स्मृत्ति में 1740 ई. बनाई गई। तीन मंजिला छतरी में 84 भव्य स्तम्भ है।

गैटोर की छतरियां
गैटोर की छतरियां जयपुर के पास गैटोर में स्थित है। यह छतरियां पंचायन शैली में बनी है। यह जयपुर के शासकों की समाधि स्थल है, जहां जयपुर के राजाओं की छतरियां है। यहां सर्वप्रथम सवाई जयसिंह की छतरी बनी थी। सवाई ईष्वरी सिंह की छतरी चन्द्रमहल (सिटी पैलेस) के जयनिवास उद्यान में स्थित है। उनकी छतरी का निर्माण सवाई माधोसिंह ने करवाया था।

मंडोर की छतरियां-
यहां पर जसवंत सिंह द्वितीय के पूर्व के जोधपुर के शासकों की छतरियां है। इनमें सबसे बड़ी छतरी अजित सिंह की है।

म्हासतिया

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