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Friday, July 21, 2017

राजस्थानी चित्रशैली




राजस्थानी चित्रशैली का पहला वैज्ञानिक विभाजन आनन्द कुमार स्वामी ने सन् 1916 ई. में अपनी पुस्तक ‘राजपूताना पेन्टिंग्स’ में प्रस्तुत किया।


भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजस्थान चित्रकला की शैलियों का वर्गीकरण
मेवाड चित्रशैली (स्कूल):- उदयपुर, चांवड, नाथद्वारा, देवगढ
मारवाड स्कूलः- जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़
ढूंढाड स्कूलः- आमेर, जयपुर, अलवर, उनियारा, शेखावाटी
हाडौती स्कूलः- कोटा, बूंदी, झालावाड़

नाथद्वारा शैली-

इसमें श्रीनाथजी आकर्षण के प्रमुख केन्द्र हैं।
श्रीनाथ जी को कृष्ण का प्रतीक मानकर विविध कृष्ण लीलाओं को चित्रों में अंकित करने की प्रथा यहां प्रचलित हैं।
श्रीनाथ जी के स्वरूप के पीछे बड़े आकार के कपड़े पर जो पर्दे बनाये जाते हैं उन्हें पिछवाई कहते है, जो नाथद्वारा शैली की मैलिक देन हैं।
इस शैली की पृष्ठभूमि में सघन वनस्पति दर्शायी गयी है जिसमें केले के वृक्ष की प्रधानता है।
1672 में महाराणा राजसिंह के द्वारा राजसमन्द के नाथद्वारा में श्रीनाथ जी के मन्दिर की स्थापना के साथ ही नाथद्वारा शैली का विकास हुआ जिसे वल्लभ चित्र शैली के नाम से भी जाना जाता है।
नाथद्वारा शैली मे मेवाड़ की वीरता, किशनगढ़ का श्रृंगार तथा ब्रज के प्रेम भी समन्वित अभिव्यक्ति हुई है।
नाथद्वारा चित्र शैली में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के सर्वाधिक चित्र बने है।

इस के प्रमुख चित्रकार- नारायण, चतुर्भुज, घासीराम, उदयराम।

मेवाड शैली-

राजस्थानी चित्रकला की जन्म भूमि मेदपाट (मेवाड़) है।
1260 में चित्रित श्रावकप्रतिक्रमण सूत्रचूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ इस शैली का प्रथम उदाहरण है।

1261 में मेवाड़ के महाराजा तेजसिंह के काल में रचित श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी इस शैली का प्रथम चित्रित ग्रन्थ है।

इस समय साहबदीन ने महाराणाओं के व्यक्ति चित्र बनाये
जगतसिंह प्रथम के समय राजमहल में ‘चित्तेरों की ओवरी’ नाम से कला विद्यालय स्थापित किया गया। इसे ‘तस्वीरां रो कारखानो’ नाम से भी पुकारा जाता था।
विशेषताएं-
लाल-पीले रंग का अधिक प्रयोग,
गरूड़ नासिका, परवल की खड़ी फांक से नेत्र,
घुमावदार लम्बी अंगुलियां, अलंकारों की अधिकता और चेहरों की जकड़न आदि इस शैली की प्रमुख विशेषताएं हैं।
प्रमुख चित्रकार- मनोहर लाल, गंगाराम, साहिबदीन, कृपाराम और जगन्नाथ प्रमुख है।
राजा अमरसिंह के काल से इस शैली पर मुगल प्रभाव दिखाई देता है।
मेवाड़ चित्र शैली का वास्तविक विकास महाराजा अमर सिंह के काल में सर्वाधिक हुआ।
महाराजा अमर सिंह के काल में गीत गोविन्द, रागमाला, भागवत, रामायण, महाभारत इत्यादि धार्मिक ग्रन्थों के कथानकों पर चित्र बने थे।
मेवाड़ चित्र शैली का स्वर्ण युग महाराजा जगत सिंह के काल को माना जाता है।
मेवाड़ चित्र शैली मे सर्वाधिक लाल एवं काले रंगों का प्रयोग हुआ है।
मेवाड़ चित्र शैली में सर्वाधिक कदम्ब के वृक्षों का चित्रण हुआ है।
मेवाड़ चित्र शैली में पंचतन्त्र के कथानकों पर जो चित्र बने है उन्हीं मे से एक चित्र के दो नायकों का नाम कलीला-दमना है।
मेवाड़ चित्र शैली में सर्वाधिक श्रीकृष्ण की लीलाओं के चित्र बने है।

चावण्ड शैली
प्रारम्भिक विकास महाराणा प्रताप के काल में
स्वर्णकाल अमरसिंह प्रथम का काल
चित्रकार- नीसारदीन
उसने ‘रागमाला’ नामक चित्र बनाया।

देवगढ़ शैली-
जब महाराणा जयसिंह के राज्यकाल में रावत द्वारिकादास चूंडावत ने देवगढ़ ठिकाना 1680 ई. में स्थापित किया तदुपरान्त ‘देवगढ़ शैली’ का जन्म हुआ। यहां के रावत ‘सोंलहवे उमराव’ कहलाते हैं।
इस शैली में शिकार, हाथियों की लड़ाई, राजदरबार का दृश्य, कृष्ण-लीला आदि के चित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इस शैली के भित्ति चित्र ‘अजारा’ की ओवंरी मोती महल आदि देखने को मिलते हैं।

इस शैली को मारवाड़, ढूंढाड़ एवं मेवाड़ की समन्वित शैली के रूप में देखा जाता है।
इस शैली में हरे, पीले रंगों का प्रयोग अधिक हुआ है।

मारवाड़ स्कूल
जोधपुर शैली-
मारवाड़ में राव मालदेव के समय इस शैली का स्वतंत्र रूप से विकास हुआ। इस शैली में पुरूष लम्बे चौडे गठीले बदन के, स्त्रियां गठीले बदन की, बादामी आंखें, वेशभूषा ठेठ राजस्थानी और पीले रंग की प्रधानता होती थी।
चित्रों के विषय नाथ चरित्र, भागवत, पंचतंत्र, ढोला-मारू, ‘मूमलदे-निहालदे’, ढोला-मारू, उजली-जेठवा आदि लोकगाथाएं होती थी। चित्रकारों में किशनदास भाटी, अमर सिंह भाटी, वीरसिंह भाटी, देवदास भाटी, शिवदास भाटी, रतन भाटी, नारायण, गोपालदास, छज्जू, कालूराम आदि प्रमुख हैं।
इस चित्र शैली में प्रेमाख्यानों के नायक-नायिकाओं के भाव-भंगिमाओं का सुंदर चित्रण हुआ है।
बारहमासा चित्रण तत्कालीन सांस्कृमिक परिवेश में नायक-नायिका के मनोभावों का सफल उद्घाटन करते है।
मारवाड़ शैली में लाल, पीले रंग का बाहुल्य है। हाशियें में भी पीले रंग का प्रयोग किया गया हैं।
वीरजी चित्रकार द्वारा 1623 ई. में निर्मित ‘रागमाला चित्रण’ का ऐतिहासिक महत्त्व हैं। जोधपुर शैली में महाराजा जसवन्तसिंह के समय में कृष्ण चरित्र की विविधता और मुगल शैली का प्रभाव इस समय के चित्रों में दृष्टव्य है।
स्वर्णकाल जसवंत सिंह प्रथम का काल
विषय- राजसी ठाठ-बाट, दरबारी दृश्य
687 में शिवनाथ द्वारा बनायी गयी धातु की मूर्ति जो वर्तमान पिण्डवाड़ा ( सिरोही ) मे है इस चित्र शैली का मूल आधार है।
इस शैली में सर्वाधिक श्रृंगार रत्न प्रधान चित्र बने है।
इस चित्र शैली में सर्वाधिक लाल एवं पीले रंगों का प्रयोग हुआ है।
इसमें सर्वाधिक आम के वृक्षों का चित्रांकन हुआ है।
इस शैली के नायक एवं नायिकाओं को गठीले कद-काठी के चित्रांकित किया गया है।
इस शैली में राग-रागिनी, ढोला-मारू तथा धार्मिक ग्रन्थों कथानकों पर चित्र बने है।
राव मालदेव के काल में मारवाड़ चित्र शैली पर मुगल शैली का प्रभाव पड़ा था।
मुगल शैली से प्रभावित मारवाड़ चित्र शैली जोधपुर चित्र शैली कहलायी।
1623 में वीरजी नामक चित्रकार द्वारा बनाया गया रागमाला का चित्र इस शैली का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है।
जोधपुर चित्र शैली
जोधपुर चित्र शैली को महाराजा सूर सिंह महाराजा जसवन्त सिंह, महाराजा अजीत सिंह तथा महाराजा अभय सिंह ने संरक्षण दिया था।
महाराजा अभय सिंह के काल में जोधपुर शैली का सर्वाधिक विकास हुआ।

बीकानेर चित्र शैली

मारवाड़ की शैली की ही उप शैली के रूप में विकसित बीकानेर चित्र शैली के कलाकारों को उस्ताद कहा जाता है।
राजस्थान में बीकानेर एकमात्र ऐसी चित्र शैली है जिसमें चित्रकारों ने चित्र के साथ अपने नाम भी लिखे है।
महाराजा अनूप सिंह के काल में बीकानेर चित्र शैली का सर्वाधिक विकास हुआ है।
बीकानेर चित्र शैली में भी दरबार, शिकार तथा वन-उपवन के चित्र बने हुए है।
बीकानेर चित्र शैली में धार्मिक ग्रन्थों के कथानकों पर भी महाराजा करणी सिंह के काल में सर्वाधिक चित्र बने।


किशनगढ़ चित्रकला शैली-

राजस्थान की राज्य प्रतिनिधि चित्र शैली मानी जाती है।
किशनगढ़ के महाराजा सावन्त सिंह का समय 1747-64 स्वर्णयुग माना जाता है। जो इतिहास में नागरीदास के नाम से प्रसिद्व हुए है।
नागरीदास ने अपनी प्रेयसी बणी-ठणी की स्मृति में अनेकों चित्र बनवाये थे।
बणी-ठणी का प्रथम चित्र मोर ध्वज निहाल चन्द के द्वारा बनाया गया था।
बणी-ठणी को राजस्थान की मोनालिसा कहा जाता है।
इस शैली को प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ0 फैययाज अली एवं डॉ0 एरिक डिकिन्सन को दिया जाता है।
इस शैली में सर्वाधिक नारियल का वृक्ष चित्रांकित किया गया है।
इस चित्र शैली में किशनगढ़ का स्थानीय गोदाला तालाब भी चित्रांकित किया गया है।

बूंदी चित्रकला शैलीः

हाड़ौती क्षेत्र की सबसे प्राचीन चित्र शैली है। इस शैली में सर्वाधिक पशु-पक्षी एवं पेड़ों के चित्र बने है। बूंदी शैली का सर्वाधिक विकास राव सुर्जन सिंह के समय में हुआ।
बूंदी के चित्रों में नुकीली नाक, मोटे गाल, छोटा कद और लाल पीले रंग का प्रयोग स्थानीय विशेषताएं लिए हुए हैं, वहीं गुंबज का प्रयोग तथा बारीक वस्त्र मुगल प्रभाव का उदाहरण है।
बूंदी के चित्रों में कृष्ण लीला, रामलीला, बारहमासा, शिकार, दरबार, तीज त्यौहार, हाथियों की लड़ाई, घुड़दौड़, रागरंग, पशु-पक्षी, फल-फूल, वृ़क्ष आदि का चित्रण किया हुआ है।
बूंदी शैली में चित्रित नारी के चित्रों में, नेत्रों के ऊपर एवं नीचे की रेखा दोनों समानान्तर रूप में आपस में मिलता हैं जो इस शैली की विशेषताएं हैं।
महाराव उम्मेद सिंह के शासन में निर्मित चित्रशाला (रंगीन चित्र) बूंदी चित्र शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।
पशु-पक्षियों को सर्वाधिक महत्व दिया गया। बंूदी चित्र शैली में सर्वाधिक धार्मिक कथानकों पर चित्र बने है।
बंूदी चित्र शैली में सर्वाधिक चम्पा के वृक्षों का चित्रांकित किया गया है। इस शैली में लाल पीले एवं हरे रंगों को महत्व दिया गया है।
बंूदी चित्र शैली से ही कोटा चित्र शैली का उद्धभव हुआ है।
ढूंढाड़ चित्र शैली
जयपुर तथा उसके आस पास के क्षेत्रों में विकसित ढूॅंढाड़ चित्र शैली में लाल, पीले, हरे एवं सुनहरी रंगों को प्रधानता दी गई है।
इस चित्र शैली में चांदी तथा मोतियों का भी प्रयोग किया गया।
इस चित्र शैली में धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त लोक संस्कृति के ग्रन्थों पर भी चित्र बने है।
इस चित्र शैली का वह स्वरूप जिस पर मुगल शैली का प्रभाव पड़ा वह आमेर चित्र शैली कहलायी।
राव भारमल के काल से आमेर चित्र शैली का प्रारम्भ माना जाता है।
महाराजा मानसिंह के काल में आमेर चित्र शैली का वास्तविक विकास हुआ।
सवाई प्रतापसिंह का काल आमेर चित्र शैली का स्वर्ण युग माना जाता है।
आमेर चित्र शैली में मोर, हाथी, पपीहा के साथ-साथ पीपल एवं बड़ के पेड़ों का भी चित्रांकित किया गया।

अलवर चित्र शैली

यह शैली आमेर तथा दिल्ली चित्र शैली के मिश्रण से बनी चित्र शैली है।
अलवर चित्र शैली पर सर्वाधिक मुगल चित्र शैली का प्रभाव पड़ा है।
अलवर चित्र शैली राजस्थान की एकमात्र ऐसी चित्र शैली है जिसमें मुगल गणिकाओं के भी चित्र बने है।
महाराजा बख्तावर सिंह के काल में अलवर चित्र शैली को मौलिक स्वरूप प्राप्त हुआ और महाराजा विनय सिंह का काल अलवर चित्र शैली का स्वर्ण युग था।
राजस्थान में मुगल बादशाहों के चित्र भी केवल अलवर चित्र शैली में बने।
इस शैली के चित्रों में राजपूती वैभव, कृष्णलीला, रामलीला, प्राकृतिक परिवेश, राग रागिनी आदि का चित्रण हुआ है। इस शैली में



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