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Wednesday, May 17, 2017

भारत की मिट्टियाँ



  • मृदा - लैटिन शब्द सोलम से बना है जिसका अर्थ फर्श  होता है।
  • मृदा भूमि की वह परत है, जो चट्टानों के विखण्डन, विघटन और जीवांषों के सडने-गलने से मिलकर बनती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने भारत की मिट्टियों को आठ वर्गों में विभाजित किया हैः- जलोढ, लाल, काली, लैटेराइट, पर्वतीय, मरूस्थलीय, पीट, दलदलीय और लवणीय व क्षारीय मृदा आदि।

अ. जलोढ़/ कांप मिट्टी:

  • यह मृदा भारत के पश्चिमी सतलज मैदान से लेकर पूर्व में गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी तथा पूर्वी एवं पश्चिमी मैदानों में 15 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है।
  • जलोढ़ मिट्टी में नाइट्रोजन फास्फोरस एवं ह्यूमस (जीवांश) की कमी होती है, परंतु पोटाश, चूना पर्याप्त होते है।

ब. लाल मृदा:-

  • लाल मिट्टी का निर्माण ग्रेनाइट एवं नीस तथा शिष्ट जैसी रूपांतरित चट्टानों के विखंडन से हुआ है। लोहे के ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल होता है।
  • लाल मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस की कमी होती है, जबकि लोहे, एल्यूमिनियम तथा चूने का अंश अधिक होता है।
  • इसका विस्तार देश में मुख्यतः तमिलनाडु, दक्षिण महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, पूर्वी मध्य प्रदेश, दक्षिण विहार तथा उत्तर-पूर्वी पर्वतीय क्षेत्रों के अवसादों में पायी जाती है।
  • इनकी संरचना छिद्रमय तथा भंगुर है, जिनमें कंकर, कार्बोनेट तथा कुछ घुलनषील लवण पाये जाते हैं अर्थात् यह स्वभाव में अम्लीय प्रकृति की होती है।
  • यह मिट्टी बाजरा, मूंगफली, आलू, दलहन, गेहूं आदि की खेती के लिए उपयुक्त है।


स. काली मृदा:-

  • इसको अंतर्राष्ट्रीय रूप से उष्ण कटिबन्धीय चरनोजम कहा जाता है।
  • काली मिट्टी को रेगुर एवं कपास मृदा के नाम से भी जाना जाता है।
  • काली मिट्टी में लोहा, एल्युमिनियम, मैग्नेशियम एवं चूने की अधिकता होती है तथा नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं ह्यूमस (जैविक पदार्थो) की कमी होती है।
  • इसका भारत में विस्तार लगभग 5.46 लाख वर्ग किमी क्षेत्र (कुल क्षेत्र का 16.6 प्रतिशत)पर विस्तृत है, जोकि मृदा का तीसरा विशालतम वर्ग है।
  • इसका विकास महाराष्ट्र में सर्वाधिक क्षेत्र पर विस्तृत है और पश्चिमी मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, आंध्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तरप्रदेष पर दक्कन लावा (बेसाल्ट) के अपक्षय से हुआ है।
  • इसमें जल धारण करने की क्षमता सर्वाधिक होती है। अतः जल की अधिकता होने पर चिपचिपी और सूखने पर इसमें गहरी दरारें उत्पन्न हो जाती है। इस कारण से इस मृदा को ‘स्वतः जुताई वाली मृदा ’ भी कहा जाता है।
  • यह मिट्टी कपास, गन्ने, सोयाबीन, चना, तिलहन की खेती आदि के लिए उपयुक्त होती है।

द. लैटेराइट मृदा:-

  • लैटेराइट मृदा का विकास लैटेराइट चट्टानों पर अपक्षलन के कारण होती है, इसमें सिलिका एवं चूने के अंश रिसकर नीचे चले जाते है एवं मृदा में लोहा एवं एल्यूमिनियम के यौगिक बचे रह जाते है।
  • यह मिट्टी केरल के पश्चिमी घाट, महाराष्ट्र एवं असोम में पाया जाता है। इसका विस्तार 1.26 लाख वर्ग किमी क्षेत्र ( देष के 3.7 प्रतिषत भूभाग) पर है।
  • यह मिट्टी सह्याद्रि, पूर्वी घाट, राजमहल पहाडियों, सतपुडा, विन्ध्य, असोम तथा मेघालय की पहाडियों के शिखरों में मिलती है।
  • इसका रंग रूप ईंट जैसा होता हैै ।
  • इसका लाल रंग लोहे के ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है। ये मिट्टियां सामान्यतः लोह तथा एल्युमिनियम में समृद्ध है। वही इनमें नाइट्रोजन, पोटाश, चूना तथा जैविक पदार्थ की कमी होती है।
  • ये प्रायः कम उर्वरता वाली मिट्टियां हैं किन्तु उर्वरकों के प्रयोग से इनमें चाय, कहवा, सिनकोना तथा काजू आदि विविध प्रकार की बागानी फसलों की खेती की जाती है।

य. मरूस्थलीय मृदाः-

  • मरूस्थली मृदा का विस्तार राजस्थान, सौराष्ट्र कच्छ, हरियाणा तथा दक्षिणी पंजाब के लगभग 1.42 लाख वर्ग किमी क्षेत्र पर है।
  • मरूस्थलीय मिट्टी में लोहा एवं फास्फोरस प्रचुर मात्रा में होता है, परंतु नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थ की कमी होती है।
  • इस मिट्टी में बालू की मात्रा अधिक होती है।
  • इसमें बाजरा व ज्वार, मोटे अनाज व सरसों की खेती होती है।

र. पर्वतीय मृदाः-

  • इसे वनीय मृदा भी कहा जाता है। इसका विस्तार 2.85 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में पाया जाता है।
  • ये नवीन व अविकसित मृदायें हैं जो कष्मीर से अरूणाचल प्रदेष तक फैली हुई है।
  • पर्वतीय मृदा में ह्यूमस की अधिकता होती है तथा पोटाष, फास्फोरस एवं चूने की कमी होती है। अम्लीय स्वभाव की होती है।
  • पर्वतीय ढालों पर सेब, नाषपाती व आलूचा आदि फल वृक्ष उगाये जाते है।
  • ढालों पर स्थित होने के कारण पर्वतीय मिट्टी बगानी फसलों की कृशि के लिए विषेश रूप से उपयोगी है। नवजातियों द्वारा झूम कृशि इसी मिट्टी में की जाती है।

व. पीट तथा दलदली मृदायेंः-

  • पीट मिट्टी का निर्माण दलदली क्षेत्रों में काफी अधिक मात्रा में जैविक पदार्थो के जमा हो जाने से होता है।
  • यह नम जलवायु से बनती है। सडी वनस्पतियों से बनी पीट मृदाओं का निर्माण केरल तथा तमिलनाडु के आर्द्र प्रदेषों में हुआ है।
  • इन मृदाओं में जैविक पदार्थ व घुलनशील नमक की मात्रा अधिक होती है। इसमें फॉस्फोरस व पोटाश की कमी होती है।
  • यें मृदायें काली, भारी व अम्लीय होती है।
  • दलदली मृदायें तटीय उडीसा, सुन्दरवन, उत्तरी बिहार के मध्यवर्ती भागों तथा उत्तरी बिहार के मध्यवर्ती भागों तथा तटीय तमिलनाडु में पायी जाती है।


  • लवणीय मिट्टी के रेह, ऊसर या कल्लर, राथड, थूर, चोपन आदि अनेक स्थानीय नामों से पुकारी जाती है। इसका विकास ऐसे क्षेत्रों में हुआ है, जहां जलनिकासी की समुचित व्यवस्था का अभाव है।
  • लवणीय मिट्टी में केशिका क्रिया की क्रिया द्वारा सोडियम, कैल्षियम एवं मैग्नेषियम के लवण मृदा की ऊपरी सतह पर निक्षेपित हो जाते है, परिणामस्वरूप मिट्टी में लवण की मात्रा बढ जाती है।


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